Adhyaya 32
Bhishma ParvaAdhyaya 3229 Versesरण-स्थल पृष्ठभूमि में स्थिर; अध्याय का केंद्र युद्ध-रणनीति नहीं, अन्तःसाधना और परम-गति का निर्णय है।

Adhyaya 32

विभूति-योगः (Vibhūti-yoga) — Exemplary Manifestations as a Contemplative Index

Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Gītā-adhyāya cluster within Bhīṣma-parva)

Kṛṣṇa resumes instruction by asserting the limits of even divine and sage knowledge regarding his ultimate origin, positioning himself as the causal source of devas and seers (1–2). He states that correct recognition of him as unborn, beginningless, and lord of worlds functions as a liberative cognition that loosens moral-psychological burden (3). He then enumerates foundational qualities and polarities—intellect, knowledge, non-delusion, restraint, pleasure and pain, fear and fearlessness—as differentiated modalities proceeding from him (4–5), and situates primordial progenitors (seven seers, early Manus) as mind-born from his being (6). Knowing his vibhūti and yoga is presented as stabilizing one’s yogic integration; devotion is characterized by reflective understanding, mutual instruction, and constant discourse (7–9). He promises buddhi-yoga to devoted practitioners and depicts an inner illumination that dispels ignorance (10–11). Arjuna responds with a formal ascription of supreme titles and requests an expanded account of divine manifestations and the practical means of contemplation (12–18). Kṛṣṇa agrees to speak selectively, then offers a structured catalogue: he is the self within beings; among classes he is the foremost (Vişṇu among Ādityas, Sun among lights, etc.), extending across sacred texts, deities, mountains, rivers, virtues, time, governance, and the seed of all existence (19–39). He concludes that the list is only indicative: all excellence is a fraction of his radiance, and the cosmos is sustained by a single portion of his power (40–42).

Chapter Arc: अर्जुन का प्रश्न युद्धभूमि के बीचों-बीच भीतर की अंतिम घड़ी पर टिक जाता है—‘अधियज्ञ कौन है, देह में कैसे स्थित है, और प्रयाण-काल में युक्तात्मा उसे कैसे जानें?’ → कृष्ण उत्तर देते हुए ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ की परिभाषाएँ खोलते हैं; फिर प्रश्न और तीखा होता है—मृत्यु के क्षण चंचल मन को कैसे साधें, किस स्मरण से गति सुनिश्चित हो? → निर्णायक वचन: ‘अन्तकाले मामेव स्मरन्…’—जो अंतिम क्षण में कृष्ण-स्मरण के साथ देह त्यागता है, वह उन्हीं को प्राप्त होता है; और यह स्मरण अभ्यास-योग, एकाग्र चित्त, भक्ति और प्राण-नियमन से सिद्ध होता है। → कृष्ण काल-चक्र और ब्रह्मा के दिन-रात्रि का विस्तार बताते हैं, फिर ‘शुक्ल/कृष्ण’—दो मार्गों का रहस्य रखते हैं; योगी इन मार्गों को जानकर मोहित नहीं होता और ‘सर्वेषु कालेषु योगयुक्त’ रहने का आदेश पाता है। → अर्जुन के सामने अब प्रश्न नहीं, साधना का आदेश है—क्या वह इसी क्षण, इसी रणभूमि में, निरंतर योग-युक्त होकर कर्म में उतरेगा?

Shlokas

Verse 1

भीष्मपर्वमें इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३९ ॥। 75 5 १. इस लोक और परलोकके किसी भी भोगके प्रति जिसके मनमें तनिक भी आसक्ति नहीं रह गयी है तथा जिसका मन सब ओरसे हटकर एकमात्र परम प्रेमास्पद, सर्वगुणसम्पन्न परमेश्वरमें इतना अधिक आसक्त हो गया है कि जलके जरासे वियोगमें परम व्याकुल हो जानेवाली मछलीके समान जो क्षणभर भी भगवान्‌के वियोग और विस्मरणको सहन नहीं कर सकता, वह “मय्यासक्तमना: है। २. जो पुरुष संसारके सम्पूर्ण आश्रयोंका त्याग करके समस्त आशाओं और भरोसोंसे मुँह मोड़कर एकमात्र भगवानूपर ही निर्भर करता है और सर्वशक्तिमान्‌ भगवान्‌को ही परम आश्रय तथा परम गति जानकर एकमात्र उन्हींके भरोसेपर सदाके लिये निश्चिन्त हो गया है, वह “मदाश्रयः” है। 3. मन और बुद्धिको अचलभावसे भगवानूमें स्थिर करके नित्य-निरन्तर श्रद्धा-प्रेमपूर्वक उनका चिन्तन करना ही योगमें लग जाना है। ४. भगवान्‌ नित्य हैं, सत्य हैं, सनातन हैं; वे सर्वगुणसम्पन्न, सर्वशक्तिमान्‌, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वाधार और सर्वरूप हैं तथा स्वयं ही अपनी योगमायासे जगत्‌के रूपमें प्रकट होते हैं। वस्तुत: उनके अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं; व्यक्त- अव्यक्त और सगुण-निर्गुण सब वे ही हैं। इस प्रकार उन भगवानके स्वरूपको निर्भ्रान्त और असंदिग्धरूपसे समझ लेना ही समग्र भगवान्‌को संशयरहित जानना है। ५. भगवानके निर्गुण-निराकार तत्त्वका जो प्रभाव, माहात्म्य और रहस्यसहित यथार्थ ज्ञान है, उसे 'ज्ञान' कहते हैं; इसी प्रकार उनके सगुण निराकार और दिव्य साकार तत्त्वके लीला, रहस्य, गुण, महत्त्व और प्रभावसहित यथार्थ ज्ञानका नाम “विज्ञान' है। ६. ज्ञान और विज्ञानके द्वारा भगवान्‌के समग्र स्वरूपकी भलीभाँति उपलब्धि हो जाती है। यह विश्व-ब्रह्माण्ड तो समग्ररूपका एक क्षुद्र-सा अंशमात्र है। जब मनुष्य भगवान्‌के समग्ररूपको जान लेता है, तब स्वभावतः ही उसके लिये कुछ भी जानना बाकी नहीं रह जाता। ३. भगवत्कृपाके फलस्वरूप मनुष्य-शरीर प्राप्त होनेपर भी जन्म-जन्मान्तरके संस्कारोंसे भोगोंमें अत्यन्त आसक्ति और भगवानूमें श्रद्धा-प्रेमका अभाव या कमी रहनेके कारण अधिकांश मनुष्य तो इस मार्गकी ओर मुँह ही नहीं करते। जिसके पूर्वसंस्कार शुभ होते हैं, भगवान्‌, महापुरुष और शास्त्रोंमें जिसकी कुछ श्रद्धा-भक्ति होती है तथा पूर्वप्रण्योंके पुंजसे और भगवत्कृपासे जिसको सत्पुरुषोंका संग प्राप्त हो जाता है, हजारों मनुष्योंमेंसे ऐसा कोई बिरला ही इस मार्गमें प्रवृत्त होकर प्रयत्न करता है। २. चेष्टाके तारतम्यसे सबका साधन एक-सा नहीं होता। अहंकार, ममत्व, कामना, आसक्ति और संगदोष आदिके कारण नाना प्रकारके विष्न भी आते ही रहते हैं। अतएव साधन करनेवालोंमें भी बहुत थोड़े ही पुरुष ऐसे निकलते हैं, जिनकी श्रद्धा-भक्ति और साधना पूर्ण होती है और उसके फलस्वरूप इसी जन्ममें वे भगवान्‌का साक्षात्कार कर लेते हैं। 3. गीताके तेरहवें अध्यायमें भगवान्‌ने जिस अव्यक्त मूल प्रकृतिके तेईस कार्य बतलाये हैं, उसीको यहाँ आठ भेदोंमें विभक्त बतलाया है। यह “अपरा प्रकृति" ज्ञेय तथा जड होनेके कारण ज्ञाता चेतन जीवरूपा 'परा प्रकृति” से सर्वथा भिन्न और निकृष्ट है; यही संसारकी हेतुरूप है और इसीके द्वारा जीवका बन्धन होता है। इसीलिये इसका नाम “अपरा प्रकृति" है। ४. समस्त जीवोंके शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण तथा भोग्यवस्तुएँ और भोगस्थानमय इस सम्पूर्ण व्यक्त प्रकृतिका नाम जगत्‌ है। ऐसा यह जगत्‌्रूप जडतत्त्व चेतनतत्त्वसे व्याप्त है। अत: उसीने इसे धारण कर रखा है। ५. अचर और चर जितने भी छोटे-बड़े सजीव प्राणी हैं, उन सभी सजीव प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और वृद्धि इन “अपरा” (जड) और “परा' (चेतन) प्रकृतियोंके संयोगसे ही होती हैं। इसलिये उनकी उत्पत्तिमें ये ही दोनों कारण हैं। यही बात गीताके तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें क्षेत्र-क्षेत्रज्षक नामसे कही गयी है। ६. जैसे बादल आकाशसे उत्पन्न होते हैं, आकाशमें रहते हैं और आकाशमें ही विलीन हो जाते हैं तथा आकाश ही उनका एकमात्र कारण और आधार है, वैसे ही यह सारा विश्व भगवानसे ही उत्पन्न होता है, भगवानमें ही स्थित है और भगवानमें ही विलीन हो जाता है। भगवान्‌ ही इसके एकमात्र महान्‌ कारण और परम आधार हैं। ७. जैसे सूतकी डोरीमें उसी सूतकी गाँठे लगाकर उन्हें मनिये मानकर माला बना लेते हैं और जैसे उस डोरीमें और गाँठोंके मनियोंमें सर्वत्र केवल सूत ही व्याप्त रहता है, उसी प्रकार यह समस्त संसार भगवानमें गुँथा हुआ है। भगवान्‌ ही सबमें ओतप्रोत हैं। ८. शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्धसे इस प्रसंगमें इनके कारणरूप तन्मात्राओंका ग्रहण है। इस बातको स्पष्ट करनेके लिये उनके साथ पवित्र शब्द जोड़ा गया है। ३. जो सदासे हो तथा कभी नष्ट न हो, उसे 'सनातन' कहते हैं। भगवान्‌ ही समस्त चराचर भूत-प्राणियोंके परम आधार हैं और उन्हींसे सबकी उत्पत्ति होती है। अतएव वे ही सबके 'सनातन बीज हैं। २. सम्पूर्ण पदार्थोका निश्चय करनेवाली और मन-इन्द्रियोंको अपने शासनमें रखकर उनका संचालन करनेवाली अन्तःकरणकी जो परिशुद्ध बोधमयी शक्ति है, उसे बुद्धि कहते हैं; जिसमें वह बुद्धि अधिक होती है, उसे बुद्धिमान्‌ कहते हैं; यह बुद्धिशक्ति भगवान्‌की अपरा प्रकृतिका ही अंश है। इसी प्रकार सब लोगोंपर प्रभाव डालनेवाली शक्तिविशेषका नाम तेजस्‌ है; यह तेजस्तत्त्व जिसमें विशेष होता है, उसे लोग “तेजस्वी” कहते हैं। यह तेज भी भगवानकी अपरा प्रकृतिका ही एक अंश है, इसलिये भगवानने इन दोनोंको अपना स्वरूप बतलाया है। ३. जिस बलमें कामना, राग, अहंकार तथा क्रोधादिका संयोग है, उस बलका वर्णन आसुरी सम्पदामें किया गया है (गीता १६।१८), अत: वह तो आसुर बल है और उसके त्यागनेकी बात कही है (गीता १८।५३)। इसी प्रकार धर्मविरुद्ध काम भी आसुरी सम्पदाका प्रधान गुण होनेसे समस्त अनर्थोंका मूल (गीता ३।३७), नरकका द्वार और त्याज्य है (गीता १६।२१)। काम-रागयुक्त “बल' से और धर्मविरुद्ध “काम” से विलक्षण, विशुद्ध “बल' और विशुद्ध “काम” ही भगवान्‌का स्वरूप है। ४. मन, बुद्धि, अहंकार, इन्द्रिय, इन्द्रियोंके विषय, तन्मात्राएँ, महाभूत और समस्त गुण-अवगुण तथा कर्म आदि जितने भी भाव हैं, सभी सात््विक, राजस और तामस भावोंके अन्तर्गत हैं। इन समस्त पदार्थोंका विकास और विस्तार भगवान्‌की “अपरा प्रकृति' से होता है और वह प्रकृति भगवान्‌की है, अत: भगवानसे भिन्न नहीं है, उन्हींके लीलासंकेतसे प्रकृतिके द्वारा सबका सृजन, विस्तार और उपसंहार होता रहता है--इस प्रकार जान लेना ही उन सबको “भगवान्‌से होनेवाले' समझना है। ५. जैसे आकाशमें उत्पन्न होनेवाले बादलोंका कारण और आधार आकाश है, परंतु आकाश उनसे सर्वथा निर्लिप्त है। बादल आकाशमें सदा नहीं रहते और अनित्य होनेसे वस्तुत: उनकी स्थिर सत्ता भी नहीं है; पर आकाश बादलोंके न रहनेपर भी सदा रहता है। जहाँ बादल नहीं है, वहाँ भी आकाश तो है ही; वह बादलोंके आश्रित नहीं है। वस्तुतः बादल भी आकाशकसे भिन्न नहीं हैं, उसीमें उससे उत्पन्न होते हैं। अतएव यथार्थमें बादलोंकी भिन्न सत्ता न होनेसे आकाश किसी समय भी बादलोंमें नहीं है, वह तो सदा अपने-आपमें ही स्थित है। इसी प्रकार यद्यपि भगवान्‌ भी समस्त त्रिगुणमय भावोंके कारण और आधार हैं, तथापि वास्तवमें वे गुण भगवानमें नहीं हैं और भगवान्‌ उनमें नहीं हैं। भगवान्‌ तो सर्वथा और सर्वदा गुणातीत हैं तथा नित्य अपने-आपमें ही स्थित हैं। ३१. जगत्‌के समस्त देहाभिमानी प्राणी--यहाँतक कि मनुष्य भी--अपने-अपने स्वभाव, प्रकृति और विचारके अनुसार, अनित्य और दुःखपूर्ण इन त्रिगुणमय भावोंको ही नित्य और सुखके हेतु समझकर इनकी कल्पित रमणीयता और सुखरूपताकी केवल ऊपरसे ही दीखनेवाली चमक-दमकमें जीवनके परम लक्ष्यको भूलकर भगवानके गुण, प्रभाव, तत्त्व, स्वरूप और रहस्यके चिन्तन और ज्ञानसे विमुख हो रहे हैं। इस कारण उनकी विवेकदृष्टि इतनी स्थूल हो गयी है कि वे विषयोंके संग्रह करने और भोगनेके सिवा जीवनका अन्य कोई कर्तव्य या लक्ष्य ही नहीं समझते। इसलिये वे इन सबसे सर्वथा अतीत, अविनाशी परमात्माको नहीं जान सकते। २. जो एकमात्र भगवान्‌को ही अपना परम आश्रय, परम गति, परम प्रिय और परम प्राप्य मानते हैं तथा सब कुछ भगवान्‌का या भगवानके ही लिये है--ऐसा समझकर जो शरीर, स्त्री, पुत्र, धन, गृह, कीर्ति आदिमें ममत्व और आसक्तिका त्याग करके, उन सबको भगवान्‌की ही पूजाकी सामग्री बनाकर तथा भगवान्‌के रचे हुए विधानमें सदा संतुष्ट रहकर, भगवान्‌की आज्ञाके पालनमें तत्पर और भगवानके स्मरणपरायण होकर अपनेको सब प्रकारसे निरन्तर भगवानूमें ही लगाये रखते हैं, वे शरणागत भक्त मायासे तरते हैं। ३. जन्म-जन्मान्तरसे शुभकर्म करते-करते जिनका स्वभाव सुधरकर शुभकर्मशील बन गया है और पूर्वसंस्कारोंके बलसे अथवा महत्संगके प्रभावसे जो इस जन्ममें भी भगवदाज्ञानुसार शुभकर्म ही करते हैं, उन शुभकर्म करनेवालोंको “सृकृती' कहते हैं। ४. स्त्री, पुत्र, धन, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्ग-सुख आदि इस लोक और परलोकके भोगोंमेंसे, जिसके मनमें एककी या बहुतोंकी कामना है, परंतु कामनापूर्तिके लिये जो केवल भगवानपर ही निर्भर करता है और इसके लिये जो श्रद्धा और विश्वासके साथ भगवान्‌का भजन करता है, वह “अर्थार्थी” भक्त है। सुग्रीव-विभीषणादि भक्त अर्थार्थी माने जाते हैं, इनमें प्रधानतासे ध्रुवका नाम लिया जाता है। ५. जो शारीरिक या मानसिक संताप, विपत्ति, शत्रुभय, रोग, अपमान, चोर, डाकू और आततायियोंके अथवा हिंस्र जानवरोंके आक्रमण आदिसे घबराकर उनसे छूटनेके लिये पूर्ण विश्वासके साथ हृदयकी अडिग श्रद्धासे भगवानूका भजन करता है, वह “आर्त' भक्त है। आर्त भक्तोंमें गजराज, जरासंधके बंदी राजागण आदि बहुत-से माने जाते हैं; परंतु सती द्रौपदीका नाम मुख्यतया लिया जाता है। ६. धन, स्त्री, पुत्र, गृह आदि वस्तुओंकी और रोग-संकटादिकी परवा न करके एकमात्र परमात्माको तत्त्वसे जाननेकी इच्छासे ही जो एकनिष्ठ होकर भगवान्‌की भक्ति करता है (गीता १४॥२६), उस कल्याणकामी भक्तको “जिज्ञासु” कहते हैं। जिज्ञासु भक्तोंमें परीक्षित्‌ आदि अनेकोंके नाम हैं, परंतु उद्धवजीका नाम विशेष प्रसिद्ध है। ७. जो परमात्माको प्राप्त कर चुके हैं, जिनकी दृष्टिमें एक परमात्मा ही रह गये हैं--परमात्माके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं और इस प्रकार परमात्माको प्राप्त कर लेनेसे जिनकी समस्त कामनाएँ नि:शेषरूपसे समाप्त हो चुकी हैं, तथा ऐसी स्थितिमें जो सहजभावसे ही परमात्माका भजन करते हैं, वे 'ज्ञानी' हैं (गीता १२।१३-१९)। गीताके नवें अध्यायके तेरहवें और चौदहवें श्लोकोंमें तथा दसवें अध्यायके तीसरे और पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जिनका वर्णन है, वे निष्काम अनन्य प्रेमी साधक भक्त भी ज्ञानी भक्तोंके अन्तर्गत हैं। ज्ञानियोंमें शुकदेवजी, सनकादि, नारदजी और भीष्मजी आदि प्रसिद्ध हैं। बालक प्रह्नाद भी ज्ञानी भक्त माने जाते हैं। ३. संसार, शरीर और अपने-आपको सर्वथा भूलकर जो अनन्यभावसे नित्य-निरन्तर केवल भगवानूमें ही स्थित है, उसे “नित्ययुक्त' कहते हैं और जो भगवानमें ही हेतुरहित और अविरल प्रेम करता है, उसे “एकभक्ति” कहते हैं; ऐसा भगवानके तत्त्वको जाननेवाला ज्ञानी भक्त अन्य सबसे उत्तम है। २. जिन्होंने इस लोक और परलोकके अत्यन्त प्रिय, सुखप्रद तथा सांसारिक मनुष्योंकी दृष्टिसे दुर्लभ-से-दुर्लभ माने जानेवाले भोगों और सुखोंकी समस्त अभिलाषाओंका भगवानके लिये त्याग कर दिया है, उनकी दृष्टिमें भगवान्‌का कितना महत्त्व है और उनको भगवान्‌ कितने प्यारे हैं--दूसरे किसीके द्वारा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसीलिये भगवान्‌ कहते हैं कि 'ज्ञानीको' मैं अत्यन्त प्रिय हूँ।! और जिनको भगवान्‌ अतिशय प्रिय हैं, वे भगवान्‌को तो अतिशय प्रिय होंगे ही। 3. वे सब प्रकारके भक्त इस बातका भलीभाँति निश्चय कर चुके हैं कि भगवान्‌ सर्वशक्तिमान्‌ हैं, सर्वज्ञ हैं, सर्वेश्वर हैं, परम दयालु हैं और परम सुहृद्‌ हैं; हमारी आशा और आकांक्षाओंकी पूर्ति एकमात्र उन्हींसे हो सकती है। ऐसा मान और जानकर, वे अन्य सब प्रकारके आश्रयोंका त्याग करके अपने जीवनको भगवानके ही भजन-स्मरण, पूजन और सेवा आदिमें लगाये रखते हैं। उनकी एक भी चेष्टा ऐसी नहीं होती, जो भगवानके विश्वासमें जरा भी त्रुटि लानेवाली हो। इसलिये सबको “उदार' कहा गया है। ४. इस कथनसे भगवान्‌ यह भाव दिखला रहे हैं कि ज्ञानी भक्तमें और मुझमें कुछ भी अन्तर नहीं है। भक्त है सो मैं हूँ और मैं हूँ सो भक्त है। ५. जिस जन्ममें मनुष्य भगवान्‌का ज्ञानी भक्त बन जाता है, वही उसके बहुत-से जन्मोंके अन्तका जन्म है; क्योंकि भगवान्‌को इस प्रकार तत्त्वसे जान लेनेके पश्चात्‌ उसका पुन: जन्म नहीं होता; वही उसका अन्तिम जन्म होता है। ६. भगवानने इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें विज्ञानसहित जिस ज्ञानके जाननेकी प्रशंसा की थी, जिस प्रेमी भक्तने उस विज्ञानसहित ज्ञानको प्राप्त कर लिया है तथा तीसरे श्लोकमें जिसके लिये कहा है कि कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है, उसीके लिये यहाँ 'ज्ञानवान्‌' शब्दका प्रयोग हुआ है। इसीलिये अठारहवें श्लोकमें भगवानने उसको अपना स्वरूप बतलाया है। ७. सम्पूर्ण जगत्‌ भगवान्‌ वासुदेवका ही स्वरूप है, वासुदेवके सिवा और कुछ है ही नहीं, इस तत्त्वका प्रत्यक्ष और अटल अनुभव हो जाना और उसीमें नित्य स्थित रहना--यही “सब कुछ वासुदेव है", इस प्रकारसे भगवानूका भजन करना है। ८. जन्म-जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंसे संस्कारोंका संचय होता है और उस संस्कारसमूहसे जो प्रकृति बनती है, उसे “स्वभाव” कहा जाता है। स्वभाव प्रत्येक जीवका भिन्न होता है। उस स्वभावके अनुसार जो अन्त:करणमें भिन्न-भिन्न देवताओंका पूजन करनेकी भिन्न-भिन्न इच्छा उत्पन्न होती है, उसीको “उससे प्रेरित होना” कहते हैं। $. सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, इन्द्र, मरुत, यमराज और वरुण आदि शास्त्रोक्त देवताओंको भगवानसे भिन्न समझकर, जिस देवताकी, जिस उद्देश्यसे की जानेवाली उपासनामें जप, ध्यान, पूजन, नमस्कार, न्यास, हवन, व्रत, उपवास आदिके जो- जो भिन्न-भिन्न नियम हैं, उन-उन नियमोंको धारण करके बड़ी सावधानीके साथ उनका भलीभाँति पालन करते हुए उन देवताओंकी आराधना करना ही “उस-उस नियमको धारण करके अन्य देवताओंको भजना' है। २. देवताओंकी सत्तामें, उनके प्रभाव और गुणोंमें तथा पूजन-प्रकार और उसके फलमें पूरा विश्वास करके श्रद्धापूर्वक जिस देवताकी जैसी मूर्तिका विधान हो, उसकी वैसे ही धातु, काष्ठ, मिट्टी, पाषाण आदिकी मूर्ति या चित्रपटकी विधिपूर्वक स्थापना करके अथवा मनके द्वारा मानसिक मूर्तिका निर्माण करके जिस मन्त्रकी जितनी संख्याके जपपूर्वक जिन सामग्रियोंसे जैसी पूजाका विधान हो, उसी मन्त्रकी उतनी ही संख्या जपकर उन्हीं सामग्रियोंसे उसी विधानसे पूजा करना, देवताओंके निमित्त अग्निमें आहुति देकर यज्ञादि करना, उनका ध्यान करना, सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि प्रत्यक्ष देवताओंका पूजन करना और इन सबको यथाविधि नमस्कारादि करना--यही 'देवताओंके स्वरूपको श्रद्धासे पूजना' है। ३. देवोपासक कामनाओंके वशमें होकर, अन्य देवताओंको भगवानसे पृथक्‌ मानकर, भोगवस्तुओंके लिये उनकी उपासना करते हैं, इसलिये उनको भक्तोंकी अपेक्षा निम्न श्रेणीके और “अल्पबुद्धि' कहा गया है। ४. भगवानके नित्य दिव्य परमधाममें निरन्तर भगवान्‌के समीप निवास करना अथवा अभेदभावसे भगवानूमें एकत्वको प्राप्त हो जाना, दोनोंहीका नाम “भगवत्प्राप्ति' है। ५, अपनी अनन्त दयालुता और शरणागतवत्सलताके कारण जगतके प्राणियोंको अपनी शरणागतिका सहारा देनेके लिये ही भगवान्‌ अपने अजन्मा, अविनाशी और महेश्वर स्वभाव तथा सामर्थ्यके सहित ही नाना स्वरूपोंमें प्रकट होते हैं और अपनी अलौकिक लीलाओंसे जगत्के प्राणियोंको परमानन्दके महान्‌ सागरमें निमग्न कर देते हैं। भगवान्‌का यही नित्य, अनुत्तम और परमभाव है तथा इसको न समझना ही “उनके अनुत्तम अविनाशी परमभावको न जानना है। ६. भगवानके निर्गुण-सगुण दोनों ही रूप नित्य और दिव्य हैं। मनुष्यादिके रूपमें उनका प्रादुर्भाव होना ही जन्म है और अन्तर्धान हो जाना ही परमधामगमन है। अन्य प्राणियोंकी भाँति शरीर-संयोग-वियोगरूप जन्म-मरण उनके नहीं होते। इस रहस्यको न समझनेके कारण बुद्धिहीन मनुष्य समझते हैं कि जैसे अन्य सब प्राणी जन्मसे पहले अव्यक्त थे अर्थात्‌ उनकी कोई सत्ता नहीं थी, अब जन्म लेकर व्यक्त हुए हैं; इसी प्रकार यह श्रीकृष्ण भी जन्मसे पहले नहीं था, अब वसुदेवके घरमें जन्म लेकर व्यक्त हुआ है; अन्य मनुष्योंमें और इसमें अन्तर ही क्या है? अर्थात्‌ कोई भेद नहीं है। यही बुद्धिहीन मनुष्यका भगवान्‌को अव्यक्तसे व्यक्त हुआ मानना है। ३. 'लोक:” पदका प्रयोग केवल भगवानके भक्तोंको छोड़कर शेष पापी, पुण्यात्मा--सभी श्रेणीके साधारण अज्ञानी मनुष्यसमुदायके लिये किया गया है। २. गीताके चौथे अध्यायके छठे श्लोकमें भगवानने जिसको “आत्ममाया” कहा है, जिस योगशक्तिसे भगवान्‌ दिव्य गुणोंके सहित स्वयं मनुष्यादि रूपोंमें प्रकट होते हुए भी लोकदृष्टिमें जन्म धारण करनेवाले साधारण मनुष्य-से प्रतीत होते हैं, उसी मायाशक्तिका नाम 'योगमाया'” है। उससे वास्तवमें भगवान्‌ आवृत नहीं होते तथापि जैसे लोगोंकी दृष्टि बादलोंसे आवृत हो जानेके कारण ऐसा कहा जाता है कि सूर्य बादलोंसे ढका गया, उसी प्रकार यहाँ भगवान्‌का अपनेको योगमायासे छिपा रहना बताना है। ३. यहाँ भगवान्‌ यह कहते हैं कि “देवता, मनुष्य, पशु और कीट-पतंगादि जितने भी भूत--चराचर प्राणी हैं, वे सब अबसे पूर्व अनन्त कल्प-कल्पान्तरोंमें कब किन-किन योनियोंमें किस प्रकार उत्पन्न होकर कैसे रहे थे और उन्होंने क्या- क्या किया था तथा वर्तमान कल्पमें कौन, कहाँ, किस योनिमें किस प्रकार उत्पन्न होकर क्‍या कर रहे हैं और भविष्य कल्पोंमें कौन कहाँ किस प्रकार रहेंगे, इन सब बातोंको मैं जानता हूँ।” वास्तवमें भगवान्‌के लिये भूत, भविष्य और वर्तमानकालका भेद नहीं है। उनके अखण्ड ज्ञानस्वरूपमें सभी कुछ सदा-सर्ददा प्रत्यक्ष है। ४. जिनको भगवानने मनुष्यके कल्याणमार्गमें विघ्न डालनेवाले शत्रु (परिपन्थी) बतलाया है (गीता ३।३४) और काम- क्रोधके नामसे (गीता ३।३७) जिनको पापोंमें हेतु तथा मनुष्यका वैरी कहा है, उन्हीं राग-द्वेषका यहाँ “इच्छा” और “द्वेष' के नामसे वर्णन किया है। इन “इच्छा-द्वेष” से जो हर्ष-शोक और सुख-दु:खादि द्वन्द्व उत्पन्न होते हैं, वे इस जीवके अज्ञानको दृढ़ करनेमें कारण होते हैं; अतएव उन्हींका नाम “द्वन्द्धरूप मोह' है। ५. भगवान्‌को ही सर्वव्यापी, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान, सबके आत्मा और परम पुरुषोत्तम समझकर बुद्धिसे उनके तत्त्वका निश्चय, मनसे उनके गुण, प्रभाव, स्वरूप और लीला-रहस्यका चिन्तन, वाणीसे उनके नाम और गुणोंका कीर्तन, सिरसे उनको नमस्कार, हाथोंसे उनकी पूजा और दीन-दुःखी आदिके रूपमें उनकी सेवा, नेत्रोंसे उनके विग्रहके दर्शन, चरणोंसे उनके मन्दिर और तीर्थादिमें जाना तथा अपनी समस्त वस्तुओंको नि:ःशेषरूपसे केवल उनके ही अर्पण करके सब प्रकार केवल उन्हींका हो रहना--यही 'सब प्रकारसे उनको भजना' है। ६. यहाँ भगवान्‌ यह कहते हैं कि “जो संसारके सब विषयोंके आश्रयको छोड़कर दृढ़ विश्वासके साथ एकमात्र मेरा ही आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें ही मन-बुद्धिको लगाये रखते हैं, वे मेरे शरण होकर यत्न करनेवाले हैं।' द्वात्रिशोड ध्याय: (श्रीमद्भधगवद्गीतायामष्टमो<5 ध्याय:) ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिके विषयमें अर्जुनके सात प्रश्न और उनका उत्तर एवं भक्तियोग तथा शुक्ल और कृष्ण मार्गोंका प्रतिपादन सम्बन्ध--गीताके सातवें अध्यायमें पहलेसे तीसरे *लोकतक भगवान्‌ने अपने समग्ररूपका तत्त्व युननेके लिये अर्जुनकों सावधान करते हुए. उसके कहनेकी प्रतिज्ञा और जाननेवालोंकी प्रशंसा की। फिर सत्ताईसवें श_लीकतक अनेक प्रकारसे उस तत्त्वको समझाकर न जाननेके कारणको भी भलीभाँति समझाया और अन्तमें ब्रह्म; अध्यात्म, कर्म; अधिथूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्‌के समग्र रूपको जाननेवाले भ्क्तकी महिमाका वर्णन करते हुए उस जअध्यायका उपसंहार किया: किंतु उनतीसवें और तीसवें शलोकोनें वर्णित ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म अधिभूत; अधिदैव और अधियज्ञ--इन छह्ठोंका तथा प्रयाणकालमें भगवान्‌को जाननेकी बातका रहस्य भलीभॉति न समझनेके कारण इस आठवें अध्यायके आरम्भमें पहले दो शलोकोंमें अर्जुन उपर्युक्त सातों विषयोंको समझनेके लिये भगवानूसे सात प्रश्न करते हैं-- अजुन उवाच कि तद्‌ ब्रह्म किमध्यात्मं कि कर्म पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते,अर्जुनने कहा--हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्‍या है? कर्म क्‍या है? अधिभूत नामसे क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं?

قال أرجونا: «يا بُرُشوتّما (الشخص الأسمى)، ما هو “البراهمن” (Brahman)؟ وما معنى “الأدهياتما” (adhyātma: المبدأ الروحي الباطن)؟ وما هي “الكارما” (karma: الفعل) في هذا السياق؟ وما الذي يُسمّى “أدهِبهوته” (adhibhūta: مجال الكائنات والعناصر الفانية)؟ وما الذي يُدعى “أدهِديفا” (adhidaiva: المبدأ الإلهي الحاكم)؟»

Verse 2

अधियज्ञ: कथं कोअत्र देहेडस्मिन्‌ मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोडसि नियतात्मभि:,हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीरमें कैसे है? तथा युक्तचित्तवाले पुरुषोंद्वारा अन्त समयमें आप किस प्रकार जाननेमें आते हैं?

قال أرجونا: «يا مدهوسودانا، من هو “الأدهِيَجْنَ” (Adhiyajña) هنا، وكيف يقيم في هذا الجسد؟ وعند ساعة الرحيل، بأيّ وجه ينبغي أن تُعرَف من قِبَل من يملكون زمام أنفسهم ويثبتون على الانضباط؟»

Verse 3

श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावो<ध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्धवकरो विसर्ग: कर्मसंज्ञित:,श्रीभगवानने कहा--परम अक्षर “ब्रह्म” है. अपना स्वरूप अर्थात्‌ जीवात्मा 'अध्यात्म/ नामसे कहा जाता है तथा भूतोंके भावको उत्पन्न करनेवाला जो त्याग है, वह “कर्म” नामसे कहा गया है

قال الربّ المبارك: «إنّ غير الفاني، الأعلى، هو براهما. وأمّا طبيعة المرء الذاتية—الآتمن الباطن—فتُسمّى (أدهياتما). وأمّا الفيض/الانبثاق الذي يُنشئ أحوال الكائنات فذلك يُسمّى (كارما)».

Verse 4

अधिभूतं क्षरो भाव: पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञो5हमेवात्र देहे देहभूतां वर

«الأدهيبهوته» هو طور الوجود الفاني القابل للزوال، و«الأدهي ديفته» هو البوروشا الكوني. وهنا، في هذا الجسد، أنا نفسي «الأدهي يَجْنَه»—الربّ الساكن في الداخل، الذي يتقبّل الذبيحة ويقدّسها.

Verse 5

अन्तकाले च मामेव स्मरन्‌ मुक्त्वा कलेवरम्‌ | यः प्रयाति स मद्धाव॑ याति नास्त्यत्र संशय:,जो पुरुष अन्तकालमें भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह मेरे साक्षात्‌ स्वरूपको प्राप्त होता है*--इसमें कुछ भी संशय नहीं है?

مَن يذكرني وحدي عند لحظة النهاية ثم يترك الجسد، فإنه يمضي ليبلغ حالتي أنا؛ ولا شكّ في ذلك.

Verse 6

सम्बन्ध-- यहाँ यह बात कही गयी कि भ्रगवान्‌का स्मरण करते हुए मरनेवाला भगवान्‌को ही प्राप्त होता है। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि केवल भगवान्‌के स्मरणके सम्बन्धनें ही यह विशेष नियम है या सभीके सम्बन्धमें है? इसपर कहते हैं-- यं यं वापि स्मरन्‌ भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌ | त॑ तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:,हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अन्तकालमें जिस-जिस भी भावको* स्मरण करता हुआ शरीरका त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह सदा उसी भावसे भावित रहा है?

يا أرجونا ابن كونتي! أيَّ حالٍ يتذكّره الإنسان عند النهاية وهو يترك الجسد، إلى ذلك الحال بعينه يبلغ؛ لأنه كان على الدوام مُشَكَّلًا ومُشْبَعًا بتلك النزعة نفسها.

Verse 7

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌्गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‌्गीतोपनिषद्‌: श्रीकृष्णाजुनसंवादमें ज्ञान-विज्ञानयोग नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ,तस्मात्‌ सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । मय्यर्पितमनोबुद्धिममिवैष्यस्यसंशयम्‌ इसलिये हे अर्जुन! तू सब समयमें निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर।* इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिसे युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा

فلذلك، يا أرجونا، في كل الأوقات اذكرني على الدوام، وقاتِل أيضًا. فإذا أودعتَ عقلك وفهمك فيَّ، فستبلغني بلا ريب.

Verse 8

अभ्यासयोगयुक्तेनः चेतसा नान्यगामिना । परम॑ पुरुष दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌,हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वरके ध्यानके अभ्यासरूप योगसे युक्त, दूसरी ओर न जानेवाले चित्तसे निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश-स्वरूप दिव्य पुरुषको अर्थात्‌ परमेश्वरको ही प्राप्त होता है

بعقلٍ مُهذَّبٍ بيوغا المران المتكرر—ثابتٍ لا يتيه إلى غيره—من يداوم على التأمل في الأسمى، في الشخص الإلهي المتلألئ، فإنه لا ينال إلا هو.

Verse 9

कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्‌ य: । सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम्‌ आदित्यवर्ण तमस: परस्तात्‌

من يذكره بثبات—الحكيم الشاعر القديم، الأول الأزلي، الآمر الهادي، الأدقّ من الأدقّ، حاملَ الكلّ، الذي لا تُدرك صورته بالفكر، المتلألئ كالشمس، القائم وراء ظلمة الجهل—فإنه يثبت قلبه على الأسمى في الساعة الحاسمة.

Verse 10

प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्‍्त्या युक्तो योगबलेन चैव । भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌ सतं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌

عند ساعة الرحيل، من كان عقله ثابتًا، متّحدًا بالمحبة التعبدية، مقوّىً بقوة اليوغا، وأحسنَ إيداع نَفَسِ الحياة في الموضع بين الحاجبين—فإنه يبلغ الشخص الأسمى المتلألئ، الحقيقة الأبدية.

Verse 11

जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता,“ सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करनेवाले, अचिन्त्यस्वरूप, सूर्यके सदृश नित्य चेतन प्रकाशरूप और अविद्यासे अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वरका स्मरण करता है, वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकालमें भी योगबलसे भृकुटीके मध्यमें प्राणको अच्छी प्रकार स्थापित करके फिर निश्चल मनसे स्मरण करता हुआ उस दिव्यस्वरूप परम पुरुष परमात्माको ही प्राप्त होता है ।। सम्बन्ध- पाँचवें श्लोकमें भगवानका चिन्तन करते-करते मरनेवाले साधारण मनुष्यकी गतिका संक्षेपर्ें वर्णन किया गया; फिर आठवेंसे दसवें श*लीकतक भगवान्‌के 'अधियज्ञ" नामक सगुण निराकार दिव्य अव्यक्त स्वरूपका चिन्तन करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिके सम्बन्धगें बतलाया;, अब ग्यारहवें शलोकसे तेरहवेंतक परम अक्षर निर्गुण नियाकार प्॑रह्मकी उपासना करनेवाले योगियोंकी अन्तकालीन गतिका वर्णन करनेके लिये पहले उस अक्षर ब्रह्मकी प्रशंसा करके उसे बतलाते हैं-- यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागा: । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पद संग्रहेण प्रवक्ष्ये

قال أرجونا: «تلك الحقيقة غير الفانية التي يصفها عارفو الفيدا؛ والتي يدخلها الزهّاد المتجرّدون من التعلّق؛ والتي رغبةً فيها يسلك الساعون انضباط البراهماچاريا—فحدّثني عنها بإيجاز.»

Verse 12

वेदके जाननेवाले विद्वान जिस सच्चिदानन्द्नरूप परमपदको अविनाशी कहते हैं,> आसक्तिरहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परमपदको चाहनेवाले ब्रह्मचारीलोग ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, उस परमपदको मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगाः ।। सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च | मूर्थन्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम्‌,सब इन्द्रियोंके द्वारोंको रोककर तथा मनको हृद्देशमें स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मनके द्वारा प्राणको मस्तकमें स्थापित करके, परमात्मासम्बन्धी योगधारणामें स्थित होकर जो पुरुष '35' इस एक अक्षररूप ब्रह्मको उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्मका चिन्तन करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गतिको प्राप्त होता हैः

بعد أن يكبح المرءُ جميعَ أبواب الحواس ويحبس العقلَ بثباتٍ في القلب، ثم يضع نَفَسَ الحياة على قمة الرأس بعقلٍ قد غُلِبَتْ نزواتُه، ويقيم في تركيزٍ يوغيٍّ موجَّهٍ إلى الذات العليا—(هكذا يتهيأ للرحيل الأخير بوعيٍ منضبط).

Verse 13

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्‌ मामनुस्मरन्‌ः | यः प्रयाति त्यजन्‌ देहं स याति परमां गतिम्‌,सब इन्द्रियोंके द्वारोंको रोककर तथा मनको हृद्देशमें स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मनके द्वारा प्राणको मस्तकमें स्थापित करके, परमात्मासम्बन्धी योगधारणामें स्थित होकर जो पुरुष '35' इस एक अक्षररूप ब्रह्मको उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्मका चिन्तन करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गतिको प्राप्त होता हैः

مَن كفَّ أبواب الحواسّ كلَّها، وأثبتَ الذهنَ في موضع القلب، ثمّ بالذهن الذي قُهِرَتْ نزعاتُه أقامَ البرانا عند قِمّة الرأس؛ وثبتَ في تركيز اليوغا المتعلّق بالباراماتمان؛ ثمّ إذا فارق الجسد ناطقًا بـ«أوم»—وهو البراهمن ذو المقطع الواحد—مستحضرًا إيّاي، البراهمن النيرغونا (المنزَّه عن الصفات)، فإنّه يبلغ الغاية العُليا.

Verse 14

अनन्यचेता:* सतत यो मां स्मरति नित्यश: । तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्थ योगिन:,हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तमको स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात्‌ उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ

يا أرجونا، من كان قلبُه غيرَ مُنقسم، يذكرني على الدوام بلا انقطاع—أنا البوروشوتّما—فإني لذلك اليوغيّ الملازم لاتحاده بي أكون سهلَ المنال؛ أي إنه ينالني بيسر.

Verse 15

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्रवतम्‌ । नाप्रुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता:

أولئك العظامُ الأرواح، وقد بلغوا الكمالَ الأسمى، إذا وصلوا إليّ لا يعودون إلى الولادة من جديد—إلى هذا العالم الزائل، مسكنِ المعاناة—بعد أن يبلغوني.

Verse 16

परम सिद्धिको प्राप्त महात्माजनर मुझको प्राप्त होकर दुःखोंके घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होते: ।। सम्बन्ध-- भगवत्प्राप्त मह्मत्मा पुरुषोंका पुनर्जन्म नहीं होता--इस कथनसे यह प्रकट होता है कि दूसरे जीवोंका पुनर्जन्म होता है। अतः यहाँ यह जाननेकी इच्छा होती है कि किस लोकतक पहुँचे हुए जीवोंको वापस लौटना पड़ता है। इसपर भगवान्‌ कहते हैं-- आब्रद्मभुवनाललोका: पुनरावर्तिनोअ<र्जुन मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते,हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यन्त* सब लोक पुनरावर्ती- हैं, परंतु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता; क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादिके लोक कालके द्वारा सीमित होनेसे अनित्य हैं

يا أرجونا، إنّ جميع العوالم إلى عالم براهما (براهمالوك) خاضعةٌ للرجوع (لإعادة الميلاد). أمّا يا ابنَ كونتي، فمن بلغني فلا ولادةَ له من جديد؛ لأنّي متعالٍ عن الزمان، بينما تلك العوالم—ومنها عالم براهما—محدودةٌ بالزمان، فهي غيرُ باقية.

Verse 17

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्‌ ब्रह्मणो विदु: । रात्रि युगसहस्रान्तां तेडहोरात्रविदो जना:

العارفون بحقيقة النهار والليل يعلمون أنّ «نهارًا» واحدًا لبراهما يمتدّ ألفَ يوجا؛ وأنّ «ليلَه» كذلك يدوم حتى يكتمل ألفُ يوجا.

Verse 18

ब्रह्माका जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाला और रात्रिको भी एक हजार चतुर्युगीतककी अवधिवाली जो पुरुष तत्त्वसे जानते हैं,* वे योगीजन कालके तत्त्वको जाननेवाले हैं १७ ।। अव्यक्ताद्‌ व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके

عند مجيء النهار تنبثق جميع الكائنات المتجلّية من «غير المتجلّي» (أفيَكْتا)، وعند مجيء الليل تذوب وتعود إلى ذلك المبدأ نفسه المسمّى «غير المتجلّي». واليوغيون الذين يعرفون على الحقيقة أنّ «يوماً واحداً لبرهما» يمتدّ ألفَ تشاتوريُغا، وأنّ «ليلةً واحدة» تمتدّ كذلك ألفَ تشاتوريُغا—أولئك هم العارفون بحقيقة الزمان.

Verse 19

१८ ।। भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्यागमेडवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे,हे पार्थ!! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृतिके वशमें हुआ रात्रिके प्रवेशकालमें लीन होता है और दिनके प्रवेशकालमें फिर उत्पन्न होता हैः

يا بارثا، إن هذا الجمع من الكائنات نفسه يظهر مرة بعد مرة، ثم يذوب مرة بعد مرة. عاجزاً تحت سلطان «بركريتي» (الطبيعة)، يندمج عند مجيء الليل ويولد من جديد عند مجيء النهار.

Verse 20

सम्बन्ध--ब्रह्माकी यात्रिके आरम्भमें जिस अव्यक्तमें समस्त थूत लीन होते हैं और दिनका आरम्भ होते ही जिससे उत्पन्न होते हैं; वही अव्यक्त सर्वश्रेष्ठ है या उससे बढ़कर कोई दूसरा और है? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- परस्तस्मात्तु भावो<न्योडव्यक्तोडव्यक्तातू सनातन: । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति,उस अव्यक्तसे भी अति परे दूसरा अर्थात्‌ विलक्षण जो सनातन अव्यक्तभाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता*

غير أنّ وراء ذلك «غير المتجلّي» يوجد آخر: «غير متجلٍّ» أبدي، مباين ومتسامٍ على غير المتجلّي الكونيّ المشروط. ذلك «البوروشا» الإلهيّ الأعلى لا يفنى، وإن فنيت جميع الكائنات.

Verse 21

जो अव्यक्त 'अक्षर'* इस नामसे कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्तभावको परम गतिः कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्तभावको प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है

ذلك «غير المتجلّي» الذي يُقال له «الأكشارا» (غير الفاني) يُعلَن أنه الغاية العليا. من بلغ تلك الحالة الأبدية غير المتجلّية لا يعود إلى الوجود الفاني مرة أخرى—فذلك هو مقامي الأسمى.

Verse 22

पुरुष: स पर: पार्थ भक्‍्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्त:स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌,हे पार्थ! जिस परमात्माके अन्तर्गत सर्वभूत हैं और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मासे यह सब जगत परिपूर्ण है,* वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्यभक्तिसे ही प्राप्त होनेयोग्य हैः

يا بارثا، ذلك «البوروشا» الأعلى—الذي في باطنه تقوم جميع الكائنات، والذي به امتلأ هذا الكون كله—لا يُنال إلا بعبادةٍ خالصةٍ لا شريك لها (أنانيا-بهاكتي).

Verse 23

सम्बन्ध-- आठवें और दसवें शलोकोंमें अधियज्ञकी उपासनाका फल परम दिव्य पुरुषकी प्राप्ति; तेरहवें *लोकमें परम अक्षर निर्गुण ब्रह्ममीे उपासनाका फल परमगतिकी प्राप्ति और चौदहवें शलोकमें सगुण-साकार भगवान्‌ श्रीकृष्णणी उपासनाका फल भगवान्‌की प्राप्ति बतलाया गया है। इससे तीनोंगें किसी प्रकारके भेदका भ्रम न हो जाय; इस उद्देश्यसे अब सबकी एकताका प्रतिपादन करते हुए उनकी प्राप्तिके बाद पुनर्जन्मका अभाव दिखलाते हैं-- अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम्‌ । य॑ं प्राप्प न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम,सम्बन्ध-- अर्जुनके सातवें प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान्‌ने अन्तकालमें किस प्रकार मनुष्य परमात्माको प्राप्त होता है; यह बात भलीभाँति समझायी। प्रसंगवश यह बात भी कही कि भगवत्प्राप्ति न होनेपर ब्रह्मलोकतक पहुँचकर भी जीव आवागमनके चक्‍्करसे नहीं छूटता: परंतु वहाँ यह बात नहीं कही गयी कि जो वापस न लौटनेवाले स्थानको प्राप्त होते हैं; वे किस रास्तेसे और कैसे जाते हैं तथा इसी प्रकार जो वापस लौटनेवाले स्थानोंकी प्राप्त होते हैं. वे किस रास्तेसे जाते हैं। अत: उन दोनों मार्गोका वर्णन करनेके लिये भगवान्‌ प्रस्तावना करते हैं-- यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्ति चैव योगिन: । प्रयाता यान्ति तं काल॑ वक्ष्यामि भरतर्षभ हे अर्जुन! जिस कालमें* शरीर त्यागकर गये हुए योगीजनः तो वापस न लौटनेवाली गतिको और जिस कालमें गये हुए वापस लौटनेवाली गतिको ही प्राप्त होते हैं, उस कालको अर्थात्‌ दोनों मार्गोंको कहूँगा

Verse 24

अग्निर्ज्योतिरह:३ ४ शुक्ल:+ षण्मासा उत्तरायणम्‌: | तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्म॒विदों जना:,जिस मार्गमें ज्योतिर्मय अग्नि अभिमानी देवता है, दिनका अभिमानी देवता है, शुक्लपक्षका अभिमानी देवता है और उत्तरायणके छ: महीनोंका अभिमानी देवता है, उस मार्गमें मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ताई योगीजन उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले जाये जाकर ब्रह्मकोः प्राप्त होते हैं

Arjuna said: Those who know Brahman and depart from life along the path presided over by fire, light, daytime, the bright fortnight, and the six months of the sun’s northern course—such persons, guided step by step by these divine powers, attain Brahman. The teaching highlights a disciplined, luminous course of departure associated with spiritual knowledge and ethical self-mastery, contrasting with darker paths driven by ignorance.

Verse 25

धूमो3 रात्रिस्तथारं कृष्ण:5 षण्मासा दक्षिणायनम्‌ईः | तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते,जिस मार्गमें धूमाभिमानी देवता है, रात्रि-अभिमानी देवता है तथा कृष्णपक्षका अभिमानी देवता है और दक्षिणायनके छ: महीनोंका अभिमानी देवता है, उस मार्गमें मरकर गया हुआ सकाम कर्म करनेवाला योगीः उपर्युक्त देवताओंद्वारा क्रमसे ले गया हुआ चन्द्रमाकी ज्योतिकोः प्राप्त होकर स्वर्गमें अपने शुभकर्मोका फल भोगकर वापस आता है?

Arjuna said: The path marked by smoke, by night, by the dark fortnight, and by the six months of the sun’s southern course—following that route, a yogin who acts with desire (seeking results) attains the lunar radiance; having enjoyed the fruits of meritorious deeds in the heavenly realm, he returns again (to mortal existence).

Verse 26

शुक्लकृष्णे गती होते जगत: शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्यया5<वर्तते पुन:,क्योंकि जगतके ये दो प्रकारके--शुक्ल और कृष्ण अर्थात्‌ देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गये हैं।* इनमें एकके द्वारा गया हुआ“--जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परम गतिको प्राप्त होता है और दूसरेके द्वारा गया हुआः फिर वापस आता है अर्थात्‌ जन्म-मृत्युको प्राप्त होता है

Arjuna said: “These two courses of departure for the world—called the bright and the dark—are held to be eternal. By the one, a person goes to the state from which there is no return; by the other, one returns again, entering once more into the cycle of birth and death.”

Verse 27

नैते सृती पार्थ जानन्‌ योगी मुह्ति कश्चन । तस्मात्‌ सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन,हे पार्थ! इस प्रकार इन दोनों मार्गोंको तत््वसे जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता।* इस कारण हे अर्जुन! तू सब कालमें समबुद्धिरूप योगसे युक्त हो£ अर्थात्‌ निरन्तर मेरी प्राप्तिके लिये साधन करनेवाला हो

O Pārtha, one who truly understands these two paths is not deluded as a yogin. Therefore, O Arjuna, at all times remain steadfastly united with yoga—maintaining evenness of mind and continuing the disciplined means that leads to the Highest.

Verse 28

वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव दानेषु यत्‌ पुण्यफलं प्रदिष्टम्‌ अत्येति तत्सरवमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्‌,योगी पुरुष इस रहस्यको तत्त्वसे जानकरु वेदोंके पढ़नेमें तथा यज्ञ, तप और दानादिके करनेमें जो पुण्पफल कहा है, उस सबको निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है: और सनातन परम पदको प्राप्त होता है

قال أرجونا: إنّ اليوغي الذي أدرك هذا السرّ إدراكًا حقًّا يتجاوز جميع الثواب الذي قيل إنّه ينشأ من تلاوة الفيدا، وإقامة القرابين، وممارسة التقشّف، وأعمال الصدقة؛ ويبلغ المقام الأوّل، الأعلى، الأبدي.

Verse 32

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाम्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्म॒योगो नामाष्टमो5ध्याय: ।। ८ ॥। भीष्मपर्वणि तु द्वात्रिंशोध्याय:

وهكذا، في «المهابهارتا» الشريفة، في «قسم بهيشما»، في الجزء المعروف بـ«البهاغافاد غيتا»، ضمن تعاليم الغيتا ذات الطابع الأوبانيشدي—في معرفة البرهمن وانضباط اليوغا—يُختَتم حوار شري كريشنا وأرجونا المسمّى «أكشارا-برهمَ يوغا»، وهو الفصل الثامن. وهنا يُشار إلى الفصل الثاني والثلاثين من قسم بهيشما.

Frequently Asked Questions

The chapter addresses how a practitioner can stabilize discernment and devotion amid uncertainty: by replacing diffuse abstraction with a structured contemplative map (vibhūti) that anchors attention and reduces confusion (asaṃmoha).

All differentiated excellences—ethical qualities, cognitive powers, natural grandeur, and social exemplars—can be read as partial expressions of a single sustaining principle; recognizing this supports steady-minded action guided by buddhi rather than fluctuation.

A direct phalaśruti formula is not stated; however, the closing meta-commentary functions similarly by asserting that the catalogue is only a sample, that all splendor derives from a fraction of the supreme radiance, and that the cosmos is upheld by a single portion—framing the teaching as a contemplative key to comprehensive integration.