Adhyaya 72
Bhishma ParvaAdhyaya 7235 Versesदोनों पक्ष व्यूहों को थामे हुए; संघर्ष अत्यन्त घोर, पर निर्णायक बढ़त स्पष्ट नहीं—कौरव केंद्र (भीष्म) की रक्षा सुदृढ़, पाण्डव पक्ष में भेदन की तीव्रता बढ़ती हुई।

Adhyaya 72

भीष्मपर्व — अध्याय ७२: सैन्यगुणवर्णनम्, व्यूहरक्षा, दैव-पुरुषकारचिन्ता

Upa-parva: Sainyavinyāsa (Vyūha–Bala–Saṃkhyā) Context Unit

Dhṛtarāṣṭra addresses Saṃjaya, assessing the Kaurava force as properly arrayed according to śāstra and seemingly “unfailing.” He enumerates criteria of an ideal fighting body—balanced age and physique, health, disciplined conduct, and comprehensive proficiency across weapons and combat modes (sword, mace, missiles, wrestling), as well as skilled maneuvering in mounts and vehicles (elephants, horses, chariots). The account stresses practical training, verified competence, and structured compensation rather than recruitment through social favoritism or kin-pressure. Dhṛtarāṣṭra then depicts the army as oceanic in scale, crowded with banners and ornaments, protected by renowned commanders (Bhīṣma, Droṇa, Kṛtavarman, and others), and unprecedented in human memory. A sharp interpretive turn follows: despite such preparation, the Kauravas fail to overpower the Pāṇḍavas, prompting Dhṛtarāṣṭra to infer either divine alignment with the Pāṇḍavas or the operation of ancient destiny. He recalls Vidura’s beneficial advice, notes Duryodhana’s disregard, and concludes with a deterministic formulation—events unfold as created by the Ordainer, not otherwise.

Chapter Arc: पाँचवें दिन का प्रभात—कौरवों की सेना मकरव्यूह में सिमटकर भीष्म के संरक्षण में खड़ी होती है, और पाण्डव श्येनव्यूह रचकर उसी क्षण उत्तर देते हैं। → दोनों पक्ष ‘परस्परजिगीषवः’—जीत की तीव्र इच्छा और क्रोध से भरे—अपने-अपने विभागों में रथी, पत्ति, गज, अश्व को क्रमबद्ध कर एक-दूसरे का अनुसरण करते हुए टकराते हैं; व्यूह-रक्षा ही युद्ध का मुख्य लक्ष्य बन जाती है। → भीमसेन सात्यकि की रक्षा करते हुए द्रोण पर प्रहार करता है—व्यूह के भीतर ‘रक्षक’ और ‘भेदक’ की भूमिकाएँ एक साथ उभरती हैं, और युद्ध देव-दानव संग्राम-सा घोर हो उठता है। → दुर्योधन यश-लालसा में अपनी विशाल सेना सहित भीष्म के निकट पहुँचकर उनकी रक्षा में लग जाता है; दोनों सेनाएँ अपने-अपने व्यूहों को थामे रखती हैं और दिन का संग्राम पूर्ण वेग से चल पड़ता है। → मकरव्यूह की अभेद्यता बनाम श्येनव्यूह की चपलता—अगला क्षण किसका व्यूह टूटेगा और किसका रक्षक डगमगाएगा?

Shlokas

Verse 1

शच्प््ज्िल्ञस> ह्य #जज्स्ज्न्प्त्ल एकोनसप्ततितमो<ध्याय: कौरवोंद्वारा मकरव्यूह तथा पाण्डवोंद्वारा श्येनव्यूहका निर्माण एवं पाँचवें दिनके युद्धका आरम्भ संजय उवाच व्युषितायां तु शर्वर्यामुदिते च दिवाकरे । उभे सेने महाराज युद्धायैव समीयतु:,संजय कहते हैं--महाराज! वह रात बीतनेपर जब सूर्योदय हुआ, तब दोनों ओरकी सेनाएँ आमने-सामने आकर युद्धके लिये डट गयीं

قال سنجيا: «يا أيها الملك، لما انقضت الليلة وطلعَت الشمس، تقدّم الجيشان من الجانبين ووقفا متقابلين، وقد عزم كلٌّ منهما على القتال.»

Verse 2

अभ्यधावन्त संक्रुद्धा: परस्परजिगीषव: । ते सर्वे सहिता युद्धे समालोक्य परस्परम्‌,सबने एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अत्यन्त क्रोधमें भरकर विपक्षी सेनापर आक्रमण किया। राजन्‌! आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप आपके पुत्र और पाण्डव एक- दूसरेको देखकर कुपित हो सब-के-सब अपने सहायकोंके साथ आकर सेनाकी व्यूह-रचना करके हर्ष और उत्साहमें भरकर परस्पर प्रहार करनेको उद्यत हो गये

قال سنجيا: وقد استبدّ بهم الغضب وتملّكهم شوقُ الغلبة بعضِهم على بعض، اندفعوا يهاجمون إلى الأمام. واجتمعوا جميعًا للقتال، فتقابلوا وجهًا لوجه—فتصلّبت عزائم الفريقين، واستحالت استعدادًا للاقتحام المتبادل.

Verse 3

पाण्डवा धारराष्ट्राश्न॒ राजन दुर्मन्त्रिते तव । व्यूही च व्यूह[ु संरब्धा: सम्प्रहृष्टा: प्रहारिण:,सबने एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अत्यन्त क्रोधमें भरकर विपक्षी सेनापर आक्रमण किया। राजन्‌! आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप आपके पुत्र और पाण्डव एक- दूसरेको देखकर कुपित हो सब-के-सब अपने सहायकोंके साथ आकर सेनाकी व्यूह-रचना करके हर्ष और उत्साहमें भरकर परस्पर प्रहार करनेको उद्यत हो गये

قال سنجيا: أيها الملك، بسبب مشورتك السيئة، فإن الباندافا وأبناء دريتاراشترا، بعدما أقاموا صفوفهم وتشكيلاتهم وتشكيلاتٍ مضادّة، اشتدّت نياتهم وتهلّلت نفوسهم واشتاقوا إلى الضرب—فاندفع كل فريق يهاجم جيش الخصم، مدفوعًا بالغضب ورغبةِ قهر الآخر.

Verse 4

अरक्षन्मकरव्यूहं भीष्मो राजन्‌ समन्ततः । तथैव पाण्डवा राजन्नरक्षन्‌ व्यूहमात्मन:,राजन! भीष्म सेनाका मकरव्यूह बनाकर सब ओरसे उसकी रक्षा करने लगे। इसी प्रकार पाण्डवोंने भी अपने व्यूहकी रक्षा की

قال سنجيا: أيها الملك، رتّب بهيشما تشكيل «المَكَرَة» وحرسه من كل جانب. وكذلك، أيها الملك، صان الباندافا تشكيلهم هم أيضًا.

Verse 5

(अजातशत्रुः शत्रूणां मनांसि समकम्पयत्‌ । श्येनवद्‌ व्यूहय तं व्यूहं धौम्यस्य वचनात्‌ स्वयम्‌ ।। स हि तस्य सुविज्ञात अग्निचित्येषु भारत । मकरस्तु महाव्यूहस्तव पुत्रस्य धीमत: ।। स्वयं सर्वेण सैन्येन द्रोणेनानुमतस्तदा । यथाव्यूहं शान्तनव: सो<न्ववर्तत तत्‌ पुनः ।।) स निर्ययौ महाराज पिता देवब्रतस्तव । महता रथवंशेन संवृतो रथिनां वर:,स्वयं अजातशत्रु युधिष्ठिरने धौम्य मुनिकी आज्ञासे श्येनव्यूहकी रचना करके शत्रुओंके हृदयमें कँपकँपी पैदा कर दी। भारत! अग्निचयनसम्बन्धी कर्मोमें रहते हुए उन्हें श्येनव्यूहका विशेष परिचय था। आपके बुद्धिमान्‌ पुत्रकी सेनाका मकर नामक महाव्यूह निर्मित हुआ था। द्रोणाचार्यकी अनुमति लेकर उसने स्वयं सारी सेनाके द्वारा उस व्यूहकी रचना की थी। फिर शान्तनुनन्दन भीष्मने व्यूहकी विधिके अनुसार निर्मित हुए उस महाव्यूहका स्वयं भी अनुसरण किया था। महाराज! रथियोंमें श्रेष्ठ आपके ताऊ भीष्म विशाल रथसेनासे घिरे हुए युद्धके लिये निकले

قال سنجيا: أيها الملك، عندئذٍ خرج أبوك ديفافراتا (بهيشما)—وهو أسبقُ فرسان العجلات—إلى القتال، تحفّ به كتائب عظيمة من العربات. ويُظهر المشهد أن نظام الحرب وزخمها لا يقومان على الكثرة وحدها، بل على حضور شيخٍ مهيبٍ تُشكّل انضباطُه وطاعتُه لسنن القتال سلوكَ الجيش بأسره.

Verse 6

इतरेतरमन्वीयुर्यथाभागमवस्थिता: । रथिनः पत्तयश्चैव दन्तिन: सादिनस्तथा,फिर यथाभाग खड़े हुए रथी, पैदल, हाथीसवार और घुड़सवार सब एक-दूसरेका अनुसरण करते हुए चल दिये

قال سنجيا: وقد اصطفّوا بحسب أقسامهم، تقدّم فرسانُ العجلات والمشاةُ وراكبو الفيلة والفرسانُ على الخيل—يتبع بعضُهم بعضًا في تتابعٍ منضبط. وكان هذا المسير مرآةً لتنسيقٍ حربيٍّ قائمٍ على الانضباط، حيث يُؤدَّى الواجب بالبنية والطاعة لا بعنفٍ طائش.

Verse 7

तान्‌ दृष्टवाभ्युद्यतान्‌ संख्ये पाण्डवा हि यशस्विन: । श्येनेन व्यूहराजेन तेनाजस्येन संयुगे,शत्रुओंको युद्धके लिये उद्यत हुए देख यशस्वी पाण्डव युद्धमें अजेय व्यूहराज श्येनके रूपमें संगठित हो शोभा पाने लगे। उस व्यूहके मुखभागमें महाबली भीमसेन शोभा पा रहे थे। नेत्रोंके स्थानमें दुर्धर्ष वीर शिखण्डी तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न खड़े थे

قال سنجيا: لما رأى الأعداء مصطفّين متهيّئين للقتال، اتخذ الباندافا ذوو المجد، في خضمّ الحرب، تشكيل «شيينا» (الصقر) الذي لا يُقهر—ملكَ تشكيلات القتال—فبدوا متألّقين ثابتين، وقد انتظموا على نظامٍ وعزم.

Verse 8

अशोभत मुखे तस्य भीमसेनो महाबल: । नेत्रे शिखण्डी दुर्धर्षो धृष्टद्युम्नश्व॒ पार्षत:,शत्रुओंको युद्धके लिये उद्यत हुए देख यशस्वी पाण्डव युद्धमें अजेय व्यूहराज श्येनके रूपमें संगठित हो शोभा पाने लगे। उस व्यूहके मुखभागमें महाबली भीमसेन शोभा पा रहे थे। नेत्रोंके स्थानमें दुर्धर्ष वीर शिखण्डी तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न खड़े थे

قال سنجيا: وفي ذلك التشكيل كان بهيماسينا شديد البأس يتلألأ في المقدّمة. وفي موضع «العينين» وقف شيخاندين الذي لا يُقهر، ودهرِشتاديومنَ ابنُ پْرِشَتَ، ثابتين لا يزعزعهما هول القتال.

Verse 9

शीर्षे तस्याभवद्‌ वीर: सात्यकि: सत्यविक्रम: । विधुन्वन्‌ गाण्डिवं पार्थों ग्रीवायामभवत्‌ तदा,शिरोभागमें सत्यपराक्रमी वीर सात्यकि और ग्रीवाभागमें गाण्डीवधनुषकी टंकार करते हुए कुन्तीकुमार अर्जुन खड़े हुए

قال سنجيا: عند رأس ذلك التشكيل وقف البطل ساتيَكي، صاحب البأس الصادق الذي لا يخذل. وعند العنق وقف بارثا (أرجونا)، يهزّ قوس غانديفا حتى دوّى صوته، مُعلِنًا الاستعداد والعزم حين اكتمل نظام القتال.

Verse 10

अक्षौहिण्या सम॑ तत्र वामपक्षो5भवत्‌ तदा | महात्मा द्रुपद: श्रीमान्‌ सह पुत्रेण संयुगे,पुत्रसहित श्रीमान्‌ महात्मा ट्रपद एक अक्षौहिणी सेनाके साथ युद्धमें बायें पंखके स्थानमें खड़े थे

قال سنجيا: هناك، في ذلك الحين، تكوَّن الجناح الأيسر من أكشوهِني (akṣauhiṇī) كاملة. ووقف الملك دروبادا، المشرق ذو النفس العظيمة، مع ابنه في ساحة القتال ضمن ذلك الترتيب.

Verse 11

दक्षिणश्वाभवत्‌ पक्ष: कैकेयो5क्षौहिणीपति: । पृष्ठतो द्रौपदेयाश्व सौभद्रश्नापि वीर्यवान्‌,एक अक्षौहिणी सेनाके अधिपति केकय दाहिने पंखमें स्थित हुए। द्रौपदीके पाँचों पुत्र और पराक्रमी सुभद्राकुमार अभिमन्यु--ये पृष्ठभागमें खड़े हुए

قال سنجيا: وعلى الجناح الأيمن وقف قائد الكيكايا، سيدُ أكشوهِني واحدة. وفي المؤخرة وُضع أبناء دروبادي الخمسة، ومعهم ابن سوبهادرا الشجاع (أبهِمانيو)، ليكونوا سندًا واحتياطًا.

Verse 12

पृष्ठे समभवच्छीमान्‌ स्वयं राजा युधिष्ठिर: । भ्रातृभ्यां सहितो वीरो यमाभ्यां चारुविक्रम:,उत्तम पराक्रमसे सम्पन्न स्वयं श्रीमान्‌ वीर राजा युधिष्ठिर भी अपने दो भाई नकुल और सहदेवके साथ पृष्ठभागमें ही सुशोभित हुए

قال سنجيا: وفي مؤخرة الصفّ اتخذ الملك يودهيشثيرا، المشرق المجد، موضعه بنفسه؛ ذلك البطل ذو البأس الحسن، ومعه توأما يَمَا—ناكولا وسهاديفا.

Verse 13

प्रविश्य तु रणे भीमो मकरं मुखतस्तदा । भीष्ममासाद्य संग्रामे छादयामास सायकै:,तदनन्तर भीमसेनने रणक्षेत्रमें प्रवेश करके मकर-व्यूहके मुखभागमें खड़े हुए भीष्मको अपने सायकोंसे आच्छादित कर दिया

قال سنجيا: ثم اندفع بهيما إلى غمار القتال، ولما بلغ بهيشما القائم في مقدّمة تشكيل «المكارا»، غطّاه في المعركة بوابل كثيف من السهام.

Verse 14

ततो भीष्मो महास्त्राणि पातयामास भारत । मोहयन्‌ पाण्दुपुत्राणां व्यूढं सैन्यं महाहवे,भारत! तब उस महासमरमें पाण्डवोंकी उस व्यूहबद्ध सेनाको मोहित करते हुए भीष्म उसपर बड़े-बड़े अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे

قال سنجيا: عندئذٍ يا منحدرَ بهاراتا، أخذ بهيشما يُمطر أسلحةً عظيمة. وفي ذلك القتال الهائل أوقع أبناء باندو في الحيرة، وضرب جيشهم وهو مصطفٌّ في تشكيله القتالي.

Verse 15

सम्मुहृति तदा सैन्ये त्वरमाणो धनंजय: । भीष्मं शरसहस्त्रेण विव्याध रणमूर्थनि,उस समय अपनी सेनाको मोहित होती देख अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ युद्धके मुहानेपर एक हजार बाणोंकी वर्षा करके भीष्मको घायल कर दिया

قال سنجيا: حين رأى جيشه وقد أصابه الاضطراب، أسرع دهننجايا (أرجونا) بعزمٍ حاسم، فطعن بهيشما في مقدّمة القتال، واخترقه بألف سهم.

Verse 16

प्रतिसंवार्य चास्त्राणि भीष्ममुक्तानि संयुगे | स्वेनानीकेन हृष्टेन युद्धाय समुपस्थित:,संग्राममें भीष्मके छोड़े हुए सम्पूर्ण अस्त्रोंका निवारण करके हर्षमें भरी हुई अपनी सेनाके साथ वे युद्धके लिये उपस्थित हुए

قال سنجيا: وبعد أن صدَّ وأبطل في المعمعة جميع الأسلحة التي أطلقها بهيشما، وقف مستعدًّا للقتال، ومعه جيشه وقد امتلأ من جديد بالثقة والنشوة القتالية.

Verse 17

ततो दुर्योधनो राजा भारद्वाजमभाषत । पूर्व दृष्टवा वर्धं घोरं बलस्य बलिनां वर:,तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महारथी राजा दुर्योधनने पहले जो अपनी सेनाका घोर संहार हुआ था, उसको दृष्टिमें रखते हुए और युद्धमें भाइयोंके वधका स्मरण करते हुए भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यसे कहा--“निष्पाप आचार्य! आप सदा ही मेरा हित चाहनेवाले हैं

ثم خاطب الملك دُريودَهَنَ ابنَ بهارَدْفاجا (دْرونا). وقد كان قد شهد من قبلُ المذبحةَ المروِّعة التي حلّت بجنده، فتكلّم ذلك المتقدّمُ بين الأقوياء بكلامٍ صاغته قسوةُ الحرب وضرورةٌ عاجلةٌ لانتزاع المزيّة بالمشورة والقيادة.

Verse 18

भ्रातृणां च वध युद्धे स्मरमाणो महारथ: । आचार्य सततं हि त्वं हितकामो ममानघ,तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महारथी राजा दुर्योधनने पहले जो अपनी सेनाका घोर संहार हुआ था, उसको दृष्टिमें रखते हुए और युद्धमें भाइयोंके वधका स्मरण करते हुए भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यसे कहा--“निष्पाप आचार्य! आप सदा ही मेरा हित चाहनेवाले हैं

قال سنجيا: إنّ الفارسَ العظيمَ على العربة (دُريودَهَنَ)، وهو يستحضرُ قتلَ ذوي قرباه في المعركة ويتذكّرُ موتَ إخوته، خاطبَ دْرونَاتشاريا ابنَ بهارَدْفاجا: «يا أيها المعلّمُ الطاهرُ من الإثم، إنك على الدوام طالبٌ لخيرِي».

Verse 19

वयं हि त्वां समाश्रित्य भीष्म॑ं चैव पितामहम्‌ । देवानपि रणे जेतु प्रार्थयामो न संशय:,“हमलोग आप तथा पितामह भीष्मकी शरण लेकर देवताओंको भी समरभूमिमें जीतनेकी अभिलाषा रखते हैं, इसमें संशय नहीं है। फिर जो बल और पराक्रममें हीन हैं, उन पाण्डवोंको जीतना कौन बड़ी बात है। आपका कल्याण हो। आप ऐसा प्रयत्न करें जिससे पाण्डव मारे जायँ

قال سنجيا: «إنّا، معتمدين عليك وعلى بهيشما الجدّ الأكبر، نطمع واثقين أن نغلب حتى الآلهة في ساحة القتال—ولا ريب في ذلك. فكيف يكون إذن غلبُ أبناء باندو، وهم أدنى قوةً وبأسًا، أمرًا عظيمًا؟ عافاك الله؛ فابذل جهدك على وجهٍ يُقتل فيه الباندافا.»

Verse 20

किमु पाण्डुसुतान्‌ युद्धे हीनवीर्यपराक्रमान्‌ । स तथा कुरु भद्रें ते यथा वध्यन्ति पाण्डवा:,“हमलोग आप तथा पितामह भीष्मकी शरण लेकर देवताओंको भी समरभूमिमें जीतनेकी अभिलाषा रखते हैं, इसमें संशय नहीं है। फिर जो बल और पराक्रममें हीन हैं, उन पाण्डवोंको जीतना कौन बड़ी बात है। आपका कल्याण हो। आप ऐसा प्रयत्न करें जिससे पाण्डव मारे जायँ

قال سنجيا: «فكم بالحري في القتال مع أبناء باندو، وهم أدنى قوةً وشجاعةً؟ لذلك، ولخيرك، افعل على وجهٍ يُقتل فيه الباندافا.»

Verse 21

एवमुक्तस्ततो द्रोणस्तव पुत्रेण मारिष । (उवाच तत्र राजानं संक्रुद्ध इव नि:श्वसन्‌ । आर्य! आपके पुत्र दुर्योधनके ऐसा कहनेपर द्रोणाचार्य कुछ कुपित-से हो उठे और लंबी साँस खींचते हुए राजा दुर्योधनसे बोले। द्रोण उवाच बालिशस्त्वं न जानीषे पाण्डवानां पराक्रमम्‌ | न शक्‍्या हि यथा जेतुं पाण्डवा हि महाबला: ।। यथाबलं यथावीर्य कर्म कुर्यामहं हि ते । द्रोणाचार्यने कहा--तुम नादान हो। पाण्डवोंका पराक्रम कैसा है, यह नहीं जानते। महाबली पाण्डवोंको युद्धमें जीतना असम्भव है, तथापि मैं अपने बल और पराक्रमके अनुसार तुम्हारा कार्य कर सकता हूँ। संजय उवाच इत्युक्त्वा ते सुतं राजन्नभ्यपद्यत वाहिनीम्‌ ।) अभिनत्‌ पाण्डवानीकं प्रेक्षमाणस्य सात्यके:,संजय कहते हैं--राजन्‌! आपके पुत्रसे ऐसा कहकर द्रोणाचार्य पाण्डवोंकी सेनाका सामना करनेके लिये गये। वे सात्यकिके देखते-देखते पाण्डवसेनाको विदीर्ण करने लगे

قال سنجيا: لما خوطِب دْرونا بكلام ابنك، أيها الملك الموقّر، تنفّسَ تنفّسًا شديدًا كأنما اعتراه الغضب، ثم قال هناك للملك دُريودَهَنَ. قال دْرونا: «إنك أحمق؛ لا تعرف بأسَ الباندافا. فالباندافا ذوو القوة العظمى لا يُقهرون حقًّا في ساحة القتال. ومع ذلك فسأؤدي لك ما تريد على قدر قوتي وبسالتي.» قال سنجيا: ثم بعد أن قال ذلك لابنك، أيها الملك، تقدّم دْرونا نحو الجيش، وأمام عيني ساتياكي بدأ يشقّ صفوف الباندافا ويفتّت تشكيلهم القتالي.

Verse 22

सात्यकिस्तु ततो द्रोणं वारयामास भारत | तयो: प्रववृते युद्ध घोररूपं भयावहम्‌,भारत! उस समय सात्यकिने आगे बढ़कर द्रोणाचार्यको रोका। फिर तो उन दोनोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया

قال سنجيا: ثم تقدّم ساتياكي فاعترض درونا، يا بهاراتا. وبينهما اندلعت معركةٌ رهيبةُ الهيئة، مُفزِعةٌ تُلقي الرعب.

Verse 23

शैनेयं तु रणे क्रुद्धों भारद्वाज: प्रतापवान्‌ | अविध्यन्निशितैर्बाणिर्जत्रुदेशे हसन्निव,प्रतापी द्रोणाचार्यने युद्धमें कुपित होकर सात्यकिके गलेकी हँसलीमें हँसते हुए-से पैने बाणोंद्वारा प्रहार किया

قال سنجيا: وفي غمار القتال، اشتعل بهاردفاجا الجبّار (دروناآتشاريّا) غضبًا، فضرب شاينيَيا (ساتياكي) بسهامٍ حادّة عند موضع الترقوة/مفصل العنق، كأنه يضحك.

Verse 24

भीमसेनस्तत: क्रुद्धों भारद्वाजमविध्यत । संरक्षन्‌ सात्यकिं राजन्‌ द्रोणाच्छस्त्रभृतां वरात्‌,राजन्‌! तब भीमसेनने कुपित होकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यसे सात्यकिकी रक्षा करते हुए आचार्यको अपने बाणोंसे बींध डाला

قال سنجيا: ثم إن بهيماسينا، وقد استبدّ به الغضب، أصاب بهاردفاجا (درونا) بسهامه. أيها الملك، وبينما كان يذود عن ساتياكي من درونا—وهو أبرع حملة السلاح—ثقب بهيما المعلّم بسهامه.

Verse 25

ततो द्रोणश्र भीष्मश्ष तथा शल्यश्ल मारिष | भीमसेन रणे क्रुद्धाश्छादयांचक्रिरे शरै:,आर्य! तदनन्तर द्रोणाचार्य, भीष्म तथा शल्य तीनोंने कुपित होकर भीमसेनको युद्धस्थलमें अपने बाणोंसे ढक दिया

قال سنجيا: ثم، أيها النبيل، إن درونا وبيشما وشاليا—وقد استبدّ بهم الغضب في ساحة القتال—أغرقوا بهيماسينا بوابلٍ من السهام حتى غطّوه.

Verse 26

तत्राभिमन्यु: संक्रुद्धो द्रौपदेयाश्न मारिष । विव्यधुर्निशितैर्बाणै: सर्वास्तानुद्यतायुधान्‌,महाराज! तब वहाँ क्रोधमें भरे हुए अभिमन्यु और द्रौपदीके पुत्रोंने आयुध लेकर खड़े हुए उन सब कौरव महारथियोंको तीखे बाणोंसे घायल कर दिया

قال سنجيا: هناك، اشتدّ غضب أبهيمانيو، ومعه أبناء دروبادي، أيها الجليل، فأصابوا جميع أولئك العظماء من محاربي الكورافا الواقفين بأسلحتهم مرفوعة بسهامٍ حادّة فأدموهم.

Verse 27

द्रोणभीष्मौ तु संक़्रुद्धावापतन्ती महाबलौ | प्रत्युद्ययौ शिखण्डी तु महेष्वासो महाहवे

قال سانجيا: إنّ درونا وبهِيشما، وهما من عِظام المحاربين ذوي البأس، اندفعا غاضبَين إلى الأمام. وفي تلك المعركة العظمى تقدّم شيكاندي، الرامي البارع، ليلاقيهما بهجومٍ مضاد.

Verse 28

उस समय कुपित होकर आक्रमण करते हुए महा-बली द्रोणाचार्य और भीष्मका उस महासमरमें सामना करनेके लिये महाधनुर्धर शिखण्डी आगे बढ़ा ।। प्रगृह्दा बलवद्‌ वीरो धनुर्जलदनि:स्वनम्‌ | अभ्यवर्षच्छरैस्तूर्ण छादयानो दिवाकरम्‌,उस वीरने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले अपने धनुषको बलपूर्वक खींचकर बड़ी शीघ्रताके साथ इतने बाणोंकी वर्षा की कि सूर्य भी आच्छादित हो गये

قال سانجيا: عندئذٍ تقدّم شيكاندي، الرامي العظيم القوة، غاضبًا مهاجمًا في تلك المعركة الكبرى ليواجه دروناتشاريا وبهِيشما. أمسك قوسه الذي يزمجر كالسحاب الرعدي، وشدّه بقوة، ثم أمطر السهام سريعًا حتى بدا كأن الشمس نفسها قد حُجِبت.

Verse 29

शिखण्डिनं समासाद्य भरतानां पितामह: । अवर्जयत संग्राम॑ स्त्रीत्वं तस्यानुसंस्मरन्‌,भरतकुलके पितामह भीष्मने शिखण्डीके सामने पहुँचकर उसके स्त्रीत्वका बारंबार स्मरण करते हुए युद्ध बंद कर दिया

قال سانجيا: لما واجه بِهيشما، جدَّ آل بهاراتا، شيكاندين وجهًا لوجه، كفَّ عن القتال، وهو يذكّر نفسه مرارًا بأن شيكاندين وُلد أنثى.

Verse 30

ततो द्रोणो महाराज अभ्यद्रवत तं रणे । रक्षमाणस्तदा भीष्मं तव पुत्रेण चोदित:,महाराज! यह देखकर द्रोणाचार्य युद्धमें आपके पुत्रके कहनेसे भीष्मकी रक्षाके लिये शिखण्डीकी ओर दौड़े

قال سانجيا: ثم اندفع درونا، أيها الملك، نحوه في ساحة القتال—بدافعٍ من ابنك—قاصدًا في تلك اللحظة حماية بِهيشما.

Verse 31

शिखण्डी तु समासाद्य द्रोणं शस्त्रभूृतां वरम्‌ । अवर्जयत संत्रस्तो युगान्ताग्निमिवोल्बणम्‌,शिखण्डी प्रलयकालकी प्रचण्ड अग्निके समान शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणका सामना पड़नेपर भयभीत हो युद्ध छोड़कर चल दिया

قال سانجيا: غير أنّ شيكاندي، لما واجه درونا—وهو أبرع حملة السلاح—داهمه الفزع فانصرف عنه، كما يرتدّ المرء عن نارٍ مستعرة كأنها نار نهاية الدهر.

Verse 32

ततो बलेन महता पुत्रस्तव विशाम्पते । जुगोप भीष्ममासाद्य प्रार्थयानो महद्‌ यश:

قال سانجيا: ثم بعد ذلك، يا سيدَ الناس، إن ابنك—مُسنَدًا بقوةٍ عظيمة—تقدّم إلى بهيشما، فالتمس حمايته ووضع نفسه في كنفه، طامحًا إلى مجدٍ عظيم.

Verse 33

प्रजानाथ! तदनन्तर आपका पुत्र दुर्योधन महान्‌ यश पानेकी इच्छा रखता हुआ अपनी विशाल सेनाके साथ भीष्मके पास पहुँचकर उनकी रक्षा करने लगा ।। तथैव पाण्डवा राजन्‌ पुरस्कृत्य धनंजयम्‌ | भीष्ममेवाभ्यवर्तन्त जये कृत्वा दृढ़ां मतिम्‌,राजन! इसी प्रकार पाण्डव भी विजय-प्राप्तिके लिये दृढ़ निश्चय करके अर्जुनको आगे कर भीष्मपर ही टूट पड़े

يا سيدَ الناس! ثم إن ابنك دُريودَهَنَة، وقد تاقت نفسه إلى نيل مجدٍ عظيم، أتى بهيشما ومعه جيشٌ عريض، وأخذ على عاتقه حمايته. وكذلك، أيها الملك، فإن الباندافا، وقد قدّموا دهننجايا (أرجونا) في المقدّمة، اندفعوا إلى بهيشما اندفاعًا مباشرًا، بعزمٍ راسخ على الظفر.

Verse 34

तद्‌ युद्धमभवद्‌ घोर देवानां दानवैरिव । जयमाकाडुक्षतां संख्ये यशश्व सुमहाद्भुतम्‌,उस युद्धमें विजय तथा अत्यन्त अद्भुत यशकी अभिलाषा रखनेवाले पाण्डवोंका कौरवोंके साथ उसी प्रकार भयंकर युद्ध हुआ, जैसे देवताओंका दानवोंके साथ हुआ था

قال سانجيا: ثم قامت معركةٌ مروّعة بين الباندافا والكاورافا، كحرب الآلهة ضد الدانافا. وفي ذلك الاصطدام، اندفع الباندافا إلى القتال بعزمٍ شديد، يتطلّعون إلى الظفر وإلى صيتٍ عجيبٍ بعيد المدى.

Verse 69

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि पञ्चम दिवसयुद्धारम्भे एकोनसप्ततितमो<5ध्याय:

وهكذا، في «المهابهاراتا» المباركة، ضمن «بهيشما بارفا»—وخاصةً في القسم المتعلّق بمقتل بهيشما—يبدأ قتال اليوم الخامس؛ وهذا هو الفصل التاسع والستون.

Frequently Asked Questions

The dilemma is interpretive and ethical: how to explain failure despite extensive merit-based preparation—whether as the consequence of flawed judgment (rejecting counsel and justice) or as the operation of daiva beyond human control.

Competence, resources, and procedure do not guarantee outcomes if governance is ethically compromised; the chapter juxtaposes disciplined human effort with the epic’s doctrine that results may still be constrained by larger causal orders.

No explicit phalaśruti appears; the meta-commentary functions implicitly through Dhṛtarāṣṭra’s concluding determinism, positioning the episode as a lesson on counsel, causality, and the limits of strategic control.