Adhyaya 38
Bhishma ParvaAdhyaya 3822 Verses

Adhyaya 38

Daivī–Āsurī Sampad-Vibhāga (दैवी–आसुरी संपद्विभागः) | Division of Constructive and Destructive Dispositions

Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Gītā-upaparvan context within Bhīṣma-parva)

Kṛṣṇa enumerates daivī-sampad (constructive endowments) beginning with fearlessness, purity of mind, steadiness in knowledge-discipline, generosity, restraint, sacrificial orientation, self-study, austerity, and straightforwardness; he adds non-injury, truth, absence of anger, renunciation, peace, non-slander, compassion, non-covetousness, gentleness, modesty, and non-restlessness. These qualities are declared to constitute the daivī disposition conducive to liberation. In contrast, he lists āsurī traits—hypocrisy, arrogance, excessive self-regard, anger, harshness, and ignorance—and explains their binding consequences. The chapter outlines the āsurī worldview as lacking clarity about pravṛtti/nivṛtti (what to pursue/avoid), denying moral grounding, and becoming driven by insatiable desire, pride, and acquisitive conduct. It identifies desire, anger, and greed as a triadic “gate” leading to self-destruction and prescribes their abandonment. The discourse concludes with a procedural rule: one who discards śāstra and acts from impulse does not attain fulfillment, well-being, or the highest end; therefore śāstra is affirmed as the pramāṇa (authoritative measure) for determining proper and improper action.

Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के रण-तट पर, जहाँ शंखनाद और रथों की घरघराहट के बीच अर्जुन का मन अभी-अभी ज्ञान से स्थिर हुआ है, श्रीकृष्ण अब उस साधक-मार्ग को खोलते हैं जो युद्ध के बीच भी शांति का आश्रय बन सकता है—भक्ति का मार्ग। → अर्जुन के भीतर एक सूक्ष्म जिज्ञासा उठती है: सगुण-साकार परमेश्वर की उपासना श्रेष्ठ है या निर्गुण-अव्यक्त ब्रह्म की? श्रीकृष्ण दोनों मार्गों का मान रखते हुए बताते हैं कि अव्यक्त की साधना देहाभिमानी मनुष्यों के लिए क्लेशमयी और कठिन है; वहीं इन्द्रियों को संयमित कर, समबुद्धि होकर, सर्वभूतहित में रत साधक भी परमगति को प्राप्त होते हैं। → भक्ति-योगी के लक्षणों का उद्घोष: जो निरन्तर संतुष्ट है, यतात्मा है, दृढ़निश्चयी है, जिसने मन-बुद्धि मुझे अर्पित कर दी है—वही मुझे प्रिय है; और जो शत्रु-मित्र, मान-अपमान, शीत-उष्ण, सुख-दुःख में सम है, आसक्ति-रहित है—उसकी भक्ति सिद्धि का शिखर बनती है। → श्रीकृष्ण आदर्श भक्त के गुणों को मानक बनाकर साधक को दिशा देते हैं: श्रद्धा, समता, इन्द्रिय-निग्रह, और सर्वभूत-हित—यही वह आचरण है जो युद्ध के कोलाहल में भी आत्मा को परमात्मा से जोड़ देता है। → भक्ति के इन मानदण्डों को सुनकर अर्जुन के भीतर यह प्रश्न जागता है कि रणभूमि में कर्म करते हुए इन गुणों को कैसे साधा जाए—और यही आगे के उपदेश का द्वार खोलता है।

Shlokas

Verse 1

७, अग्निपुराण २७३। ४)। कहीं इनको कश्यपके औरस पुत्र और अदितिके गर्भसे उत्पन्न (वाल्मीकीय रामायण अरण्य० १४। १४) तथा कहीं ब्रह्माके कानोंसे उत्पन्न भी माना गया है (वायुपुराण ६५।५७)। कल्पभेदसे सभी वर्णन यथार्थ हैं। ५. यहाँ अर्जुनको “गुडाकेश” नामसे सम्बोधित करके भगवान्‌ यह भाव दिखलाते हैं कि तुम निद्राके स्वामी हो, अत: सावधान होकर मेरे रूपको भलीभाँति देखो, ताकि किसी प्रकारका संशय या भ्रम न रह जाय। ६. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि तुमने मेरे जिस रूपके दर्शन करनेकी इच्छा प्रकट की है, उसे दिखलानेमें जरा भी विलम्ब नहीं कर रहा हूँ, इच्छा प्रकट करते ही मैं अभी दिखला रहा हूँ। ७. पशु, पक्षी, कीट, पतंग और देव, मनुष्य आदि चलने-फिरनेवाले प्राणियोंको “चर” कहते हैं तथा पहाड़, वृक्ष आदि एक जगह स्थिर रहनेवालोंको “अचर” कहते हैं। ऐसे समस्त प्राणियोंके तथा उनके शरीर, इन्द्रिय, भोगस्थान और भोगसामग्रियोंके सहित समस्त ब्रह्माण्डका वाचक यहाँ “चराचरसहित सम्पूर्ण जगत” शब्द है। इससे भगवान्‌ने अर्जुनको यह बतलाया है कि इसी मेरे शरीरके एक अंशमें तुम समस्त जगत्‌को स्थित देखो। अर्जुनको भगवानने गीताके दसवें अध्यायके अन्तिम श्लोकमें जो यह बात कही थी कि मैं इस समस्त जगत्‌को एक अंशमें धारण किये स्थित हूँ, उसी बातको यहाँ उन्हें प्रत्यक्ष दिखला रहे हैं। ८. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि इस वर्तमान सम्पूर्ण जगत्‌को देखनेके अतिरिक्त और भी मेरे गुण, प्रभाव आदिके द्योतक कोई दृश्य, अपने और दूसरोंके जय-पराजयके दृश्य अथवा जो कुछ भी भूत, भविष्य और वर्तमानकी घटनाएँ देखनेकी तुम्हारी इच्छा हो, उन सबको तुम इस समय मेरे शरीरके एक अंभमें प्रत्यक्ष देख सकते हो। ३. भगवानने अर्जुनको विश्वरूपका दर्शन करनेके लिये अपने योगबलसे एक प्रकारकी योगशक्ति प्रदान की थी, जिसके प्रभावसे अर्जुनमें अलौकिक सामर्थ्यका प्रादुर्भाव हो गया--उस दिव्य रूपको देख सकनेकी योग्यता प्राप्त हो गयी। इसी योगशक्तिका नाम दिव्य दृष्टि है। ऐसी ही दिव्य दृष्टि श्रीवेदव्यासजीने संजयको भी दी थी। अर्जुनको जिस रूपके दर्शन हुए थे, वह दिव्य था। उसे भगवानूने अपनी अद्भुत योगशक्तिसे ही प्रकट करके अर्जुनको दिखलाया था। अतः उसके देखनेसे ही भगवान्‌की अद्भुत योग- शक्तिके दर्शन आप ही हो गये। २. संजयके इस कथनका भाव यह है कि श्रीकृष्ण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे बड़े-से-बड़े योगेश्वर और सब पापों तथा दुःखोंके नाश करनेवाले साक्षात्‌ परमेश्वर हैं। उन्होंने अर्जुनको अपना जो दिव्य विश्वरूप दिखलाया था, जिसका वर्णन करके मैं अभी आपको सुनाऊँगा, वह रूप बड़े-से-बड़े योगी भी नहीं दिखला सकते; उसे तो एकमात्र स्वयं परमेश्वर ही दिखला सकते हैं। 3. भगवानने अपना जो विराट्‌ स्वरूप अर्जुनको दिखलाया था, वह अलौकिक, दिव्य, सर्वश्रेष्ठ और तेजोमय था, साधारण जगत्‌की भाँति पांचभौतिक पदार्थोंसे बना हुआ नहीं था; भगवानने अपने परम प्रिय भक्त अर्जुनपर अनुग्रह करके अपना अद्भुत प्रभाव उसको समझानेके लिये ही अपनी अद्भुत योगशक्तिके द्वारा उस रूपको प्रकट करके दिखलाया था। ४. चन्दन आदि जो लौकिक गन्ध हैं, उनसे विलक्षण अलौकिक गन्धको “दिव्य गन्ध” कहते हैं। ऐसे दिव्य गन्धका अनुभव प्राकृत इन्द्रियोंसे न होकर दिव्य इन्द्रियोंद्वारा ही किया जा सकता है। जिसके समस्त अंगोंमें इस प्रकारका अत्यन्त मनोहर दिव्य गन्ध लगा हो, उसको “दिव्यगन्धानुलेपन” कहते हैं। ५. भगवानके उस विराट्रूपमें उपर्युक्त प्रकारसे मुख, नेत्र, आभूषण, शस्त्र, माला, वस्त्र और गन्ध आदि सभी आश्चर्यजनक थे; इसलिये उन्हें 'सर्वाश्चर्यमय” कहा गया है। ६. जो प्रकाशमय और पूज्य हों, उन्हें 'देव” कहते हैं। ७. अर्जुनने भगवान्‌का जो रूप देखा, उसके प्रधान नेत्र तो चन्द्रमा और सूर्य बतलाये गये हैं (गीता ११। १९) परंतु उसके अंदर दिखलायी देनेवाले और भी असंख्य विभिन्न मुख और नेत्र थे, इसीसे भगवान्‌को अनेक मुखों और नेत्रसे युक्त बतलाया गया है। ८. भगवानके उस विराट रूपमें अर्जुनने ऐसे असंख्य अलौकिक विचित्र दृश्य देखे थे, इसी कारण उनके लिये यह विशेषण दिया गया है। ९. जो गहने लौकिक गहनोंसे विलक्षण, तेजोमय और अलौकिक हों, उन्हें “दिव्य” कहते हैं तथा जो रूप ऐसे असंख्य दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो, उसे 'अनेकदिव्याभरण” कहते हैं। १०. जो आयुध अलौकिक तथा तेजोमय हों, उनको “दिव्य” कहते हैं--जैसे भगवान्‌ विष्णुके चक्र, गदा और धनुष आदि हैं। इस प्रकारके असंख्य दिव्य शस्त्र भगवानने अपने हाथोंमें उठा रखे थे। ३३१. विश्वरूप भगवानने अपने गलेमें बहुत-सी सुन्दर-सुन्दर तेजोमय अलौकिक मालाएँ धारण कर रखी थीं तथा वे अनेक प्रकारके बहुत ही उत्तम तेजोमय अलौकिक वस्त्रोंसे सुसज्जित थे, इसलिये उनके लिये यह विशेषण दिया गया है। $. इसके द्वारा विराट्स्वरूप भगवान्‌के दिव्य प्रकाशको निरुपम बतलाया गया है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार हजारों तारे एक साथ उदय होकर भी सूर्यकी समानता नहीं कर सकते, उसी प्रकार हजार सूर्य यदि एक साथ आकाशमें उदय हो जायेँ तो उनका प्रकाश भी उस विराट्स्वरूप भगवान्‌के प्रकाशकी समानता नहीं कर सकता। इसका कारण यह है कि सूर्योंका प्रकाश अनित्य, भौतिक और सीमित है; परंतु विराट्स्वरूप भगवान्‌का प्रकाश नित्य, दिव्य, अलौकिक और अपरिमित है। २. यहाँ यह भाव दिखलाया गया है कि देवता-मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग और वृक्ष आदि भोक्तृवर्ग, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग और पाताल आदि भोग्यस्थान एवं उनके भोगनेयोग्य असंख्य सामग्रियोंके भेदसे विभक्त--इस समस्त ब्रह्माण्डको अर्जुनने भगवानके शरीरके एक देशमें देखा। गीताके दसवें अध्यायके अन्तमें भगवानने जो यह बात कही थी कि इस सम्पूर्ण जगत्‌को मैं एक अंशमें धारण किये हुए स्थित हूँ, उसीको यहाँ अर्जुनने प्रत्यक्ष देखा। 3. इस कथनका अभिप्राय यह है कि भगवान्‌के उस रूपको देखकर अर्जुनको इतना महान्‌ हर्ष और आश्चर्य हुआ, जिसके कारण उसी क्षण उनका समस्त शरीर पुलकित हो गया। उन्होंने इससे पूर्व भगवानका ऐसा ऐश्वर्यपूर्ण स्वरूप कभी नहीं देखा था; इसलिये इस अलौकिक रूपको देखते ही उनके हृदयपटपर सहसा भगवान्‌के अपरिमित प्रभावका कुछ अंश अंकित हो गया, भगवान्‌का कुछ प्रभाव उनकी समझमें आया। इससे उनके हर्ष और आश्वर्यकी सीमा न रही। ४. अर्जुनने जब भगवानका ऐसा अनन्त आश्वर्यमय दृश्योंसे युक्त परम प्रकाशभय और असीम ऐश्वर्यसमन्वित महान्‌ स्वरूप देखा, तब उससे वे इतने प्रभावित हुए कि उनके मनमें जो पूर्व जीवनकी मित्रताका एक भाव था, वह सहसा विलुप्त-सा हो गया; भगवान्‌की महिमाके सामने वे अपनेको अत्यन्त तुच्छ समझने लगे। भगवान्‌के प्रति उनके हृदयमें अत्यन्त पूज्यभाव जाग्रत्‌ हो गया और उस पूज्यभावके प्रवाहने बिजलीकी तरह गति उत्पन्न करके उनके मस्तकको उसी क्षण भगवानके चरणोंमें टिका दिया और वे हाथ जोड़कर बड़े ही विनम्रभावसे श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान्‌का स्तवन करने लगे। ५. ब्रह्मा और शिव देवोंके भी देव हैं तथा ईश्वरकोटिमें हैं, इसलिये उनके नाम विशेषरूपसे लिये गये हैं। एवं ब्रह्माको 'कमलके आसनपर विराजित” बतलाकर अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि मैं भगवान्‌ विष्णुकी नाभिसे निकले हुए कमलपर विराजित ब्रह्माको देख रहा हूँ अर्थात्‌ उन्हींके साथ आपके विष्णुरूपको भी आपके शरीरमें देख रहा हूँ। ६. यहाँ स्वर्ग, मर्त्य और पाताल--तीनों लोकोंके प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंके समुदायकी गणना करके अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि मैं त्रिभुवनात्मक समस्त विश्वको आपके शरीरमें देख रहा हूँ। ७. यहाँ अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आप ही इस समस्त विश्वके कर्ता-हर्ता और सबको अपने- अपने कार्योंमें नियुक्त करनेवाले सबके अधीश्वर हैं और यह समस्त विश्व वस्तुत: आपका ही स्वरूप है, आप ही इसके निमित्त और उपादान कारण हैं। $. अर्जुनको तो भगवानने उस रूपको देखनेके लिये ही दिव्य दृष्टि दी थी और उसीके द्वारा वे उसको देख रहे थे। इस कारण दूसरोंके लिये दुर्निरीक्ष्य होनेपर भी उनके लिये वैसी बात नहीं थी। २. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आपके गुण, प्रभाव, शक्ति और स्वरूप अप्रमेय हैं, अतः उनको कोई भी प्राणी किसी भी उपायसे पूर्णतया नहीं जान सकता। 3. जिस जाननेयोग्य परमतत्त्वको मुमुक्षु पुरुष जाननेकी इच्छा करते हैं, जिसके जाननेके लिये जिज्ञासु साधक नाना प्रकारके साधन करते हैं, गीताके आठवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें जिस परम अक्षरको ब्रह्म बतलाया गया है, उसी परम तत्त्वस्वरूप सच्चिदानन्दघन निर्गुण-निराकार परब्रह्म परमात्माका वाचक यहाँ “वेदितव्यम्‌' और 'परमम” विशेषणोंके सहित 'अक्षरम” पद है। ४. जो सदासे चला आता हो और सदा रहनेवाला हो, उस सनातन (वैदिक) धर्मको 'शाश्वतधर्म” कहते हैं। भगवान्‌ बार-बार अवतार लेकर उसी धर्मकी रक्षा करते हैं, इसलिये भगवान्‌को अर्जुनने 'शाश्वतधर्मगोप्ता” कहा है। ५. यहाँ अर्जुनने यह बतलाया है कि जिनका कभी नाश नहीं होता--ऐसे समस्त जगतके हर्ता, कर्ता, सर्वशक्तिमान्‌, सम्पूर्ण विकारोंसे रहित, सनातन परम पुरुष साक्षात्‌ परमेश्वर आप ही हैं। ६. इस अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुन भगवान्‌के विराट्‌ रूपको असीम बतला ही चुके थे, फिर यहाँ उसे “अनादिमध्यान्त” कहनेका भाव यह है कि वह उत्पत्ति आदि छ: विकारोंसे रहित नित्य है। यहाँ “आदि शब्द उत्पत्तिका, “मध्य” उत्पत्ति और विनाशके बीचमें होनेवाले स्थिति, वृद्धि, क्षय और परिणाम --इन चारों भावविकारोंका और 'अन्त' शब्द विनाशरूप विकारका वाचक है। ये तीनों जिसमें न हों, उसे “अनादिमध्यान्त' कहते हैं। ७. यहाँ अर्जुनने भगवान्‌को “अनन्तवीर्य” कहकर यह भाव दिखलाया है कि आपके बल, वीर्य, सामर्थ्य और तेजकी कोई भी सीमा नहीं है। ८. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आपके इस विराट रूपमें मैं जिस ओर देखता हूँ, उसी ओर मुझे अगणित भुजाएँ दिखलायी दे रही हैं। ९. इससे अर्जुन यह अभिप्राय व्यक्त करते हैं कि आपके इस विराट्स्वरूपमें मुझे सब ओर आपके असंख्य मुख दिखलायी दे रहे हैं; उनमें जो आपका प्रधान मुख है, उस मुखपर नेत्रोंके स्थानमें मैं चन्द्रमा और सूर्यको देख रहा हूँ। १०. समस्त विश्वके महान्‌ आत्मा होनेसे भगवान्‌को “महात्मन्‌' कहा है। ३. 'सुरसंघा:' पदके साथ परोक्षवाची “अमी” विशेषण देकर अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि मैं जब स्वर्गलोक गया था, तब वहाँ जिन-जिन देवसमुदायोंको मैंने देखा था--मैं आज देख रहा हूँ कि वे ही आपके इस विराट्‌ रूपमें प्रवेश कर रहे हैं। २. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि शेष बचे हुए कितने ही देवता अपनी बहुत देरतक बचे रहनेकी सम्भावना न जानकर डरके मारे हाथ जोड़कर आपके नाम और गुणोंका बखान करते हुए आपको प्रसन्न करनेकी चेष्टा कर रहे हैं। 3. इससे अर्जुनने यह व्यक्त किया है कि मरीचि, अंगिरा, भूगु आदि महर्षियोंके और ज्ञाताज्ञात सिद्धजनोंके जितने भी विभिन्न समुदाय हैं, वे आपके तत्त्वका यथार्थ रहस्य जाननेवाले होनेके कारण आपके इस उग्र रूपको देखकर भयभीत नहीं हो रहे हैं; वरं समस्त जगत्‌के कल्याणके लिये प्रार्थना करते हुए अनेकों प्रकारके सुन्दर भावमय स्तोत्रोंद्वारा श्रद्धा और प्रेमपूर्वक आपका स्तवन कर रहे हैं--ऐसा मैं देख रहा हूँ। ४. जो ऊष्म (गरम) अन्न खाते हों, उनको “ऊष्मपा:” कहते हैं। मनुस्मृतिके तीसरे अध्यायके दो सौ सैंतीसवें श्लोकमें कहा है कि पितरलोग गरम अन्न ही खाते हैं। अतएव यहाँ “ऊष्मपा:” पद पितरोंके समुदायका वाचक समझना चाहिये। पितरोंके नाम गीताके दसवें अध्यायके उनतीसवें श्लोककी टिप्पणीमें बतलाये जा चुके हैं। ५. कश्यपजीकी पत्नी मुनि और प्राधासे तथा अरिष्टासे गन्धर्वोकी उत्पत्ति मानी गयी है, ये राग रागिनियोंके ज्ञानमें निपुण हैं और देवलोककी वाद्य-नृत्यकलामें कुशल समझे जाते हैं। यक्षोंकी उत्पत्ति महर्षि कश्यपकी खसा नामक पत्नीसे मानी गयी है। भगवान्‌ शंकरके गणोंमें भी यक्षलोग हैं। इन यक्षोंके और उत्तम राक्षसोंके राजा कुबेर माने जाते हैं। देवताओंके विरोधी दैत्य, दानव और राक्षसोंको असुर कहते हैं। कश्यपजीकी स्त्री दितिसे उत्पन्न होनेवाले 'दैत्य/ और “दनु' से उत्पन्न होनेवाले “दानव” कहलाते हैं। राक्षसोंकी उत्पत्ति विभिन्न प्रकारसे हुई है। कपिल आदि सिद्धजनोंको 'सिद्ध' कहते हैं। इन सबके विभिन्न अनेकों समुदायोंका वाचक यहाँ “गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा:” पद है। ६. ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु और उनचास मरुत्‌--इन चार प्रकारके देवताओंके समूहोंका वर्णन तो गीताके दसवें अध्यायके इक्कीसवें और तेईसवें श्लोकोंकी टिप्पणीमें तथा अश्विनीकुमारोंका ग्यारहवें अध्यायके छठे श्लोककी टिप्पणीमें किया जा चुका है--वहाँ देखना चाहिये। मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु--ये बारह साध्यदेवता हैं-- मनो&्नुमन्ता प्राणश्न नरो यानश्च वीर्यवान्‌ ।। चित्तिहयो नयश्वैव हंसो नारायणस्तथा । प्रभवो5थ विभुश्चैव साध्या द्वादश जज्ञिरे (वायुपुराण ६६।१५-१६) और क्रतु, दक्ष, श्रव, सत्य, काल, काम, धुनि, कुरुवान्‌, प्रभवान्‌ और रोचमान--ये दस विश्वेदेव हैं-- विश्वेदेवास्तु विश्वाया जज्ञिरे दश विश्रुता: । क्रतुर्दक्ष: श्रव: सत्य: काल: कामो धुनिस्तथा । कुरुवान्‌ प्रभवांश्वैव रोचमानश्न ते दश ।। (वायुपुराण ६६।३१-३२) १. भगवान्‌को विष्णु नामसे सम्बोधित करके अर्जुन यह दिखलाते हैं कि आप साक्षात्‌ विष्णु ही पृथ्वीका भार उतारनेके लिये श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हुए हैं। अत: आप मेरी व्याकुलताको दूर करनेके लिये इस विश्वरूपका संवरण करके विष्णुरूपसे प्रकट हो जाइये। २. यहाँ अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि आप समस्त देवताओंके स्वामी, सर्वव्यापी और सम्पूर्ण जगतके परमाधार हैं, इस बातको तो मैंने पहलेसे ही सुन रखा था और मेरा विश्वास भी था कि आप ऐसे ही हैं। आज मैंने आपका वह विराट्स्वरूप प्रत्यक्ष देख लिया। अब तो आपके “देवेश” और “जगन्निवास' होनेमें कोई संदेह ही नहीं रह गया एवं प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करनेका यह भाव है कि 'प्रभो! आपका प्रभाव तो मैंने प्रत्यक्ष देख ही लिया, परंतु आपके इस विराट्‌ रूपको देखकर मेरी बड़ी ही शोचनीय दशा हो रही है; मेरे सुख, शान्ति और धैर्यका नाश हो गया है; यहाँतक कि मुझे दिशाओंका भी ज्ञान नहीं रह गया है। अतएव दया करके अब आप अपने इस विराट्स्वरूपको शीघ्र समेट लीजिये।' 3. वीरवर कर्णसे अर्जुनकी स्वाभाविक प्रतिद्वनद्धिता थी। इसलिये उनके नामके साथ “असौ' विशेषणका प्रयोग करके अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि अपनी शूरवीरताके दर्पमें जो कर्ण सबको तुच्छ समझते थे, वे भी आज आपके विकराल मुखोंमें पड़कर नष्ट हो रहे हैं। ४. इससे अर्जुनने यह दिखलाया है कि केवल धृतराष्ट्रपुत्रोंको ही मैं आपके अंदर प्रविष्ट करते नहीं देख रहा हूँ, उन्हींके साथ मैं उन सब राजाओंके समूहोंको भी आपके अंदर प्रवेश करते देख रहा हूँ, जो दुर्योधनकी सहायता करनेके लिये आये थे। ५. पितामह भीष्म और गुरु द्रोण कौरवसेनाके सर्वप्रधान महान्‌ योद्धा थे। अर्जुनके मतमें इनका परास्त होना या मारा जाना बहुत ही कठिन था। यहाँ उन दोनोंके नाम लेकर अर्जुन यह कह रहे हैं कि 'भगवन्‌! दूसरोंके लिये तो कहना ही क्‍या है; मैं देख रहा हूँ, भीष्म और द्रोण-सरीखे महान्‌ योद्धा भी आपके भयानक विकराल मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं। १. इस श्लोकमें उन भीष्म-द्रोणादि श्रेष्ठ शूरवीर पुरुषोंके प्रवेश करनेका वर्णन किया गया है, जो भगवानकी प्राप्तिके लिये साधन कर रहे थे तथा जिनको बिना ही इच्छाके युद्धमें प्रवृत्त होना पड़ा था और जो युद्धमें मरकर भगवानको प्राप्त करनेवाले थे। इसी हेतुसे उनको “नरलोकके वीर” कहा गया है। वे भौतिक युद्धमें जैसे महान्‌ वीर थे, वैसे ही भगवत्प्राप्तिके साधनरूप आध्यात्मिक युद्धमें भी काम आदि शत्रुओंके साथ बड़ी वीरतासे लड़नेवाले थे। उनके प्रवेशमें नदी और समुद्रका दृष्टान्त देकर अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि जैसे नदियोंके जल स्वाभाविक ही समुद्रकी ओर दौड़ते हैं और अन्तमें अपने नाम- रूपको त्यागकर समुद्र ही बन जाते हैं, वैसे ही ये शूरवीर भक्तजन भी आपकी ओर मुख करके दौड़ रहे हैं और आपके अंदर अभिन्नभावसे प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ मुखोंके साथ 'प्रज्वलित” विशेषण देकर यह भाव दिखलाया गया है कि जैसे समुद्रमें सब ओरसे जल-ही-जल भरा रहता है और नदियोंका जल उसमें प्रवेश करके उसके साथ एकत्वको प्राप्त हो जाता है, वैसे ही आपके सब मुख भी सब ओरसे अत्यन्त ज्योतिर्मय हैं और उनमें प्रवेश करनेवाले शूरवीर भक्तजन भी आपके मुखोंकी महान्‌ ज्योतिमें अपने बाह्मरूपको जलाकर स्वयं ज्योतिर्मय हो आपमें एकताको प्राप्त हो रहे हैं। २. इस श्लोकमें पिछले श्लोकमें बतलाये हुए भक्तोंसे भिन्न उन समस्त साधारण लोगोंके प्रवेशका वर्णन किया गया है, जो इच्छापूर्वक युद्ध करनेके लिये आये थे; इसीलिये प्रज्वलित अग्नि और पतंगोंका दृष्टान्त देकर अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि जैसे मोहमें पड़े हुए पतंग नष्ट होनेके लिये ही इच्छापूर्वक बड़े वेगसे उड़-उड़कर अम्निमें प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी आपके प्रभावको न जाननेके कारण मोहमें पड़े हुए हैं और अपना नाश करनेके लिये ही पतंगोंकी भाँति दौड़-दौड़कर आपके मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं। 3. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि यह इतना भयंकर रूप--जिसमें कौरवपक्षके और हमारे प्रायः सभी योद्धा प्रत्यक्ष नष्ट होते दिखलायी दे रहे हैं--आप मुझे किसलिये दिखला रहे हैं तथा अब निकट भविष्यमें आप क्‍या करना चाहते हैं--इस रहस्यको मैं नहीं जानता। अतएव अब आप कृपा करके इसी रहस्यको खोलकर बतलाइये। ३. इस कथनसे भगवानने अर्जुनके पहले प्रश्नका उत्तर दिया है, जिसमें अर्जुनने यह जानना चाहा था कि आप कौन हैं। भगवानके कथनका अभिप्राय यह है कि मैं सम्पूर्ण जगत्‌का सृजन, पालन और संहार करनेवाला साक्षात्‌ परमेश्वर हूँ। अतएव इस समय मुझको तुम इन सबका संहार करनेवाला साक्षात्‌ काल समझो। २. इस कथनसे भगवानने अर्जुनके उस प्रश्नका उत्तर दिया है, जिसमें अर्जुनने यह कहा था कि “मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जानता।” भगवान्‌के कथनका अभिप्राय यह है कि इस समय मेरी सारी चेष्टाएँ इन सब लोगोंका नाश करनेके लिये ही हो रही हैं, यही बात समझानेके लिये मैंने इस विराट्‌ रूपके अंदर तुझको सबके नाशका भयंकर दृश्य दिखलाया है। 3. इस कथनसे भगवानने यह दिखलाया है कि गुरु, ताऊ, चाचे, मामे और भाई आदि आत्मीय स्वजनोंको युद्धके लिये तैयार देखकर तुम्हारे मनमें जो कायरताका भाव आ गया है और उसके कारण तुम जो युद्धसे हटना चाहते हो--यह उचित नहीं है; क्योंकि यदि तुम युद्ध करके इनको न भी मारोगे, तब भी ये बचेंगे नहीं। इनका तो मरण ही निश्चित है। जब मैं स्वयं इनका नाश करनेके लिये प्रवृत्त हूँ, तब ऐसा कोई भी उपाय नहीं है जिससे इनकी रक्षा हो सके। इसलिये तुमको युद्धसे हटना नहीं चाहिये; तुम्हारे लिये तो मेरी आज्ञाके अनुसार युद्धमें प्रवृत्त होना ही हितकर है। अपने पक्षके योद्धागणोंका अर्जुनके द्वारा मारा जाना सम्भव नहीं है, अतएव “तुम न मारोगे तो भी वे तो मरेंगे ही” ऐसा कथन उनके लिये नहीं बन सकता। इसीलिये भगवानने यहाँ केवल कौरवपक्षके वीरोंके विषयमें कहा है। इसके सिवा अर्जुनको उत्साहित करनेके लिये भी भगवानके द्वारा ऐसा कहा जाना युक्तिसंगत है। भगवान्‌ मानो यह समझा रहे हैं कि शत्रुपक्षके जितने भी योद्धा हैं, वे सब एक तरहसे मरे ही हुए हैं; उन्हें मारनेमें तुम्हें कोई परिश्रम नहीं करना पड़ेगा। ४. 'तस्मात' के साथ “उत्तिष्ठ' क्रियाका प्रयोग करके भगवानने यह भाव दिखलाया है कि जब तुम्हारे युद्ध न करनेपर भी ये सब नहीं बचेंगे, नि:संदेह मरेंगे ही, तब तुम्हारे लिये युद्ध करना ही सब प्रकारसे लाभप्रद है। अतएव तुम किसी प्रकारसे भी युद्धसे हटो मत, उत्साहके साथ खड़े हो जाओ। ५. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि इस युद्धमें तुम्हारी विजय निश्चित है; अतएव शत्रुओंको जीतकर धन-धान्यसे सम्पन्न महान्‌ राज्यका उपभोग करो और दुर्लभ यश प्राप्त करो, इस अवसरको हाथसे न जाने दो। &. जो बायें हाथसे भी बाण चला सकता हो, उसे “सव्यसाची” कहते हैं। यहाँ भगवानने यह भाव दिखलाया है कि तुम तो दोनों ही हाथोंसे बाण चलानेमें अत्यन्त निपुण हो, तुम्हारे लिये इन शूरवीरोंपर विजय प्राप्त करना कौन-सी बड़ी बात है। फिर इन सबको तो वस्तुतः तुम्हें मारना ही क्या पड़ेगा, तुमने प्रत्यक्ष देख ही लिया कि सब-के-सब मेरे द्वारा पहलेहीसे मारे हुए हैं। तुम्हारा तो सिर्फ नामभर होगा। अतएव अब तुम इन्हें मारनेमें जरा भी हिचको मत। मार तो मैंने रखा ही है, तुम तो केवल निमित्तमात्र बन जाओ। निमित्तमात्र बननेके लिये कहनेका एक भाव यह भी है कि इन्हें मारनेपर तुम्हें किसी प्रकारका पाप होगा, इसकी भी सम्भावना नहीं है; क्योंकि तुम तो क्षात्रधर्मके अनुसार कर्तव्यरूपसे प्राप्त युद्धमें इन्हें मारनेमें एक निमित्तभर बनते हो। इससे पापकी बात तो दूर रही, तुम्हारे द्वारा उलटा क्षात्रधर्मका पालन होगा। अतएव तुम्हें अपने मनमें किसी प्रकारका संशय न रखकर, अहंकार और ममतासे रहित होकर उत्साहपूर्वक युद्धमें ही प्रवृत्त होना चाहिये। $. द्रोणाचार्य धनुर्वेद तथा अन्यान्य शस्त्रास्त्र-प्रयोगकी विद्यामें अत्यन्त पारंगत और युद्धकलामें परम निपुण थे। यह बात प्रसिद्ध थी कि जबतक उनके हाथमें शस्त्र रहेगा, तबतक उन्हें कोई भी मार नहीं सकेगा। इस कारण अर्जुन उन्हें अजेय समझते थे और साथ ही गुरु होनेके कारण अर्जुन उनको मारना पाप भी मानते थे। भीष्मपितामहकी शूरता जगत्प्रसिद्ध थी। परशुराम-सरीखे अजेय वीरको भी उन्होंने छका दिया था। साथ ही पिता शान्तनुका उन्हें यह वरदान था कि उनकी बिना इच्छाके मृत्यु भी उन्हें नहीं मार सकेगी। इन सब कारणोंसे अर्जुनकी यह धारणा थी कि पितामह भीष्मपर विजय प्राप्त करना सहज कार्य नहीं है, इसीके साथ-साथ वे पितामहका अपने हाथों वध करना पाप भी समझते थे। उन्होंने कई बार कहा भी है, मैं इन्हें नहीं मारना चाहता। जयद्रथ स्वयं बड़े वीर थे और भगवान्‌ शंकरके भक्त होनेके कारण उनसे दुर्लभ वरदान पाकर अत्यन्त दुर्जय हो गये थे। फिर दुर्योधनकी बहिन दुःशलाके स्वामी होनेसे ये पाण्डवोंके बहनोई भी लगते थे। स्वाभाविक ही सौजन्य और आत्मीयताके कारण अर्जुन उन्हें भी मारनेमें हिचकते थे। कर्णको भी अर्जुन किसी प्रकार भी अपनेसे कम वीर नहीं मानते थे। संसारभरमें प्रसिद्ध था कि अर्जुनके योग्य प्रतिद्वन्द्दी कर्ण ही हैं। ये स्वयं बड़े ही वीर थे और परशुरामजीके द्वारा दुर्लभ शस्त्रविद्याका इन्होंने अध्ययन किया था। इसीलिये इन चारोंके पृथक्‌ू-पृथक्‌ नाम लेकर और इनके अतिरिक्त भगदत्त, भूरिश्रवा और शल्यप्रभृति जिन-जिन योद्धाओंको अर्जुन बहुत बड़े वीर समझते थे और जिनपर विजय प्राप्त करना आसान नहीं समझते थे, उन सबका लक्ष्य कराते हुए उन सबको अपने द्वारा मारे हुए बतलाकर और उन्हें मारनेके लिये आज्ञा देकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि तुमको किसीपर भी विजय प्राप्त करनेमें किसी प्रकारका भी संदेह नहीं करना चाहिये। ये सभी मेरे द्वारा मारे हुए हैं। साथ ही इस बातका भी लक्ष्य करा दिया है कि तुम जो इन गुरुजनोंको मारनेमें पापकी आशंका करते थे, वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि क्षत्रियधर्मानुसार इन्हें मारनेके जो तुम निमित्त बनोगे, इसमें तुम्हें कोई भी पाप नहीं होगा, वरं धर्मका ही पालन होगा। अतएव उठो और इनपर विजय प्राप्त करो। २. इससे भगवानने अर्जुनको आश्वासन दिया है कि मेरे उग्ररूपको देखकर तुम जो इतने भयभीत और व्यथित हो रहे हो, यह ठीक नहीं है। मैं तुम्हारा प्रिय वही कृष्ण हूँ। इसलिये तुम न तो जरा भी भय करो और न संतप्त ही होओ। 3. अर्जुनके मनमें जो इस बातकी शंका थी कि न जाने युद्धमें हम जीतेंगे या हमारे ये शत्रु ही हमको जीतेंगे (गीता २।६), उस शंकाको दूर करनेके लिये भगवानने ऐसा कहा है। भगवानके कथनका अभिप्राय यह है कि युद्धमें निश्चय ही तुम्हारी विजय होगी, इसलिये तुम्हें उत्साहपूर्वक युद्ध करना चाहिये। ४. अर्जुनके मस्तकपर देवराज इन्द्रका दिया हुआ सूर्यके समान प्रकाशमय दिव्य मुकुट सदा रहता था, इसीसे उनका एक नाम “किरीटी” पड़ गया था। स्वयं अर्जुनने विराटपुत्र उत्तरकुमारसे कहा है-- पुरा शक्रेण मे दत्तं युध्यतो दानवर्षभै: । किरीटं मूर्श्नि सूर्याभं तेनाहुर्मा किरीटिनम्‌ ।। (महा०, विराट० ४४।१७) ५. इससे संजयने यह भाव दिखलाया है कि श्रीकृष्णके उस घोर रूपको देखकर अर्जुन इतने व्याकुल हो गये कि भगवान्‌के इस प्रकार आश्वासन देनेपर भी उनका डर दूर नहीं हुआ; इसलिये वे डरके मारे काँपते हुए ही भगवान्से उस रूपका संवरण करनेके लिये प्रार्थना करने लगे। ३. इससे संजयने यह भाव दिखलाया है कि भगवान्‌के अनन्त ऐश्वर्यमय स्वरूपको देखकर उस स्वरूपके प्रति अर्जुनकी बड़ी सम्मान्य दृष्टि हो गयी थी और वे डरे हुए थे ही। इसीसे वे हाथ जोड़े हुए बार-बार भगवान्‌को नमस्कार और प्रणाम करते हुए उनकी स्तुति करने लगे। २. इसका अभिप्राय यह है कि अर्जुन जब भगवान्‌की स्तुति करने लगे, तब आश्चर्य और भयके कारण उनका हृदय पानी-पानी हो गया, नेत्रोंमें जल भर आया, कण्ठ रुक गया और इसी कारण उनकी वाणी गदगद हो गयी। फलत: उनका उच्चारण अस्पष्ट और करुणापूर्ण हो गया। 3. भगवानके द्वारा प्रदान की हुई दिव्य दृष्टिसे केवल अर्जुन ही यह सब देख रहे थे, सारा जगत्‌ नहीं। जगत््‌का हर्षित और अनुरक्त होना, राक्षस्रोंका डरकर भागना और सिद्धोंका नमस्कार करना--ये सब उस विराट्‌ रूपके ही अंग हैं। अभिप्राय यह है कि यह वर्णन अर्जुनको दिखलायी देनेवाले विराट्‌ रूपका ही है, बाहरी जगत्‌का नहीं। उनको भगवानका जो विराट्‌ रूप दीखता था, उसीके अन्दर ये सब दृश्य दिखलायी पड़ रहे थे। इसीसे अर्जुनने ऐसा कहा है। ४. यहाँ 'महात्मन्‌', “अनन्त', 'देवेश” और “जगन्निवास'--इन चार सम्बोधनोंका प्रयोग करके अर्जुनने यह भाव व्यक्त किया है कि आप समस्त चराचर प्राणियोंके महान्‌ आत्मा हैं, अन्तरहित हैं--आपके रूप, गुण और प्रभाव आदिकी सीमा नहीं है; आप देवताओंके भी स्वामी हैं और समस्त जगत्‌के एकमात्र परमाधार हैं। यह सारा जगत्‌ आपमें ही स्थित है तथा आप इसमें व्याप्त हैं। अतएव इन सबका आपको नमस्कार आदि करना सब प्रकारसे उचित ही है। ५. जिसका कभी अभाव नहीं होता, उस अविनाशी आत्माको 'सत्‌” और नाशवान्‌ अनित्य वस्तुमात्रको “असत' कहते हैं; इन्हींको गीताके सातवें अध्यायमें परा और अपरा प्रकृति तथा पंद्रहवें अध्यायमें अक्षर और क्षर पुरुष कहा गया है। इनसे परे परम अक्षर सच्चिदानन्दघन परमात्मतत्त्व है। अर्जुन अपने नमस्कारादिके औचित्यको सिद्ध करते हुए कह रहे हैं कि यह सब आपका ही स्वरूप है। अतएव आपको नमस्कार आदि करना सब प्रकारसे उचित है। ६. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आप इस भूत, वर्तमान और भविष्य समस्त जगत्‌को यथार्थ तथा पूर्णरूपसे जाननेवाले, सबके नित्य द्रष्टा हैं; इसलिये आप सर्वज्ञ हैं, आपके सदृश सर्वज्ञ कोई नहीं है (गीता ७।२६)। ७. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि जो जाननेके योग्य है, जिसको जानना मनुष्यजन्मका परम उद्देश्य है, गीताके तेरहवें अध्यायमें बारहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन किया गया है--वे साक्षात्‌ परत्रह्म परमेश्वर आप ही हैं। १. इससे अर्जुनने यह बतलाया है कि जो मुक्त पुरुषोंकी परम गति है, जिसे प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं लौटता; वह साक्षात्‌ परम धाम आप ही हैं (गीता ८।२१)। २. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आपके रूप असीम और अगणित हैं, उनका पार कोई पा ही नहीं सकता। 3. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि सारे विश्वके प्रत्येक परमाणुमें आप व्याप्त हैं, इसका कोई भी स्थान आपसे रहित नहीं है। ४. इस कथनसे अर्जुनने यह दिखलाया है कि समस्त जगत्को उत्पन्न करनेवाले कश्यप, दक्षप्रजापति तथा सप्तर्षि आदिके पिता होनेसे ब्रह्मा सबके पितामह हैं और उन ब्रह्माको भी उत्पन्न करनेवाले आप हैं; इसलिये आप सबके प्रपितामह हैं। इसलिये भी आपको नमस्कार करना सर्वथा उचित ही है। ५. “सहसख्रकृत्व:ः पदके सहित बार-बार “नमः” पदके प्रयोगसे यह भाव समझना चाहिये कि अर्जुन भगवानके प्रति सम्मान और अपने भयके कारण हजारों बार नमस्कार करते-करते अधघाते ही नहीं हैं, वे उनको नमस्कार ही करना चाहते हैं। ६. 'सर्व” नामसे सम्बोधित करके अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आप सबके आत्मा, सर्वव्यापी और सर्वरूप हैं; इसलिये मैं आपको आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, दाहिने-बायें--सभी ओरसे नमस्कार करता हूँ। ७. अर्जुन इस कथनसे भगवान्‌की सर्वताको सिद्ध करते हैं। अभिप्राय यह है कि आपने इस सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है। विश्वमें क्षुद्रसे भी क्षुद्रतम अणुमात्र भी ऐसी कोई जगह या वस्तु नहीं है, जहाँ और जिसमें आप न हों। अतएव सब कुछ आप ही हैं। वास्तवमें आपसे पृथक्‌ जगत्‌ कोई वस्तु ही नहीं है, यही मेरा निश्चय है। ८. प्रेम, प्रमाद और विनोद--इन तीन कारणोंसे मनुष्य व्यवहारमें किसीके मानापमानका खयाल नहीं रखता। प्रेममें नियम नहीं रहता, प्रमादमें भूल होती है और विनोदमें वाणीकी यथार्थताका सुरक्षित रहना कठिन हो जाता है। किसी सम्मान्य पुरुषके अपमानमें ये तीनों कारण मिलकर भी हेतु हो सकते हैं और पृथक्‌-पृथक्‌ भी। इनमेंसे 'प्रेम!' और “प्रमाद'--इन कारणोंके विषयमें पिछले श्लोकमें अर्जुन कह चुके हैं। यहाँ “अवहासार्थम्‌' पदसे तीसरे कारण “हँसी-मजाक” का लक्ष्य करा रहे हैं। ९. अपने महत्त्व और स्वरूपसे जिसका कभी पतन न हो, उसे “अच्युत” कहते हैं। ३. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आपकी अप्रतिम और अपार महिमाको न जाननेके कारण ही मैंने आपको अपनी बराबरीका मित्र मान रखा था, इसीलिये मैंने बातचीतमें कभी आपके महान्‌ गौरव और सर्वपूज्य महत्त्वा खयाल नहीं रखा; अत: प्रेम या प्रमादसे मेरे द्वारा निश्चय ही बड़ी भूल हुई। बड़े- से-बड़े देवता और महर्षिगण जिन आपके चरणोंकी वन्दना करना अपना सौभाग्य समझते हैं, मैंने उन आपके साथ बराबरीका बर्ताव किया। प्रभो! कहाँ आप और कहाँ मैं! मैं इतना मूढ़मति हो गया कि आप परम पूजनीय परमेश्वरको मैं अपना मित्र ही मानता रहा और किसी भी आदरसूचक विशेषणका प्रयोग न करके सदा बिना सोचे-समझे “कृष्ण”, “यादव” और 'सखे” आदि कहकर आपको तिरस्कारपूर्वक पुकारता रहा। २. यहाँ अर्जुन कह रहे हैं कि प्रभो! आपका स्वरूप और महत्त्व अचिन्त्य है। उसको पूर्णरूपसे तो कोई भी नहीं जान सकता। किसीको उसका थोड़ा-बहुत ज्ञान होता है तो वह आपकी कृपासे ही होता है। यह आपके परम अनुग्रहका ही फल है कि मैं--जो पहले आपके प्रभावको नहीं जानता था और इसीलिये आपका अनादर किया करता था--अब आपके प्रभावको कुछ-कुछ जान सका हूँ। अवश्य ही ऐसी बात नहीं है कि मैंने आपका सारा प्रभाव जान लिया है; सारा जाननेकी बात तो दूर रही--मैं तो अभी उतना भी नहीं समझ पाया हूँ, जितना आपकी दया मुझे समझा देना चाहती है। परंतु जो कुछ समझा हूँ, उसीसे मुझे यह भलीभाँति मालूम हो गया है कि आप सर्वशक्तिमान्‌ साक्षात्‌ परमेश्वर हैं। मैंने जो आपको अपनी बराबरीका मित्र मानकर आपसे जैसा बर्ताव किया, उसे मैं अपराध मानता हूँ और ऐसे समस्त अपराधोंके लिये मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ। 3. इस कथनसे अर्जुनने अपराध क्षमा करनेके औचित्यका प्रतिपादन किया है। वे कहते हैं--“भगवन्‌! यह सारा जगत्‌ आपट्ीसे उत्पन्न है, अतएव आप ही इसके पिता हैं; संसारमें जितने भी बड़े-बड़े देवता, महर्षि और अन्यान्य समर्थ पुरुष हैं, उन सबमें सबकी अपेक्षा बड़े ब्रह्माजी हैं; क्योंकि सबसे पहले उन्हींका प्रादुर्भाव होता है और वे ही आपके नित्य ज्ञानके द्वारा सबको यथायोग्य शिक्षा देते हैं, परंतु हे प्रभो! वे ब्रहद्माजी भी आपहीसे उत्पन्न होते हैं और उनको वह ज्ञान भी आपहीसे मिलता है। अतएव हे सर्वेश्वरर सबसे बड़े, सब बड़ोंसे बड़े और सबके एकमात्र महान्‌ गुरु आप ही हैं। समस्त जगत्‌ जिन देवताओंकी और महर्षियोंकी पूजा करता है, उन देवताओंके और महर्षियोंके भी परम पूज्य तथा नित्य वन्दनीय ब्रह्मा आदि देवता और वसिष्ठादि महर्षि यदि क्षणभरके लिये आपके प्रत्यक्ष पूजन या स्तवनका सुअवसर पा जाते हैं तो अपनेको महान्‌ भाग्यवान्‌ समझते हैं। अतएव सब पूजनीयोंके भी परम पूजनीय आप ही हैं, इसलिये मुझ क्षुद्रके अपराधोंको क्षमा करना आपके लिये सभी प्रकारसे उचित है। ४. 'तस्मात्‌” पदका प्रयोग करके अर्जुन यह कह रहे हैं कि आप इस प्रकारके महत्त्व और प्रभावसे युक्त हैं, अतएव मुझ-जैसे दीन शरणागतपर दया करके प्रसन्न होना तो, मैं समझता हूँ, आपका स्वभाव ही है। ५. जो सबका नियमन करनेवाले स्वामी हों, उन्हें 'ईश” कहते हैं और जो स्तुतिके योग्य हों, उन्हें 'ईड्य' कहते हैं। इन दोनों विशेषणोंका प्रयोग करके अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि हे प्रभो! इस समस्त जगत्‌का नियमन करनेवाले यहाँतक कि इन्द्र, आदित्य, वरुण, कुबेर और यमराज आदि लोकनियन्ता देवताओंको भी अपने नियममें रखनेवाले आप--सबके एकमात्र महेश्वर हैं और आपके गुणगौरव तथा महत्त्वका इतना विस्तार है कि सारा जगत्‌ सदा-सर्वदा आपका स्तवन करता रहे तब भी उसका पार नहीं पा सकता; इसलिये आप ही वस्तुतः स्तुतिके योग्य हैं। मुझमें न तो इतना ज्ञान है और न वाणीमें ही बल है कि जिससे मैं स्‍्तवन करके आपको प्रसन्न कर सकूँ। मैं अबोध भला आपका क्या स्तवन करूँ? मैं आपका प्रभाव बतलानेमें जो कुछ भी कहूँगा वह वास्तवमें आपके प्रभावकी छायाको भी न छू सकेगा; इसलिये वह आपके प्रभावकों घटानेवाला ही होगा। अतः मैं तो बस, इस शरीरको ही लकड़ीकी भाँति आपके चरणप्रान्तमें लुटाकर--समस्त अंगोंके द्वारा आपको प्रणाम करके आपकी चरणधूलिके प्रसादसे ही आपकी प्रसन्नता प्राप्त करना चाहता हूँ। आप कृपा करके मेरे सब अपराधोंको भुला दीजिये और मुझ दीनपर प्रसन्न हो जाइये। ३. यहाँ अर्जुन यह प्रार्थना कर रहे हैं कि जैसे अज्ञानमें प्रमादवश किये हुए पुत्रके अपराधोंको पिता क्षमा करता है, हँसी-मजाकमें किये हुए मित्रके अपराधोंको मित्र सहता है और प्रेमवश किये हुए प्रियतमा पत्नीके अपराधोंको पति क्षमा करता है--वैसे ही मेरे तीनों ही कारणोंसे बने हुए समस्त अपराधोंको आप क्षमा कीजिये। २. इससे अर्जुनने यह भाव व्यक्त किया है कि आपका जो वैकुण्ठधाममें निवास करनेवाला देवरूप अर्थात्‌ विष्णुरूप है, मुझको उसी चतुर्भुजरूपके दर्शन करवाइये। यहाँ केवल “तत्‌” का प्रयोग होनेसे तो यह बात भी मानी जा सकती थी कि भगवान्‌का जो मनुष्यावतारका रूप है, उसीको दिखलानेके लिये अर्जुन प्रार्थना कर रहे हैं; किंतु रूपके साथ “देव” पद रहनेसे वह स्पष्ट ही मानुषरूपसे भिन्न देवसम्बन्धी रूपका वाचक हो जाता है। 3. अर्जुनने इससे यह भाव दिखलाया है कि आपके इस अलौकिक रूपमें जब मैं आपके गुण, प्रभाव और ऐश्वर्यकी ओर देखकर विचार करता हूँ तब तो मुझे बड़ा भारी हर्ष होता है कि “अहो! मैं बड़ा ही सौभाग्यशाली हूँ, जो साक्षात्‌ परमेश्वरकी मुझ तुच्छपर इतनी अनन्त दया और ऐसा अनोखा प्रेम है कि जिससे वे कृपा करके मुझको अपना यह अलौकिक रूप दिखला रहे हैं; परंतु इसीके साथ जब आपकी भयावनी विकराल मूर्तिकी ओर मेरी दृष्टि जाती है, तब मेरा मन भयसे काँप उठता है और मैं अत्यन्त व्याकुल हो जाता हूँ। ४. अर्जुनको भगवान्‌ जो हजारों हाथोंवाले विराट्स्वरूपसे दर्शन दे रहे हैं, उस रूपको समेटकर चतुर्भुजरूप होनेके लिये अर्जुन 'सहखबाहो', “विश्वमूर्तेीट--इन नामोंसे सम्बोधन करके भगवानूसे प्रार्थना कर रहे हैं। ५. महाभारत-युद्धमें भगवानने शस्त्र ग्रहण न करनेकी प्रतिज्ञा की थी और अर्जुनके रथपर वे अपने हाथोंमें चाबुक और घोड़ोंकी लगाम थामे विराजमान थे; परंतु इस समय अर्जुन भगवानके इस द्विभुज रूपको देखनेसे पहले उस चतुर्भुज रूपको देखना चाहते हैं, जिसके हाथोंमें गदा और चक्रादि हैं। ६. (१) यदि चतुर्भुज रूप श्रीकृष्णका स्वाभाविक रूप होता तो फिर “गदिनम्‌” और “चक्रहस्तम्‌' कहनेकी कोई आवश्यकता न थी, क्योंकि अर्जुन उस रूपको सदा देखते ही थे। वरं “चतुर्भुज” कहना भी निष्प्रयोजन था; अर्जुनका इतना ही कहना पर्याप्त होता कि मैं अभी कुछ देर पहले जो रूप देख रहा था, वही दिखलाइये। (२) पिछले श्लोकमें 'देवरूपम्‌” पद आया है, जो आगे इक्यावनवें श्लोकमें आये हुए “मानुषं रूपम” से सर्वथा विलक्षण अर्थ रखता है; इससे भी सिद्ध है कि देवरूपसे श्रीविष्णुका ही कथन किया गया है। (३) आगे पचासतवें श्लोकमें आये हुए 'स्वकं रूपम्‌” के साथ “भूय:” और “सौम्यवपु:” के साथ 'पुनः/ पद आनेसे भी यहाँ पहले चतुर्भुज और फिर द्विभुज मानुषरूप दिखलाया जाना सिद्ध होता है। (४) आगे बावनवें श्लोकमें 'सुदुर्दर्शभ” पदसे यह दिखलाया गया है कि यह रूप अत्यन्त दुर्लभ है और फिर कहा गया है कि देवता भी इस रूपको देखनेकी नित्य आकांक्षा करते हैं। यदि श्रीकृष्णका चतुर्भुज रूप स्वाभाविक था, तब तो वह रूप मनुष्योंको भी दीखता था; फिर देवता उसकी सदा आकांक्षा क्‍यों करने लगे? यदि यह कहा जाय कि विश्वरूपके लिये ऐसा कहा गया है तो ऐसे घोर विश्वरूपकी देवताओंको कल्पना भी क्‍यों होने लगी, जिसकी दाढ़ोंमें भीष्म-द्रोणादि चूर्ण हो रहे हैं। अतएव यही प्रतीत होता है कि देवतागण वैकुण्ठवासी श्रीविष्णुरूपके दर्शनकी ही आकांक्षा करते हैं। (५) विराट्स्वरूपकी महिमा आगे अड़तालीसवें श्लोकमें “न वेदयज्ञाध्ययनै:” इत्यादिके द्वारा गायी गयी, फिर तिरपनवें श्लोकमें “नाहं वेदैर्न तपसा” आदियमें पुनः वैसी ही बात आती है। यदि दोनों जगह एक ही विराट्‌ रूपकी महिमा है तो इसमें पुनरुक्ति दोष आता है; इससे भी सिद्ध है कि मानुषरूप दिखलानेके पहले भगवानने अर्जुनको चतुर्भुज देवरूप दिखलाया और उसीकी महिमामें तिरपनवाँ श्लोक कहा गया। (६) इसी अध्यायके चौबीसवें और तीसवें श्लोकमें अर्जुनने “विष्णो"” पदसे भगवान्‌को सम्बोधित भी किया है। इससे भी उनके विष्णुरूप देखनेकी आकांक्षा प्रतीत होती है। इन हेतुओंसे यही सिद्ध होता है कि यहाँ अर्जुन भगवान्‌ श्रीकृष्णसे चतुर्भुज विष्णुरूप दिखलानेके लिये प्रार्थना कर रहे हैं। ३. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मेरे इस विराट्‌ रूपके दर्शन सब समय और सबको नहीं हो सकते। जिस समय मैं अपनी योगशक्तिसे इसके दर्शन कराता हूँ, उसी समय होते हैं। वह भी उसीको होते हैं, जिसको दिव्य दृष्टि प्राप्त हो, दूसरेको नहीं। अतएव इस रूपका दर्शन प्राप्त करना बड़े सौभाग्यकी बात है। २. यद्यपि यशोदा माताको अपने मुखमें और भीष्मादि वीरोंको कौरवोंकी सभामें विराट्‌ रूपोंके दर्शन कराये थे, परंतु उनमें और अर्जुनको दीखनेवाले इस विराट्‌ रूपमें बहुत अन्तर है। तीनोंके भिन्न-भिन्न वर्णन हैं। अर्जुनको भगवान्‌ने जिस रूपके दर्शन कराये, उसमें भीष्म और द्रोण आदि शूरवीर भगवान्‌के प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश करते दीख पड़ते थे। ऐसा विराट्‌ रूप भगवानने पहले कभी किसीको नहीं दिखलाया था। ३. वेद-यज्ञादिके अध्ययन, दान, तप तथा अन्यान्य विभिन्न प्रकारकी क्रियाओंका अधिकार मनुष्यलोकमें ही है और मनुष्यशरीरमें ही जीव भिन्न-भिन्न प्रकारके नवीन कर्म करके भाँति-भाँतिके अधिकार प्राप्त करता है। अन्यान्य सब लोक तो प्रधानतया भोगस्थान ही हैं। मनुष्यलोकके इसी महत्त्वको समझानेके लिये यहाँ “नृलोके” पदका प्रयोग किया गया है। अभिप्राय यह है कि जब मनुष्यलोकमें भी उपर्युक्त साधनोंद्वारा दूसरा कोई भगवान्‌के इस रूपको नहीं देख सकता, तब अन्यान्य लोकोंमें और बिना किसी साधनके कोई नहीं देख सकता--इसमें तो कहना ही क्या है? ४. वेदवेत्ता अधिकारी आचार्यके द्वारा अंग-उपांगोंसहित वेदोंको पढ़कर उन्हें भलीभाँति समझ लेनेका नाम “वेदाध्ययन” है। यज्ञ-क्रियामें सुनिपुण याज्ञिक पुरुषोंकी सेवामें रहकर उनके द्वारा यज्ञविधियोंको पढ़ना और उन्हींकी अध्यक्षतामें विधिवत्‌ किये जानेवाले यज्ञोंको प्रत्यक्ष देखकर यज्ञसम्बन्धी समस्त क्रियाओंको भलीभाँति जान लेना “यज्ञका अध्ययन' है। धन, सम्पत्ति, अन्न, जल, विद्या, गौ, पृथ्वी आदि किसी भी अपने स्वत्वकी वस्तुका दूसरोंके सुख और हितके लिये प्रसन्न हृदयसे जो उन्हें यथायोग्य दे देना है--इसका नाम “दान” है। श्रौत-स्मार्त यज्ञादिका अनुष्ठान और अपने वर्णाश्रमधर्मका पालन करनेके लिये किये जानेवाले समस्त शास्त्रविहित कर्मोंको “क्रिया” कहते हैं। कृच्छु-चान्द्रायणादि व्रत, विभिन्न प्रकारके कठोर नियमोंका पालन, मन और इन्द्रियोंका विवेक और बलपूर्वक दमन तथा धर्मके लिये शारीरिक या मानसिक कठिन क्लेशोंका सहन अथवा शास्त्रविधिके अनुसार की जानेवाली अन्य विभिन्न प्रकारकी तपस्याएँ--इन्हीं सबका नाम “उग्र तप” है। इन सब साथनोंके द्वारा भी अपने विराट्स्वरूपके दर्शनको असम्भव बतलाकर भगवान्‌ उस रूपकी महत्ता प्रकट करते हुए यह कह रहे हैं कि इस प्रकारके महान्‌ प्रयत्नोंसे भी जिसके दर्शन नहीं हो सकते, उसी रूपको तुम मेरी प्रसन्नता और कृपाके प्रसादसे प्रत्यक्ष देख रहे हो--यह तुम्हारा महान्‌ सौभाग्य है। इस समय तुम्हें जो भय, दुःख और मोह हो रहा है--यह उचित नहीं है। ३. 'स्वकं रूपम्‌' का अर्थ है अपना निजी रूप। वैसे तो विश्वरूप भी भगवान्‌ श्रीकृष्णका ही है और वह भी उनका स्वकीय ही है तथा भगवान्‌ जिस मानुषरूपमें सबके सामने प्रकट रहते थे--वह श्रीकृष्णरूप भी उनका स्वकीय ही है; किंतु यहाँ 'रूपम्‌” के साथ 'स्वकम्‌” विशेषण देनेका अभिप्राय उक्त दोनोंसे भिन्न किसी तीसरे ही रूपका लक्ष्य करानेके लिये होना चाहिये; क्योंकि विश्वरूप तो अर्जुनके सामने प्रस्तुत था ही, उसे देखकर तो वे भयभीत हो रहे थे; अतएव उसे दिखलानेकी तो यहाँ कल्पना भी नहीं की जा सकती और मानुषरूपके लिये यह कहनेकी आवश्यकता नहीं रहती कि उसे भगवानने दिखलाया (दर्शयामास); क्योंकि विश्वरूपको हटा लेनेके बाद भगवान्‌का जो स्वाभाविक मनुष्यावतारका रूप है, वह तो ज्यों-का-त्यों अर्जुनके सामने रहता ही; उसमें दिखलानेकी क्या बात थी, उसे तो अर्जुन स्वयं ही देख लेते। अतएव यहाँ 'स्वकम्‌” विशेषण और “दर्शयामास' क्रियाके प्रयोगसे यही भाव प्रतीत होता है कि नरलीलाके लिये प्रकट किये हुए सबके सम्मुख रहनेवाले मानुषरूपसे और अपनी योगशक्तिसे प्रकट करके दिखलाये हुए विश्वरूपसे भिन्न जो नित्य वैकुण्ठधाममें निवास करनेवाला भगवान्‌का दिव्य चतुर्भुज निजी रूप है--उसीको देखनेके लिये अर्जुनने प्रार्थना की थी और वही रूप भगवान्‌ने उनको दिखलाया। २. भगवान्‌ श्रीकृष्ण महाराज वसुदेवजीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए हैं और आत्मरूपसे सबमें निवास करते हैं, इसलिये उनका नाम *वासुदेव' है। 3. जिनका आत्मा अर्थात्‌ स्वरूप महान हो, उन्हें महात्मा कहते हैं। भगवान्‌ श्रीकृष्ण सबके आत्मारूप हैं, इसलिये वे महात्मा हैं। कहनेका अभिप्राय यह है कि अर्जुनको अपने चतुर्भुज रूपका दर्शन करानेके पश्चात्‌ महात्मा श्रीकृष्णने सौम्य अर्थात्‌ परम शान्त श्यामसुन्दर मानुषरूपसे युक्त होकर भयसे व्याकुल हुए अर्जुनको धैर्य दिया। ४. भगवान्‌का जो मानुषरूप था, वह बहुत ही मधुर, सुन्दर और शान्त था तथा पिछले श्लोकमें जो भगवानके सौम्यवपु हो जानेकी बात कही गयी है, वह भी मानुषरूपको लक्ष्य करके ही कही गयी है-- इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये यहाँ “रूपम्‌” के साथ 'सौम्यम” और “मानुषम्‌ इन दोनों विशेषणोंका प्रयोग किया गया है। ३. इससे अर्जुनने यह बतलाया कि मेरा मोह, भ्रम और भय दूर हो गया और मैं अपनी वास्तविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ। अर्थात्‌ भय और व्याकुलता एवं कम्प आदि जो अनेक प्रकारके विकार मेरे मन, इन्द्रिय और शरीरमें उत्पन्न हो गये थे, उन सबके दूर हो जानेसे अब मैं पूर्ववत्‌ स्वस्थ हो गया हूँ। २. 'सुदुर्दर्शभ/ विशेषण देकर भगवानने अपने चतुर्भुज दिव्यरूपके दर्शनकी दुर्लभता और उसकी महत्ता दिखलायी है तथा “इदम्‌” पद निकटवर्ती वस्तुका निर्देश करानेवाला होनेसे इसके द्वारा विश्वरूपके पश्चात्‌ दिखलाये जानेवाले चतुर्भुजरूपका संकेत किया गया है। इससे भगवान्‌ यह बतला रहे हैं कि मेरे जिस चतुर्भुज, मायातीत, दिव्य गुणोंसे युक्त नित्यरूपके तुमने दर्शन किये हैं, उस रूपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं; इसके दर्शन उसीको हो सकते हैं, जो मेरा अनन्य भक्त होता है और जिसपर मेरी कृपाका पूर्ण प्रकाश हो जाता है। 3. गीताके नवम अध्यायके सत्ताईसवें और अट्नाईसवें श्लोकोंमें यह कहा गया है कि तुम जो कुछ यज्ञ करते हो, दान देते हो और तप करते हो--सब मेरे अर्पण कर दो; ऐसा करनेसे तुम सब कर्मोसे मुक्त हो जाओगे और मुझे प्राप्त हो जाओगे तथा गीताके सत्रहवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें यह बात कही गयी है कि मोक्षकी इच्छावाले पुरुषोंद्वारा यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ फलकी इच्छा छोड़कर की जाती हैं; इससे यह भाव निकलता है कि यज्ञ, दान और तप मुक्तिमें और भगवानकी प्राप्तिमें अवश्य ही हेतु हैं, किंतु इस श्लोकमें भगवानने यह बात कही है कि मेरे चतुर्भुजरूपके दर्शन न तो वेदके अध्ययनाध्यापनसे ही हो सकते हैं और न तप, दान और यज्ञसे ही। पर इसमें कोई विरोधकी बात नहीं है; क्योंकि कर्मोंको भगवानके अर्पण करना अनन्य भक्तिका एक अंग है। इसी अध्यायके पचपनवें श्लोकमें अनन्य भक्तिका वर्णन करते हुए भगवानने स्वयं “मत्कर्मकृत्‌' (मेरे लिये कर्म करनेवाला) पदका प्रयोग किया है और चौवनवें श्लोकमें यह स्पष्ट घोषणा की है कि अनन्य भक्तिके द्वारा मेरे इस स्वरूपको देखना, जानना और प्राप्त करना सम्भव है। अतएव यहाँ यह समझना चाहिये कि निष्कामभावसे भगवदर्थ और भगवदर्पणबुद्धिसे किये हुए यज्ञ, दान और तप आदि कर्म भक्तिके अंग होनेके कारण भगवानकी प्राप्तिमें हेतु हैं--सकामभावसे किये जानेपर नहीं। अभिप्राय यह है कि उपर्युक्त यज्ञादि क्रियाएँ भगवान्‌का दर्शन करानेमें स्वभावसे समर्थ नहीं हैं। भगवानके दर्शन तो प्रेमपूर्वक भगवान्‌के शरण होकर निष्कामभावसे कर्म करनेपर भगवत्कृपासे ही होते हैं। ४. भगवानमें ही अनन्य प्रेम हो जाना तथा अपने मन, इन्द्रिय और शरीर एवं धन, जन आदि सर्वस्वको भगवान्‌का समझकर भगवान्‌के लिये भगवानकी ही सेवामें सदाके लिये लगा देना--यही अनन्य भक्ति है। इस अनन्य भक्तिको ही भगवान्‌के देखे जाने आदिमें हेतु बतलाया गया है। यद्यपि सांख्ययोगके द्वारा भी निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति बतलायी गयी है और वह सर्वथा सत्य है, परंतु सांख्ययोगके द्वारा सगुण-साकार भगवान्‌के दिव्य चतुर्भुज रूपके भी दर्शन हो जाय, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सांख्ययोगके द्वारा साकाररूपमें दर्शन देनेके लिये भगवान्‌ बाध्य नहीं हैं। यहाँ प्रकरण भी सगुण भगवानके दर्शनका ही है। अतएव यहाँ केवल अनन्य भक्तिको ही भगवद्दर्शन आदियमें हेतु बतलाना उचित ही है। १. जो मनुष्य स्वार्थ, ममता और आसक्तिको छोड़कर, सब कुछ भगवान्‌का समझकर, अपनेको केवल निमित्तमात्र मानता हुआ यज्ञ, दान, तप और खान-पान, व्यवहार आदि समस्त शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंको निष्कामभावसे भगवान्‌की ही प्रसन्नताके लिये भगवान्‌के आज्ञानुसार करता है--वह “मत्कर्मकृत्‌' अर्थात्‌ भगवानके लिये भगवान्‌के कर्मोंको करनेवाला है। २. जो भगवानको ही परम आश्रय, परम गति, एकमात्र शरण लेनेयोग्य, सर्वोत्तम, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्‌, सबके सुहृद, परम आत्मीय और अपने सर्वस्व समझता है तथा उनके किये हुए प्रत्येक विधानमें सदा सुप्रसन्न रहता है--वह “मत्परम:” अर्थात्‌ भगवानके परायण है। 3. भगवानमें अनन्यप्रेम हो जानेके कारण जो भगवानूमें ही तन्‍्मय होकर नित्य-निरन्तर भगवानके नाम, रूप, गुण, प्रभाव और लीला आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन आदि करता रहता है; इनके बिना जिसे क्षणभर भी चैन नहीं पड़ती और जो भगवानके दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठाके साथ निरन्तर लालायित रहता है--वह “मद्धक्त:' अर्थात्‌ भगवानका भक्त है। ४. शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन, कुटुम्ब तथा मान-बड़ाई आदि जितने भी इस लोक और परलोकके भोग्य पदार्थ हैं, उन सम्पूर्ण जड-चेतन पदार्थोंमें जिसकी किंचिन्मात्र भी आसक्ति नहीं रह गयी है; भगवान्‌को छोड़कर जिसका किसीमें भी प्रेम नहीं है--वह “सड़वर्जित:' अर्थात्‌ आसक्तिरहित है। ५. समस्त प्राणियोंको भगवान्‌का ही स्वरूप समझने अथवा सबमें एकमात्र भगवानको व्याप्त समझनेके कारण किसीके द्वारा कितना भी विपरीत व्यवहार किया जानेपर भी जिसके मनमें विकार नहीं होता तथा जिसका किसी भी प्राणीमें किंचिन्मात्र भी द्वेष या वैरभाव नहीं रह गया है--वह '“सर्वभूतेषु निर्वेर:' अर्थात्‌ समस्त प्राणियोंमें वैरभावसे रहित है। ६. इस कथनका भाव पिछले चौवनवें श्लोकके अनुसार सगुण भगवानके प्रत्यक्ष दर्शन कर लेना, उनको भलीभाँति तत्त्वसे जान लेना और उनमें प्रवेश कर जाना है। षटत्रिशो<ध्याय: (श्रीमद्धगवदगीतायां द्वादशो<डध्याय:) साकार और निराकारके उपासकोंकी उत्तमताका निर्णय तथा भगवत्प्राप्तिके उपायका एवं भगवत्प्राप्तिवाले पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन सम्बन्ध--गीताके दूसरे अध्यायसे लेकर छठे अध्यायतक भगवान्‌ने जगह-जगह निर्गुण ब्रह्मकी और सगुण परमेश्वरकी उपासनाकी प्रशंसा की है। सातवें अध्यायसे ग्यारहवें अध्यायतक तो विशेषरूपसे सगुण भगवान्‌की उपासनाका महत्त्व दिखलाया है। इसीके साथ पाँचवें जअध्यायमें सत्रहवेंसे छब्बीसवें *लोकतक, छठे अध्यायमें चौबीसवेंसे उनतीसवेतक; आठवें अध्यायमें ग्यारहवेंसे तेरहवेंतक तथा इसके सिवा और भी कितनी ही जगह निर्गुणकी उपासनाका महत्त्व भी दिखलाया है। आखिर ग्यारहवें अध्यायके अन्तमें सगुण-साकार भगवान्‌की अनन्य भ्क्तिका फल भगवत्प्राप्ति बतलाकर मत्कर्मकृत्‌” से आरम्भ होनेवाले इस अन्तिम श्लोकमें सगुण-साकार-स्वरूप भगवान्‌के भ्रक्तकी विशेषरूपसे बड़ाई की। इसपर अजुनिके मनमें यह जिज्ञासा हुई कि निर्गुण-निराकार ब्रह्मणीे और सगुण-साकार भगवान्‌की उपासना करनेवाले दोनों प्रकारके उपासकोंगें उत्तम उपासक कौन है-- अजुन उवाच एवं सततसयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।5 ये चाप्यक्षरमव्यक्तं) तेषां के योगवित्तमा:,अर्जुन बोले--जो अनन्यप्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकारसे निरन्तर आपके भजन- ध्यानमें लगे रहकर आप सगुणरूप परमेश्वरको और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्मको ही अतिगश्रेष्ठ भावसे भजते हैं, उन दोनों प्रकारके उपासकोंमें अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?

قال أرجونا: «الذين يعبدونك على الدوام، ثابتين في الانضباط، متوجّهين إليك بوصفك الربّ ذا الشخصيّة بعبادةٍ لا تنقطع—والذين يوقّرون المطلقَ غيرَ الفاني، غيرَ المتجلّي—فأيُّ الفريقين أتمّ معرفةً باليوغا؟»

Verse 2

शी (9) शीश लत 3. गीताके दसवें अध्यायके प्रारम्भमें प्रेम-समुद्र भगवानने “अर्जुन! तुम्हारा मुझमें अत्यन्त प्रेम है, इसीसे मैं ये सब बातें तुम्हारे हितके लिये कह रहा हूँ” ऐसा कहकर अपना जो अलौकिक प्रभाव सुनाया, उसे सुनकर अर्जुनको महर्षियोंकी कही हुई बातोंका स्मरण हो आया। अर्जुनके हृदयपर भगवत्कृपाकी मुहर लग गयी। वे भगवत्कृपाके अपूर्व दर्शन कर आनन्दमुग्ध हो गये; क्योंकि साधकको जबतक अपने पुरुषार्थ, साधन या अपनी योग्यताका स्मरण होता है, तबतक वह भगवत्कृपाके परमलाभसे वंचित-सा ही रहता है; भगवत्कृपाके प्रभावसे वह सहज ही साधनके उच्च स्तरपर नहीं चढ़ सकता, परंतु जब उसे भगवत्कृपासे ही भगवत्कृपाका भान होता है और वह प्रत्यक्षवत्‌ यह समझ जाता है कि जो कुछ हो रहा है, सब भगवानके अनुग्रहसे ही हो रहा है, तब उसका हृदय कृतज्ञतासे भर जाता है और वह पुकार उठता है, 'ओहो, भगवन्‌! मैं किसी भी योग्य नहीं हूँ। मैं तो सर्वथा अनधिकारी हूँ। यह सब तो आपके अनुग्रहकी ही लीला है। 'ऐसे ही कृतज्ञतापूर्ण हृदयसे अर्जुन कह रहे हैं कि भगवन्‌! आपने जो कुछ भी महत्त्व और प्रभावकी बातें सुनायी हैं, मैं इसका पात्र नहीं हूँ। आपने अनुग्रह करनेके लिये ही अपना यह परम गोपनीय रहस्य मुझको सुनाया है। “मदनुग्रहाय” पदके प्रयोगका यही अभिप्राय है। $. गीताके सातवेंसे दसवें अध्यायतक विज्ञानसहित ज्ञानके कहनेकी प्रतिज्ञा करके भगवानने जो अपने गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपका तत्त्व और रहस्य समझाया है--उस सभी उपदेशका वाचक यहाँ “परम गोपनीय अध्यात्मविषयक वचन” है। जिन-जिन प्रकरणोंमें भगवानने स्पष्टरूपसे यह बतलाया है कि मैं श्रीकृष्ण जो तुम्हारे सामने विराजित हूँ, वही समस्त जगत्‌का कर्ता, हर्ता, निर्मुण, सगुण, निराकार, साकार, मायातीत, सर्वशक्तिमान्‌ू, सर्वाधार परमेश्वर हूँ, उन प्रकरणोंको भगवानने स्वयं “परम गुह्ा' बतलाया है। अतएव यहाँ उन्हीं विशेषणोंका लक्ष्य करके अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि आपका यह उपदेश अवश्य ही परम गोपनीय है। २. अर्जुन जो भगवानके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपको पूर्णरूपसे नहीं जानते थे--यही उनका मोह था। अब उपर्युक्त उपदेशके द्वारा भगवानके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य, रहस्य और स्वरूपको कुछ समझकर वे जो यह जान गये हैं कि श्रीकृष्ण ही साक्षात्‌ परमेश्वर हैं--यही उनके मोहका नष्ट होना है। 3. इससे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि केवल भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयकी ही बात आपसे सुनी हो, ऐसी बात नहीं है; आपकी जो अविनाशी महिमा है, अर्थात्‌ आप समस्त विश्वका सृजन, पालन और संहार आदि करते हुए भी वास्तवमें अकर्ता हैं, सबका नियमन करते हुए भी उदासीन हैं, सर्वव्यापी होते हुए भी उन-उन वस्तुओंके गुण-दोषसे सर्वथा निर्लिप्त हैं, शुभाशुभ कर्मोंका सुख-दुःखरूप फल देते हुए भी निर्दयता और विषमताके दोषसे रहित हैं, प्रकृति, काल और समस्त लोक-पालोंके रूपमें प्रकट होकर सबका नियमन करनेवाले सर्वशक्तिमान्‌ भगवान्‌ हैं--इस प्रकारके माहात्म्यको भी उन-उन प्रकरणोंमें बार-बार सुना है। ४. परमेश्वर” सम्बोधनसे अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि आप ईश्वरोंके भी महान ईश्वर हैं और सर्वसमर्थ हैं; अतएव मैं आपके जिस एऐश्वरस्वरूपके दर्शन करना चाहता हूँ, उसके दर्शन आप सहज ही करा सकते हैं। ५. असीम और अनन्त ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि ईश्वरीय गुण और प्रभाव जिसमें प्रत्यक्ष दिखलायी देते हों तथा सारा विश्व जिसके एक अंभशमें हो, ऐसे रूपको यहाँ 'ऐश्वररूप” बतलाया है और उसे मैं देखना चाहता हूँ" इस कथनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि ऐसा अद्भुतरूप मैंने कभी नहीं देखा, आपके मुखसे उसका वर्णन सुनकर (गीता १०।४२) उसे देखनेकी मेरे मनमें अत्यन्त उत्कट इच्छा उत्पन्न हो गयी है, उस रूपके दर्शन करके मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा--मैं ऐसा मानता हूँ। ६. 'प्रभो” सम्बोधनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आप सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय तथा अन्तर्यामीरूपसे शासन करनेवाले होनेके कारण सर्वसमर्थ हैं। इसलिये यदि मैं आपके उस रूपके दर्शनका सुयोग्य अधिकारी नहीं हूँ तो आप कृपापूर्वक अपने सामर्थ्यसे मुझे सुयोग्य अधिकारी बना सकते हैं। ७. इस कथनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि मेरे मनमें आपके उस रूपके दर्शनकी लालसा अत्यन्त प्रबल है आप अन्तर्यामी हैं, देख लें--जान लें कि मेरी वह लालसा सच्ची और उत्कट है या नहीं। यदि आप उस लालसाको सच्ची पाते हैं, तब तो प्रभो! मैं उस स्वरूपके दर्शनका अधिकारी हो जाता हूँ; क्योंकि आप तो भक्त-वांछाकल्पतरु हैं, उसके मनकी इच्छा ही देखते हैं, अन्य योग्यताको नहीं देखते। इसलिये यदि उचित समझें तो कृपा करके अपने उस स्वरूपके दर्शन मुझे कराइये। ३. 'नानाविधानि' पद बहुत-से भेदोंका बोधक है। इसका प्रयोग करके भगवानने विश्वरूपमें दीखनेवाले रूपोंके जातिगत भेदकी अनेकता प्रकट की है--अर्थात्‌ देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि समस्त चराचर जीवोंके नाना भेदोंको अपनेमें देखनेके लिये कहा है। २. अलौकिक और आश्चर्यजनक वस्तुको दिव्य कहते हैं। “दिव्यानि' पदका प्रयोग करके भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मेरे शरीरमें दीखनेवाले ये भिन्न-भिन्न प्रकारके असंख्य रूप सब-के-सब दिव्य हैं। 3. वर्ण” शब्द लाल, पीले, काले आदि विभिन्न रंगोंका और “आकृति” शब्द अंगोंकी बनावटका वाचक है। जिन रूपोंके वर्ण और उनके अंगोंकी बनावट पृथक्‌-पृथक्‌ अनेकों प्रकारकी हों, उनको “नानावर्णाकृति' कहते हैं। उन्हींके लिये 'नानावर्णाकृतीनि'- का प्रयोग हुआ है। ४. इनका नाम लेकर भगवानने सभी देवताओंको अपने विराट्‌ रूपमें देखनेके लिये अर्जुनको आज्ञा दी है। इनमेंसे आदित्य और मरुद्गणोंकी व्याख्या गीताके दसवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें तथा वसु और रुद्रोंकी तेईसवेंमें की जा चुकी है। इसलिये यहाँ उसका विस्तार नहीं किया गया है। अश्विनीकुमार दोनों भाई देव-वैद्य हैं। ये दोनों सूर्यकी पत्नी संज्ञासे उत्पन्न माने जाते हैं (विष्णुपुराण ३,श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्तेः मे युक्ततमा मता: श्रीभगवान्‌ बोले--मुझमें मनको एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-वध्यानमें लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धासे युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वरको भजते हैं,४ वे मुझको योगियोंमें अति उत्तम योगी मान्य हैं

قال الربّ: «الذين يُثبّتون أذهانهم فيّ، ويعبدونني على الدوام، مقرونين بإيمانٍ أسمى—أولئك أعدّهم أتمَّ اليوغيين.»

Verse 3

सम्बन्ध-- पूर्वश"्लीकमें सगुण-साकार परमेश्वरके उपासकोंको उत्तम योगवेत्ता बतलाया;, इसपर यह जिज्ञासा हो सकती है कि तो क्या निर्गुण-निराकार ब्रह्मके उपासक उत्तम योगवेत्ता नहीं हैं? इसपर कहते हैं-- ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं* 3 पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवमूरें,परंतु जो पुरुष इन्द्रियोंक समुदायको भली प्रकार वशमें करके मन-बुद्धिसे परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको निरन्तर एकीभावसे (अभिन्नभावसे) ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत* और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं?

«وأمّا الذين، بعد أن كبحوا جماعة الحواس، يعبدون بثباتٍ غيرَ الفاني—الذي لا يُوصَف، غيرَ المتجلّي، الساري في كلّ مكان، غيرَ المُدرَك بالفكر، الثابت الذي لا يتبدّل، الساكن الذي لا يتحرّك، والأزلي—فأولئك اليوغيون، المنصرفون إلى خير جميع الكائنات، والمتساوون النظرة إلى الجميع، إنما يبلغونني أنا وحدي.»

Verse 4

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धय:* । ते प्राप्तुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:,परंतु जो पुरुष इन्द्रियोंक समुदायको भली प्रकार वशमें करके मन-बुद्धिसे परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको निरन्तर एकीभावसे (अभिन्नभावसे) ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत* और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं?

«الذين يكبحون جماعة الحواس كلّها، ويثبتون على عقلٍ متساوٍ في كلّ موضع، ويجدون لذّتهم في خير كلّ كائن—أولئك يبلغونني أنا وحدي.»

Verse 5

सम्बन्ध-- इस प्रकार निर्गुण-उपासना और उसके फलका प्रतिपादन करनेके पश्चात्‌ अब देहाभिगानियोंके लिये अव्यक्त गतिकी प्राप्तिको कठिन बतलाते हैं-- क्लेशोडधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌ | अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्धिरवाप्यते

قال أرجونا: «إن الذين تتعلّق عقولهم بغير المتجلّي (اللامظهر) تكون معاناتهم أشدّ. ولأهل الأجساد إن السبيل إلى غير المتجلّي حقًّا عسيرٌ مؤلمٌ في نيله.»

Verse 6

उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्ममें आसक्त चित्तवाले पुरुषोंके साधनमें परिश्रम विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविषयक गति दु:खपूर्वक प्राप्त की जाती है ।। ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परा: । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते,परंतु जो मेरे परायण रहनेवाले5* भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें अर्पण करकेः मुझ सगुणरूप परमेश्वरको ही अनन्यभक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं*

أما أولئك العابدون الذين يجعلونني ملجأهم الأعلى—مُسَلِّمين إليَّ جميع أعمالهم—فإنهم يعبدونني بعبادةٍ خالصة، يداومون على التأمل فيَّ. وفي السياق الأخلاقي لتعليم الغيتا يُعرض هذا بوصفه الطريق العملي لأهل الأجساد: فبدل التعلّق بالسعي العسير إلى المطلق اللامتجلّي، يقدّمون واجباتهم بلا تملّك، ويثبتون على إخلاصٍ واحد للرب الذي يمكن الاقتراب منه وخدمته.

Verse 7

भवामि नचिरात्‌ पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌,हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगानेवाले प्रेमी भक्तोंका मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार- समुद्रसे उद्धार करनेवाला होता हूँ:

يا بارثا، سرعان ما أكون المُنقِذ لأولئك العابدين المحبّين الذين استغرقَت عقولهم فيَّ. ومن ثبّت قلبه فيَّ بإخلاص، أرفعه سريعًا من محيط الوجود الدنيوي الذي يتخذ صورة الموت.

Verse 8

सम्बन्ध--इस प्रकार पूर्कश्लोकोमें निर्गुण-उपासनाकी अपेक्षा सगुण-उपासनाकी युगमताका प्रतिपादन किया गया। इसलिये अब भगवान्‌ अ्जुनिको उसी प्रकार मन-बुद्धि लगाकर सगुण-उपासना करनेकी आज्ञा देते हैं-- मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्व न संशय:,मुझमें मनको लगा और मुझमें ही बुद्धिको लगा; इसके अनन्तर तू मुझमें ही निवास करेगा,< इसमें कुछ भी संशय नहीं है

يأمر الرب أرجونا أن يجمع حياته الباطنة كلها في الذكر الإلهي: «ثبّت ذهنك فيَّ وحدي، وأودِع فهمك فيَّ. ثم من ذلك الحين فصاعدًا ستقيم فيَّ—لا ريب في ذلك.» أخلاقيًّا، لا يصوّر هذا البيتُ التفانيَ هروبًا من الواجب، بل انضباطًا داخليًّا يثبّت الحكم والنية، لكي يمضي الفعل بلا اضطراب ولا خوف ولا تردّد.

Verse 9

अथ चित्तं समाधातुं न शकनोषि मयि स्थिरम्‌ | अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय,यदि तू मनको मुझमें अचल स्थापन करनेके लिये समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप योगके द्वारा मुझको प्राप्त होनेके लिये इच्छा कर

وإن لم تستطع أن تُثبّت ذهنك فيَّ ثباتًا راسخًا، يا دهننجايا، فاطلب بلوغي بيوغا المران المتكرر. فإذا لم تكن الاستغراقات الباطنية المباشرة ممكنة بعدُ، فليُتَّخذ تدريبٌ دائم على الانتباه والسلوك، حتى تصير العبادة ثابتة ومحوِّلة أخلاقيًّا، لا مجرّد عاطفة.

Verse 10

अभ्यासे5प्यसमर्थोडसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्‌ सिद्धिमवाप्स्यसि,यदि तू उपर्युक्त अभ्यासमें भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म करनेके ही परायण हो जाः। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मोंको करता हुआ भी मेरी प्राप्तिरूप सिद्धिको ही प्राप्त होगाई

فإن كنتَ غيرَ قادرٍ حتى على تلك الممارسة، فاجعلِ العملَ لأجلي غايتَك العليا. فبقيامك بالأعمال من أجلي تنالُ الكمالَ—أي نيلَ الوصول إليّ.

Verse 11

इस प्रकार महाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगगवद्‌्गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‌्गीतोपनिषद्‌: श्रीकृष्णाजुनसंवादमें विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,अथैतदप्यशक्तोडसि कर्तु मद्योगमाश्रित: । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌* यदि मेरी प्राप्तिरूप योगके आश्रित होकर उपर्युक्त साधनको करनेमें भी तू असमर्थ है तो मन-बुद्धि आदिपर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मोंके फलका त्याग करे

فإن كنتَ—وأنتَ متحصّنٌ باليوغا المتجهة إليّ—غيرَ قادرٍ على ممارسة الوسائل المذكورة آنفًا، فحينئذٍ—بعد أن تملك زمام نفسك—تخلَّ عن ثمار جميع الأعمال.

Verse 12

सम्बन्ध-- छठे श्लोकसे आठवेंतक अनन्यध्यानका फलसहित वर्णन करके नवेंसे ग्यारहवें *"लोकतक एक प्रकारके साधनमें असमर्थ होनेपर दूसरा साधन बतलाते हुए अन्तमें 'सर्वकर्मफलत्याग” रूप साधनका वर्णन किया गया। इससे यह शंका हो सकती है कि 'कर्मफलत्याग” रूप साधन पूर्वोक्त अन्य साधनोंकी अपेक्षा निग्न श्रेणीका होगा; अत: ऐसी शंकाको हटानेके लिये कर्मफलके त्यागका महत्व अगले श्लोकमें बतलाया जाता है श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्‌ ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात्‌ कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌,मर्मको न जानकर किये हुए अभ्याससे ज्ञान श्रेष्ठ है,” ज्ञानसे मुझ परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग श्रेष्ठ है;+ क्योंकि त्यागसे तत्काल ही परम शान्ति होती हैः

المعرفةُ خيرٌ من ممارسةٍ مكرورةٍ تُؤدَّى دون إدراكٍ للُّبّ. وأسمى من المعرفةِ تأمّلٌ ثابتٌ في حقيقة الربّ. وأسمى من التأمّلِ تركُ ثمارِ جميع الأعمال؛ فمن هذا التركِ تعقبُ السكينةُ على الفور.

Verse 13

सम्बन्ध-- उपर्युक्त श्लोकोंनें भगवान्‌की प्राप्तिके लिये अलग-अलग साधन बतलाकर उनका फल परमेश्वरकी प्राप्ति बतलाया गया; अतएव भगवान्‌को प्राप्त हुए सिद्ध भक्तोंके लक्षण जाननेकी इच्छा होनेपर अब सात शलोकोंमें उन भगवत्प्राप्त भक्तोंके लक्षण बतलाये जाते हैं-- काल सर्वभूतानां मैत्र: करूण एव च | निर्ममो निरहंकार: समदुःखसुख: क्षमी,जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु हैः तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दु:खोंकी प्राप्तिमें सम और क्षमावान्‌ है अर्थात्‌ अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है*, मन- इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए हैः और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है5, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला* मेरा भक्त मुझको प्रिय है:

مَن لا يحمل عداوةً تجاه جميع الكائنات، بل هو ودودٌ رحيمٌ بلا غرضٍ خفيّ؛ لا تملّك عنده ولا أنا متعاظمة؛ متساوٍ عنده السرّاء والضرّاء، وهو حليمٌ غفور—فذلك يحمل سمات العابد الذي بلغ الربّ حقًّا.

Verse 14

संतुष्ट: सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चय: । मय्यर्पितमनोबुद्धियों मद्धक्त: स मे प्रिय:,जो पुरुष सब भूतोंमें द्वेषभावसे रहित, स्वार्थरहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु हैः तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दु:खोंकी प्राप्तिमें सम और क्षमावान्‌ है अर्थात्‌ अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है*, मन- इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए हैः और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है5, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला* मेरा भक्त मुझको प्रिय है:

اليوغي الذي يظلّ راضيًا على الدوام، ضابطًا لنفسه، ثابتَ العزم؛ الذي قدّم عقلَه وفهمَه إليّ—ذلك العابدُ حبيبٌ إليّ.

Verse 15

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो" य: स च मे प्रिय:,जिससे कोई भी जीव उद्वेगको प्राप्त नहीं होताः और जो स्वयं भी किसी जीवसे उद्वेगको प्राप्त नहीं होता5 तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादिसे रहित है,* वह भक्त मुझको प्रिय है

حبيبٌ إليَّ من لا يُقلِقُ العالمَ ولا يُقلِقُه العالمُ، ومن تحرَّر من الابتهاج المفرِط، والسخط، والخوف، والاضطراب؛ ذلك العابدُ المُحِبّ (bhakta) هو عزيزٌ عليّ.

Verse 16

अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ: । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्धक्त: स मे प्रिय:,जो पुरुष आकांक्षासे रहित,* बाहर-भीतरसे शुद्ध, चतुर," पक्षपातसे रहित और दुःखोंसे छूटा हुआ है,+ वह सब आरम्भोंका त्यागी* मेरा भक्त मुझको प्रिय है

من كان غير متطلّعٍ ولا متوقّع، طاهرًا ظاهرًا وباطنًا، كفؤًا بصيرًا، محايدًا غير متعلّق، وقد تجاوز الألم؛ ومن ترك كلَّ ما يبتدئه بدافع الأنا—فذاك هو عابدي المُحِبّ (bhakta)، وهو حبيبٌ إليّ.

Verse 17

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काडुक्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्‌ यः स मे प्रिय:,जो न कभी हर्षित होता है,£ न द्वेष करता है,” न शोक करता है,“ न कामना करता है; तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका त्यागी है, वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है

من لا يطرب ولا يبغض ولا يحزن ولا يشتهي؛ ومن تخلّى عن التعلّق بثمار الفعل الحسنة والسيئة معًا—ذلك الموهوب بالبهكتي (bhakti) هو حبيبٌ إليّ.

Verse 18

सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो: । शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: सड़रविवर्जित:ः,जो शत्रु-मित्रमें* और मान-अपमानमें सम है तथा सरदी-गरमी और सुख-दु:खादि द्वन्द्ोंमें सम है" और आसक्तिसे रहित है

هو سواءٌ عنده العدوّ والصديق، وكذلك الكرامة والمهانة؛ وفي البرد والحرّ، وفي اللذّة والألم، يثبت ثابتًا، منزَّهًا عن التعلّق.

Verse 19

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मीनी संतुष्टो येन केनचित्‌ । अनिकेतः* स्थिरमतिर्भक्तिमान्‌ मे प्रियो नर:,जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला,” मननशील* और जिस किसी प्रकारसे भी शरीरका निर्वाह होनेमें सदा ही संतुष्ट हैः तथा रहनेके स्थानमें ममता और आसक्तिसे रहित है, वह स्थिरबुद्धिः भक्तिमान्‌ पुरुष मुझको प्रिय हैः

من يستوي عنده الذمّ والمدح، ساكنُ الباطن متأمّل، راضٍ بما يأتيه لمجرّد قِوام الجسد، غيرُ متعلّقٍ بمقامٍ أو مأوى، ثابتُ الفهم، موفورُ البهكتي—ذلك الرجل حبيبٌ إليّ.

Verse 20

सम्बन्ध-- परमात्माको प्राप्त हुए सिद्ध भ्क्तोंके लक्षण बतलाकर अब उन लक्षणोंको आदर्श मानकर बड़े प्रयत्नके साथ उनका भलीभाँति सेवन करनेवाले, परम श्रद्धालु, शरणायत भक्तोंकी प्रशंसा करनेके लिये, उनको अपना अत्यन्त प्रिय बतलाकर भगवान्‌ इस जअध्यायका उपसंद्यार करते हैं-- ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्ते5तीव मे प्रिया:,परंतु जो श्रद्धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृतकोर निष्काम प्रेम-भावसे सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं:

وأمّا الذين، بإيمانٍ، يجعلونني الغايةَ العليا، ويثابرون على معايشةِ هذا الرحيقِ الدهارمي كما قيل وعلِّم—فأولئك العابدون المخلصون هم أحبّ الناس إليّ حبًّا شديدًا.

Verse 35

भीष्मपर्वणि तु पज्चत्रिंशो 5 ध्याय:,भीष्मपर्वमें पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا تنتهي الفَصْلَة الخامسة والثلاثون من «بهيشما بارفا».

Verse 36

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशो5ध्याय: ।। १२ ॥। भीष्मपर्वणि तु षट्त्रिंशो5ध्याय:

وهكذا، ضمن «المهابهاراتا»—في «بهيشما بارفا»، في القسم المعروف بـ«بهاغافاد غيتا»—يُختَتَم التعليم ذو الطابع الأوبانيشدي في معرفة برهمن، وفي علم اليوغا، المعروض حوارًا بين شري كريشنا وأرجونا: الفصل الثاني عشر المسمّى «بهكتي يوغا» (يوغا التفاني). وفي عدّ «بهيشما بارفا» يقابل ذلك الفصل السادس والثلاثين.

Frequently Asked Questions

The dilemma is methodological: whether action should be governed by disciplined virtues and śāstra-guided discernment (kārya/akārya) or by impulse-driven desire, anger, and acquisitiveness that destabilize ethical judgment.

Liberative conduct is framed as a measurable disposition-set (daivī-sampad) cultivated through restraint, truthfulness, compassion, and study; destructive outcomes follow when one adopts the āsurī orientation characterized by arrogance, hypocrisy, and craving-centered cognition.

Yes, a functional meta-claim is stated: abandoning śāstra and acting from personal impulse yields no siddhi (attainment), no sukha (well-being), and no parā gati (highest end); conversely, using śāstra as pramāṇa supports right discernment and progress toward the highest goal.