विभूति-योगः (Vibhūti-yoga) — Exemplary Manifestations as a Contemplative Index
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन्ः | यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्,सब इन्द्रियोंके द्वारोंको रोककर तथा मनको हृद्देशमें स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मनके द्वारा प्राणको मस्तकमें स्थापित करके, परमात्मासम्बन्धी योगधारणामें स्थित होकर जो पुरुष '35' इस एक अक्षररूप ब्रह्मको उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्मका चिन्तन करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गतिको प्राप्त होता हैः
مَن كفَّ أبواب الحواسّ كلَّها، وأثبتَ الذهنَ في موضع القلب، ثمّ بالذهن الذي قُهِرَتْ نزعاتُه أقامَ البرانا عند قِمّة الرأس؛ وثبتَ في تركيز اليوغا المتعلّق بالباراماتمان؛ ثمّ إذا فارق الجسد ناطقًا بـ«أوم»—وهو البراهمن ذو المقطع الواحد—مستحضرًا إيّاي، البراهمن النيرغونا (المنزَّه عن الصفات)، فإنّه يبلغ الغاية العُليا.
अजुन उवाच