Adhyāya 16: Saṃśaptaka-vrata and the Diversion of Arjuna (द्रोणपर्व, अध्याय १६)
ततः किरीटी सहसा द्रोणानीकमुपाद्रवत् । ये उस मार-काटसे भरे हुए संग्राममें रक्तकी नदी बहाकर आये थे। उसमें शोणित ही जल था। रथकी भँवरें उठ रही थीं। शूरवीरोंकी हड्डियाँ उसमें शिलाखण्डोंके समान बिखरी हुई थीं। प्रेतोंके कंकाल उस नदीके कूल-किनारे जान पड़ते थे, जिन्हें वह अपने वेगसे तोड़- फोड़कर बहाये लिये जाती थी। बाणोंके समुदाय उसमें फेनोंके बहुत बड़े ढेरके समान जान पड़ते थे। प्रास आदि शस्त्र उसमें मत्स्यके समान छाये हुए थे। उस नदीको वेगपूर्वक पार करके कौरव-सैनिकोंको भगाकर पाण्डुनन्दन किरीटधारी अर्जुनने सहसा द्रोणाचार्यकी सेनापर आक्रमण किया ।। ४३-४४ $ || 7 १ लोड ० ! हर ॥ प्र है > मई छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव,वे अपने बाणोंके महान् समुदायसे द्रोणाचार्यको मोहमें डालते हुए-से आच्छादित करने लगे। यशस्वी कुन्तीकुमार अर्जुन इतनी शीघ्रताके साथ निरन्तर बाणोंको धनुषपर रखते और छोड़ते थे कि किसीको इन दोनों क्रियाओंमें तनिक भी अन्तर नहीं दिखायी देता था
tataḥ kirīṭī sahasā droṇānīkam upādravat | chādayann iṣujālena mahatā mohayann iva ||
قال سانجيا: ثم إن أرجونا ذا التاج (كِرِيطِي) اندفع فجأةً مهاجماً صفَّ دروṇa القتالي مباشرة. وبينما كان يتقدم بدا كأنه يُوقع دروṇa في الحيرة، إذ ستره بشبكةٍ عظيمة من السهام. وكان ابن كونتي المشهور يضع السهام على قوسه ويطلقها بسرعةٍ متصلة حتى إن أحداً لم يستطع أن يلحظ فاصلاً بين التهيئة والإطلاق. وفي المناخ الأخلاقي للملحمة، هذه براعة تُسخَّر لضرورة الحرب القاتمة—مهارة وعزم موجَّهان لكسر قيادة الخصم—فيما يُصوَّر ميدان القتال نفسه نهراً من الدم يكشف الكلفة الأخلاقية للنصر.
संजय उवाच