Adhyaya 3
Bhishma ParvaAdhyaya 387 Versesयुद्ध आरम्भ-पूर्व; संकेतों से स्पष्ट कि संग्राम आसन्न है और परिणाम अनिश्चित—दैव-प्रधान।

Adhyaya 3

उत्पातवर्णनम् (Utpāta-varṇanam) — Catalogue of Portents

Upa-parva: Utpāta-darśana (Portents before the war)

The chapter opens with Vyāsa enumerating pervasive anomalies: livestock and humans produce aberrant offspring; animals and birds utter inauspicious cries; unusual flora appear on trees; dust-laden winds and persistent atmospheric haze intensify. A sequence of astronomical disturbances follows—eclipses, hostile planetary placements, comet-like phenomena, and ominous configurations around nakṣatras—interpreted as signaling severe harm to the Kuru polity and to both armies. The text then expands to environmental and civic portents: blood- and flesh-like rains, rivers running counter-current with blood-tinged waters, meteoric falls with thunder, earthquakes, collapsing peaks, agitated oceans, and destructive winds. Ritual and sensory inversions are noted (fire burning with strange colors, reversed sensory qualities), alongside militarized omens (weapons appearing to blaze) and unsettling behavior among banners, drums, birds, horses, and elephants. Vyāsa concludes by urging Dhṛtarāṣṭra to decide appropriately so that society does not move toward total ruin. Vaiśaṃpāyana reports Dhṛtarāṣṭra’s reply: he reads the crisis as fated and asserts that kṣatriyas who fall in duty-bound conflict attain honor, fame, and a valorized posthumous state.

Chapter Arc: व्यास मुनि धृतराष्ट्र के सम्मुख युद्ध-पूर्व क्षितिज पर उभरते अपशकुनों का द्वार खोलते हैं—गायों में विकृत जन्म, पशुओं का अस्वाभाविक व्यवहार, और प्रकृति का उलटा चलन मानो धर्म-राज्य की देहरी पर अँधेरा लिख रहा हो। → अपशकुनों की शृंखला बढ़ती जाती है: विचित्र देह-रचना वाले पशु, असामान्य तिथियाँ और ग्रहण-सा आकाश, तथा अस्त्र-शस्त्रों से ज्वाला निकलने जैसे संकेत—सेनाएँ उपस्थित हैं, पर स्वयं समय (काल) मानो युद्ध का उद्घोष कर रहा है। व्यास यह भी बताते हैं कि विशाल सेना का संनिपात स्वयं में स्थिर नहीं—भगदड़ और अव्यवस्था को रोकना कठिन है, और संख्या से विजय निश्चित नहीं। → सबसे तीखा क्षण तब आता है जब संकेत प्रत्यक्ष युद्ध-निकटता में बदल जाते हैं—धनुषों से अग्नि-लपटें निकलती दिखती हैं, शस्त्र ‘संग्रामं समुपस्थितम्’ का संदेश देते हैं, और आकाश-गति (तिथि-क्षय/ग्रहण) तथा धरती के कंपकंपाते स्वर मिलकर बताते हैं कि यह भूमि सहस्रों राजाओं का रक्तपान करेगी। → व्यास का निष्कर्ष स्पष्ट है: विजय केवल बाहुबल या संख्या का फल नहीं; ‘दैव’ (काल-नियति) भी निर्णायक है। वे धृतराष्ट्र को संकेतों का अर्थ समझाते हैं—यह युद्ध टलने योग्य नहीं दिखता, और जो ‘जयवन्त’ होंगे वे भी कृतकृत्य होकर भारी मूल्य चुकाएँगे। → धृतराष्ट्र इन वचनों के बाद गहन ध्यान/चिंतन में डूबते हैं—पर प्रश्न हवा में लटका रहता है: क्या वह पुत्र-मोह से ऊपर उठकर विनाश रोक पाएँगे, या अपशकुनों की धारा अब अपरिवर्तनीय हो चुकी है?

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्रात बछ। अर तृतीयो<थध्याय: व्यासजीके द्वारा अमंगलसूचक उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणोंका वर्णन व्यास उवाच खरा गोषु प्रजायन्ते रमन्ते मातृभि: सुता: । अनार्तवं पुष्पफलं दर्शयन्ति वनद्रुमा:,व्यासजीने कहा--राजन! गायोंके गर्भसे गदहे पैदा होते हैं, पुत्र माताओंके साथ रमण करते हैं। वनके वृक्ष बिना ऋतुके फूल और फल प्रकट करते हैं

قال فياسا: «أيها الملك، إنّ الحمير تُولد من الأبقار، وإنّ الأبناء يواقعون أمهاتهم. وأشجار الغابة تُظهر الزهر والثمر في غير أوانه. تلك نُذُرٌ مشؤومة، تُنبئ بانهيار نظام الطبيعة وانفلات القيد الأخلاقي مع اقتراب الحرب العظمى.»

Verse 2

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वमें श्रीवेदव्यासदर्शनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ,गर्भिण्यो$जातपुत्राश्न जनयन्ति विभीषणान्‌ । क्रव्यादा: पक्षिभिश्नापि सहाश्नन्ति परस्परम्‌ गर्भवती स्त्रियाँ पुत्रको जन्म न देकर अपने गर्भसे भयंकर जीवोंको पैदा करती हैं। मांसभक्षी पशु भी पक्षियोंके साथ परस्पर मिलकर एक ही जगह आहार ग्रहण करते हैं

قال فايشَمبايَنا: «إنّ الحوامل، بدلًا من أن يلدن أبناءً، يخرجن من أرحامهن كائناتٍ مروّعة. وحتى السباع آكلة اللحم، مع الطير، تأكل في موضعٍ واحد، يلتهم بعضُها بعضًا.» إنها نُذُرٌ مشؤومة—علامات اضطرابٍ أخلاقي وانقلابٍ لسنن الطبيعة—تُنذر بعنف الحرب الكارثي وبانهيار الدارما.

Verse 3

त्रिविषाणाश्षतुर्नेत्रा: पज्चपादा द्विमेहना: । द्विशीर्षाश्न द्विपुच्छाश्च दंष्टिग: पशवोडशिवा:,इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि निमित्ताख्याने तृतीयो<5ध्याय:

قال فياسا: «ظهرت بهائم مشؤومة: منها ما له ثلاثة قرون وأربع عيون، ومنها ما له خمس قوائم وعضوان للتبوّل، ومنها ما له رأسان وذَنَبان، ومنها ما تسلّح بالأنياب.» وفي سياق الحكاية تُعرض هذه المخلوقات الشاذّة كنُذُرٍ سوداء تدلّ على اضطراب العالم، وتحذّر من أنّه إذا تشوّهت الطبيعة نفسها كان سلوك البشر أعرَضَ للانحراف عن الدارما.

Verse 4

जायन्ते विवृतास्याश्च व्याहरन्तो5शिवा गिर: । तीन सींग, चार नेत्र, पाँच पैर, दो मूत्रेन्द्रिय, दो मस्तक, दो पूँछ और अनेक दाँढ़ोंवाले अमंगलमय पशु जन्म लेते तथा मुँह फैलाकर अमंगलसूचक वाणी बोलते हैं ।। ३ इ ।। त्रिपदा: शिखिनस्ताक्ष्यश्चतुर्दष्टा विषाणिन:,गरुड़ पक्षीके मस्तकपर शिखा और सींग हैं। उनके तीन पैर तथा चार दाढ़ें दिखायी देती हैं। इसी प्रकार अन्य जीव भी देखे जाते हैं। वेदवादी ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ तुम्हारे नगरमें गरुड़ और मोर पैदा करती हैं

قال فياسا: «تُولد مخلوقاتٌ مشؤومة، أفواهُها فاغرة تنطق بأصواتٍ نذيرة. يظهر منها ما له ثلاثة قرون وأربع عيون وخمس قوائم وعضوان للتبوّل ورأسان وذَنَبان وأنياب كثيرة. وتُقرأ هذه الولادات وتلك الأصوات على أنها علامات شؤم، تدلّ على اضطراب الأخلاق في العالم وتُنذر بالبلاء الذي يعقب الأدهارما.»

Verse 5

तथैवान्याश्न दृश्यने स्त्रियो वै ब्रह्मवादिनाम्‌ । वैनतेयान्‌ मयूरांश्व जनयन्ति पुरे तव,गरुड़ पक्षीके मस्तकपर शिखा और सींग हैं। उनके तीन पैर तथा चार दाढ़ें दिखायी देती हैं। इसी प्रकार अन्य जीव भी देखे जाते हैं। वेदवादी ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ तुम्हारे नगरमें गरुड़ और मोर पैदा करती हैं

«وكذلك تُرى غرائب أخرى: يُقال إنّ زوجات البراهمة الحكماء، المكرّسات لخطاب الفيدا، يلدن في مدينتك كائناتٍ كالغارودا (فايناتِيا—أبناء فيناتا) والطواويس.» وتُبرز هذه العبارة جوّ العجب وانقلاب المألوف، كأنّ الطبيعة نفسها تُخرج النُذُر في سلطانك.

Verse 6

गोवत्सं वडवा सूते श्वा सृगालं महीपते । कुक्कुरान्‌ करभाश्नैव शुकाश्नाशुभवादिन:,भूपाल! घोड़ी गायके बछड़ेको जन्म देती है, कुतियाके पेटसे सियार पैदा होता है, हाथी कुत्तोंको जन्म देते हैं और तोते भी अशुभसूचक बोली बोलने लगे हैं

قال فياسا: «أيها الملك، لقد انقلب نظام الطبيعة: فالفرسُ تلدُ عجلاً، والكلبةُ تلدُ ابنَ آوى، وحتى الأتانُ تلدُ كلباً، وها هي الببغاواتُ أيضاً قد أخذت تنطق بكلامٍ مشؤومٍ نذيرِ سوء. إن هذه الطوالع تدل على اضطرابٍ عظيم في الدارما، وعلى نضج الأدهارما قبيل الحرب الكبرى، وتُنذر ببلاءٍ مقبل.»

Verse 7

स्त्रिय: काश्रित्प्रजायन्ते चतस्र: पजच कन्यका: । जातमात्राश्च नृत्यन्ति गायन्ति च हसन्ति च,कुछ स्त्रियाँ एक ही साथ चार-चार या पाँच-पाँच कन्याएँ पैदा करती हैं। वे कन्याएँ पैदा होते ही नाचती, गाती तथा हँसती हैं

يصف فياسا طوالع عجيبة ظهرت في العالم: فبعض النساء يلدن دفعةً واحدة أربع بنات أو خمساً، وتلك البنات ما إن يولدن حتى يرقصن ويغنين ويضحكن. ويجعل السرد هذه الأعاجيب نُذُراً مشؤومة لاضطرابٍ أخلاقيٍّ وكونيٍّ يحيط بالحرب القادمة: فإذا اهتزّت الدارما أظهرت الطبيعةُ نفسها غرائبَ الفوضى.

Verse 8

पृथग्जनस्य सर्वस्य क्षुद्रका: प्रहसन्ति च । नृत्यन्ति परिगायन्ति वेदयन्तो महद्‌ भयम्‌,समस्त नीच जातियोंके घरोंमें उत्पन्न हुए काने, कुबड़े आदि बालक भी महान्‌ भयकी सूचना देते हुए जोर-जोरसे हँसते, गाते और नाचते हैं

قال فياسا: «بين عامة الناس في كل مكان، حتى الأطفال المولودين من أصلٍ وضيع—كالأعور والأحدب—يضحكون بصوتٍ عالٍ ويغنون ويرقصون، كأنهم يعلنون خوفاً عظيماً ذا نذيرٍ مشؤوم. وكأن العالم نفسه يبعث إشارات تحذير بأن الصراع القادم سيجلب فزعاً واضطراباً واسعَين.»

Verse 9

प्रतिमाश्चवालिखन्त्येता: सशस्त्रा: कालचोदिता: । अन्योन्यमभिधावन्ति शिशवो दण्डपाणय:,ये सब कालसे प्रेरित हो हाथोंमें हथियार लिये मूर्तियाँ लिखते और बनाते हैं। छोटे-छोटे बच्चे हाथमें डंडा लिये एक-दूसरेपर धावा करते हैं

يصف فياسا نُذُراً مشؤومة يسوقها «كالَا»—الزمن نفسه: تُرى هيئاتٌ مسلّحة كأنها ترسم وتُشكّل صوراً، وحتى الأطفال الصغار، والعصيّ في أيديهم، يندفعون بعضهم على بعض كأنهم في قتال. ويشير هذا المشهد إلى اضطرابٍ أخلاقي في المجتمع—براءةٌ تنقلب إلى عنف—مُنذِراً بتصاعد الحرب القادمة الذي لا مفرّ منه.

Verse 10

अन्योन्यमभिमृद्नन्ति नगराणि युयुत्सव: । पद्मोत्पलानि वृक्षेषु जायन्ते कुमुदानि च,और कृत्रिम नगर बनाकर परस्पर युद्धकी इच्छा रखते हुए उन नगरोंको रौंदकर मिट्टीमें मिला देते हैं। पद्य, उत्पल और कुमुद आदि जलीय पुष्प वृक्षोंपर पैदा होते हैं

يصف فياسا عالماً مقلوباً: فالمتلهفون للقتال يقيمون «مدناً» مصطنعة، ثم يطؤون مدن بعضهم بعضاً ويسحقونها حتى تصير تراباً؛ وحتى الطبيعة تبدو معكوسة—فاللوتس، واللوتس الأزرق، و«كومودا» (زنبق الماء الأبيض) يُقال إنها تنبت على الأشجار. ويُجسّد هذا البيت اضطراب الدارما مع اقتراب الحرب العظمى، حين تبدو عدوانية البشر ونظام الكون معاً وقد اعتراهما التشوّه.

Verse 11

विष्वग्वाताश्न वान्त्युग्रा रजो नाप्युपशाम्यति । अभीक्षणं कम्पते भूमिरर्क राहुरुपैति च,चारों ओर भयंकर आँधी चल रही है, धूलका उड़ना शान्त नहीं हो रहा है, धरती बारंबार काँप रही है तथा राहु सूर्यके निकट जा रहा है

يروي فياسا نُذُرًا مشؤومة في عشيّة الصدام العظيم: رياحٌ عاتية تعصف من كلّ جهة ولا يهدأ غبارها؛ والأرض ترتجف مرارًا؛ وراهو (Rāhu) يدنو من الشمس كأنّه يريد أن يختطفها. وتُؤطِّر هذه العلامات الحربَ بوصفها أزمةً أخلاقيةً للعالم—فالطبيعة نفسها تعكس الاضطراب الذي ينفلت حين تنقلب سطوة الكشاتريا (kṣatriya) إلى تدميرٍ أخويّ، ويُشدّ الدارما (dharma) إلى أقصى حدوده.

Verse 12

श्वेतो ग्रहस्तथा चित्रां समतिक्रम्य तिष्ठति । अभावं हि विशेषेण कुरूणां तत्र पश्यति,केतु चित्राका अतिक्रमण करके स्वातीपर स्थित हो रहा है; उसकी विशेषरूपसे कुरुवंशके विनाशपर ही दृष्टि है

قال فياسا: «إنّ الكوكب اللامع (Śveta) قد تجاوز تشيترا (Citrā) وهو الآن قائمٌ عند سواتي (Svātī). وفي هذه العلامة يبدو كأنّه يحدّق، على وجه الخصوص، في الخراب القادم على آل كورو (Kuru).»

Verse 13

धूमकेतुर्महाघोर: पुष्यं चाक्रम्य तिष्ठति । सेनयोरशिवं घोर करिष्यति महाग्रह:,अत्यन्त भयंकर धूमकेतु पुष्य नक्षत्रपर आक्रमण करके वहीं स्थित हो रहा है। यह महान्‌ उपग्रह दोनों सेनाओंका घोर अमंगल करेगा

قال فياسا: «إنّ مذنّبًا بالغ الهول (Dhūmaketu) قد تقدّم إلى كوكبة بوشيا (Puṣya) واستقرّ هناك. وهذا الطالع السماوي الجليل سيجلب شؤمًا فادحًا على الجيشين كليهما.»

Verse 14

मघास्वड्रारको वक्र: श्रवणे च बृहस्पति: । भगं नक्षत्रमाक्रम्य सूर्यपुत्रेण पीड्यते,मंगल वक्र होकर मघा नक्षत्रपर स्थित है, बृहस्पति श्रवण नक्षत्रपर विराजमान है तथा सूर्यपुत्र शनि पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्रपर पहुँचकर उसे पीड़ा दे रहा है

قال فياسا: «إنّ المريخ في رجوعه (retrograde) عند مَغها (Maghā)، والمشتري قائمٌ في شرافَنا (Śravaṇa). أمّا زُحل، ابنُ الشمس، فقد تقدّم إلى نجم بهاگا (Bhaga—Pūrvaphālgunī) وهو يُصيبه بالأذى.» وتُعرض هذه الأوضاع الكوكبية المشؤومة بوصفها نُذُرًا، تُشير إلى اضطرابٍ في النظام الكوني يوازي الاضطراب الأخلاقي والاجتماعي الذي يدفع الحرب.

Verse 15

शुक्र: प्रोष्ठपदे पूर्वे समारुह्मु विरोचते । उत्तरे तु परिक्रम्य सहित: समुदीक्षते,शुक्र पूर्वा भाद्रपदापर आरूढ़ हो प्रकाशित हो रहा है और सब ओर घूम-फिरकर परिघ नामक उपग्रहके साथ उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्रपर दृष्टि लगाये हुए है

يصف فياسا علامةً سماويةً مشؤومة: إنّ الزهرة (Venus)، بعد أن طلعت في نجم بُورفا بروشثابادا (Pūrvā Proṣṭhapadā)، تتلألأ بوضوحٍ لافت. ثمّ، وهي تسير في مسارٍ دائريّ، تُرى مقترنةً بجِرمٍ شبيهٍ بالمذنّب يُدعى باري-غا (Pari-gha)، مُثبِّتةً نظرها نحو أوتّارا بروشثابادا (Uttarā Proṣṭhapadā)—وهو، في سياق الحرب في الملحمة، دليلٌ على اضطرابٍ وشيك وعواقب جسيمة.

Verse 16

श्वेतो ग्रह: प्रजज्लित: सधूम इव पावक: । ऐन्द्रं तेजस्वि नक्षत्र ज्येष्ठामाक्रम्य तिषतति,केतु नामक उपग्रह धूमयुक्त अग्निके समान प्रज्वलित हो इन्द्रदेवतासम्बन्धी तेजस्वी ज्येष्ठा नक्षत्रपर जाकर स्थित है

قال فياسا: «إنَّ جِرماً سماوياً أبيضَ يتَّقد، كالنارِ المُلتفّةِ بالدخان. ذلك الشيءُ المتلألئ، المرتبطُ بإندرا، قد تقدَّم إلى منزلةِ (نَكشَترا) جْييشْثا Jyeṣṭhā واستقرَّ هناك». وفي جوِّ «بارفا بيشما» المثقلِ بنُذُرِ الحرب، تُشيرُ هذه الآيةُ إلى اضطرابٍ في نظامِ الكون، إذ إنَّ الأدهرما (اللااستقامة) والعنفَ الوشيكَ يُلقيان بظلِّهما حتى على السماء.

Verse 17

ध्रुवं प्रजजलितो घोरमपसपव्यं प्रवर्तते । रोहिणीं पीडयत्येवमुभी च शशिभास्करौ । चित्रास्वात्यन्तरे चैव विछित: परुषग्रह:,चित्रा और स्वातीके बीचमें स्थित हुआ क्रूर ग्रह राहु सदा वक्री होकर रोहिणी तथा चन्द्रमा और सूर्यको पीड़ा पहुँचाता है तथा अत्यन्त प्रज्वलित होकर ध्रुवकी बायीं ओर जा रहा है, जो घोर अनिष्टका सूचक है

قال فياسا: «إنَّ نذيراً مروِّعاً متَّقداً بعنفٍ قد بدأ يتحقّق لا محالة: فذلك الأثرُ الناريّ يمضي إلى يسارِ دْهروفا (Dhruva)، وهو علامةُ شؤمٍ عظيم. وكذلك رَاهو Rāhu، ذلك الكوكبُ القاسي القائمُ بين تشِترا Citrā وسْفاتي Svātī، السائرُ أبداً في مسارٍ معوَّج، يُعذِّب روهِني Rohiṇī ويُصيب القمرَ والشمسَ معاً بالأذى.»

Verse 18

वक्रानुवक्रं कृत्वा च श्रवण पावकप्रभ: । ब्रह्मराशिं समावृत्य लोहिताजड़ी व्यवस्थित:,अग्निके समान कान्तिमान्‌ मंगल ग्रह (जिसकी स्थिति मघा नक्षत्रमें बतायी गयी है) बारंबार वक्र होकर ब्रह्मराशि (बृहस्पतिसे युक्त नक्षत्र) श्रवणको पूर्णरूपसे आवृत करके स्थित है

قال فياسا: «إنَّ مَنْغَلا Maṅgala (المريخ)، المتلألئ كالنار، يسير في انحناءٍ بعد انحناء. وقد غطّى منزلةَ شْرَفَنَة Śravaṇa تغطيةً تامّة داخل ‘بْرَهْما-راشي’، ثم استقرّ هناك، أحمرَ كالدّم.»

Verse 19

सर्वसस्यपरिच्छन्ना पृथिवी सस्यमालिनी । पज्चशीर्षा यवाशक्षापि शतशीर्षाश्ष शालय:,(इसका प्रभाव खेतीपर अनुकूल पड़ा है) पृथ्वी सब प्रकारके अनाजके पौधोंसे आच्छादित है, शस्यकी मालाओंसे अलंकृत है, जौमें पाँच-पाँच और जड़हन धानमें सौ-सौ बालियाँ लग रही हैं

قال فياسا: كانت الأرضُ مكسوّةً كلَّها بالمحاصيل، كأنها مُزدانةٌ بأكاليلَ من الحبوب. فالشعيرُ يحمل خمسَ سنابلَ في الساق الواحدة، ونباتُ الأرزّ يحمل مئةَ سنبلة—صورةٌ لخصبٍ خارق، توحي بموسمٍ صارت فيه الطبيعةُ نفسها مُواتيةً للزراعة وقوتِ البشر.

Verse 20

प्रधाना: सर्वलोकस्य यास्वायत्तमिदं जगत्‌ | ता गाव: प्रस्नुता वत्सै: शोणितं प्रक्षरन्त्युत,जो सम्पूर्ण जगत्‌में माताके समान प्रधान मानी जाती हैं, यह समस्त संसार जिनके अधीन है, वे गौएँ बछड़ोंसे पिन्हा जानेके बाद अपने थनोंसे खून बहाती हैं

تلك الأبقار—المعدودةُ أسمى ما في العوالم كلّها، والتي يُقال إنَّ هذا الكونَ بأسره قائمٌ عليها—إذا ضغطتها عجولُها واستدرّت لبنَها، شوهد الدمُ يسيل من حلماتها. إنما يُبرز هذا القول انقلاباً خطيراً في نظام الطبيعة والأخلاق: فحتى الكائناتُ المُبجَّلة بوصفها أمهاتٍ كونيّات تُدفَع إلى الألم، علامةً على انتشار الأدهرما (اللااستقامة) وعلى الأجواء المشؤومة المحيطة بالحرب.

Verse 21

निश्चेरुरचिषश्चापात्‌ खड्गाश्न॒ ज्वलिता भृशम्‌ | व्यक्त पश्यन्ति शस्त्राणि संग्रामं समुपस्थितम्‌,योद्धाओंके धनुषसे आगकी लपटें निकलने लगी हैं, खड्ग अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे हैं मानो सम्पूर्ण शस्त्र स्पष्टरूपसे यह देख रहे हैं कि संग्राम उपस्थित हो गया है

اندفعت ألسنةُ النار من أقواسِ المقاتلين، وتوهّجت السيوفُ توهّجًا شديدًا. كأنّ الأسلحةَ كلَّها ترى بوضوحٍ أنّ ساحةَ القتال قد حضرت.

Verse 22

अग्निवर्णा यथा भास: शस्त्राणामुदकस्य च । कवचानां ध्वजानां च भविष्यति महाक्षय:,शस्त्रोंकी, जलकी, कवचोंकी और ध्वजाओंकी कान्तियाँ अग्निके समान लाल हो गयी हैं; अतः निश्चय ही महान्‌ जनसंहार होगा

قال فياسا: «إن لمعانَ الأسلحةِ والماءِ والدروعِ والراياتِ قد صار أحمرَ كالنار، كأنه مشتعل. وهذه علامةٌ: لا ريب أنّ هلاكًا عظيمًا للرجال على وشك الوقوع».

Verse 23

पृथिवी शोणितावर्ता ध्वजोडुपसमाकुला । कुरूणां वैशसे राजन्‌ पाण्डवैः सह भारत,राजन्‌! भरतनन्दन! जब पाण्डवोंके साथ कौरवोंका हिंसात्मक संग्राम आरम्भ हो जायगा, उस समय धरतीपर रक्तकी नदियाँ बह चलेंगी, उनमें शोणितमयी भँवरें उठेंगी तथा रथकी ध्वजाएँ उन नदियोंके ऊपर छोटी-छोटी डोंगियोंके समान सब ओर व्याप्त दिखायी देंगी

قال فياسا: «يا أيها الملك، يا من نسلُ بهاراتا—حين يندفع الكورو إلى المذبحة مع الباندافا، تصير الأرضُ سيلًا من الدم، تعصف به دوّاماتٌ قانية؛ وتبدو راياتُ العربات متناثرةً فوق تلك المجاري كقوارب صغيرة.»

Verse 24

दिक्षु प्रज्वलितास्याश्व व्याहरन्ति मृगद्धिजा: । अत्याहितं दर्शयन्तो वेदयन्ति महद्‌ भयम्‌,चारों दिशाओंमें पशु और पक्षी प्राणान्तकारी अनर्थका दर्शन कराते हुए भयंकर बोली बोल रहे हैं। उनके मुख प्रज्वलित दिखायी देते हैं और वे अपने शब्दोंसे किसी महान्‌ भयकी सूचना दे रहे हैं

قال فياسا: «في كل جهةٍ تصرخ الوحوشُ والطيورُ بأفواهٍ كأنها ملتهبة. وهي تُظهر نُذُرَ كارثةٍ قاتلة، فتُعلن أصواتُها اقترابَ رعبٍ عظيم.»

Verse 25

एकपफक्षाक्षिचरण: शकुनि: खचरो निशि । रौद्रं वदति संरब्ध: शोणितं छर्दयन्निव,रातमें एक आँख, एक पाँख और एक पैरका पक्षी आकाशमें विचरता है और कुपित होकर भयंकर बोली बोलता है। उसकी बोली ऐसी जान पड़ती है, मानो कोई रक्त वमन कर रहा हो

قال فياسا: «في الليل كان طائرُ شؤمٍ يجوب السماء، له جناحٌ واحدٌ وعينٌ واحدةٌ ورِجلٌ واحدة. وقد استبدّ به الغضب فأطلق صرخةً مروّعة—كأن صوتَه يتقيّأ دمًا—منذرةً بمذبحةٍ عنيفةٍ جائرة، وبالرعب الذي يصحب الحرب المقبلة.»

Verse 26

शस्त्राणि चैव राजेन्द्र प्रज्वलन्तीव सम्प्रति । सप्तर्षीणामुदाराणां समवच्छाद्यते प्रभा,राजेन्द्र! सभी शस्त्र इस समय जलते-से प्रतीत होते हैं। उदार सप्तर्षियोंकी प्रभा फीकी पड़ती जाती है

قال فياسا: «أيها الملك، إنّ الأسلحةَ الآن تبدو كأنها تتّقد لهيبًا. وإنّ بهاءَ الحكماء السبعة النبلاء يُحجَب ويأخذ في الخفوت».

Verse 27

संवत्सरस्थायिनौ च ग्रहौ प्रज्वलितावुभौ । विशाखाया: समीपस्थौ बृहस्पतिशनैश्लरी,वर्षपर्यन्त एक राशिपर रहनेवाले दो प्रकाशमान ग्रह बृहस्पति और शनैश्वर तिर्यग्वेधके द्वारा विशाखा नक्षत्रके समीप आ गये हैं

قال فياسا: «كوكبان متّقدان—المشتري (بْرِهَسْپَتِي) وزحل (شَنَيْشْچَرَ)—وقد لبثا معًا في برجٍ واحد سنةً كاملة، قد بلغا موضعًا قريبًا من المنزلة القمرية فيشاخا (Viśākhā)».

Verse 28

चन्द्रादित्यावुभौ ग्रस्तावेकाद्नवा हि त्रयोदशीम्‌ । अपर्वणि ग्रहं यातौ प्रजासंक्षयमिच्छत:,(इस पक्षमें तो तिथियोंका क्षय होनेके कारण) एक ही दिन त्रयोदशी तिथिको बिना पर्वके ही राहुने चन्द्रमा और सूर्य दोनोंको ग्रस लिया है। अतः ग्रहणावस्थाको प्राप्त हुए वे दोनों ग्रह प्रजाका संहार चाहते हैं

قال فياسا: «في اليوم القمري الثالث عشر، وقد اضطرب نظام التقويم حتى كأنّ التِّثي قد انطوت في يومٍ واحد، ابتلع راهو القمرَ والشمسَ معًا من غير موضعِ عيدٍ ولا مفصلٍ شعائريٍّ لائق. وهذان النيّران، وقد وقعا في الكسوف، يبدوان كأنهما يتمنّيان هلاكَ الرعيّة».

Verse 29

अशोभिता दिश: सर्वा: पांसुवर्ष: समन्ततः । उत्पातमेघा रौद्राश्न रात्रौ वर्षन्ति शोणितम्‌,चारों ओर धूलकी वर्षा होनेसे सम्पूर्ण दिशाएँ शोभाहीन हो गयी हैं। उत्पातसूचक भयंकर मेघ रातमें रक्तकी वर्षा करते हैं

قال فياسا: «لقد بهتت الجهات كلّها، إذ أخذ الغبار يهطل مطرًا من كل ناحية. وسُحُبٌ مشؤومةٌ مروّعة، نُذُرُ بلاء، تُهطِل دمًا في الليل».

Verse 30

कृत्तिकां पीडयंस्ती&णैर्नक्षत्रं पृथिवीपते । अभीक्षणवाता वायन्ते धूमकेतुमवस्थिता:,राजन! अपने तीक्ष्ण (क्रूरतापूर्ण) कर्मोंके द्वारा उपलक्षित होनेवाला राहु (चित्रा और स्वातीके बीचमें रहकर सर्वतोभद्रचक्रगतवेधके अनुसार) कृत्तिका नक्षत्रको पीड़ा दे रहा है। बारंबार धूमकेतुका आश्रय लेकर प्रचण्ड आँधी उठती रहती है

قال فياسا: «يا سيّدَ الأرض، إنّ راهو—الموسومَ بأفعاله الحادّة القاسية—يُؤذي الآن المنزلة القمرية كِرِتّيكَا (Kṛttikā). ومرّةً بعد مرّة، متّخذًا من نذيرِ المذنّب مأوى، تهبّ رياحٌ عاتيةٌ وتَعصِف.»

Verse 31

विषमं जनयन्त्येत आक्रन्दजननं महत्‌ । त्रिषु सर्वेषु नक्षत्रनक्षत्रेषु विशाम्पते । गृथ्र: सम्पतते शीर्ष जनयन्‌ भयमुन्तमम्‌,वह महान्‌ युद्ध एवं विषम परिस्थिति पैदा करनेवाली है। राजन्‌! (अश्विनी आदि नक्षत्रोंकी तीन भागोंमें बाँटनेपर जो नौ-नौ नक्षत्रोंक तीन समुदाय होते हैं, वे क्रमशः अश्वपति, गजपति तथा नरपतिके छत्र कहलाते हैं; ये ही पापग्रहसे आक्रान्त होनेपर क्षत्रियोंका विनाश सूचित करनेके कारण “नक्षत्र-नक्षत्र” कहे गये हैं) इन तीनों अथवा सम्पूर्ण नक्षत्र-नक्षत्रोंमें शीर्षस्थानपर यदि पापग्रहसे वेध हो तो वह ग्रह महान्‌ भय उत्पन्न करनेवाला होता है; इस समय ऐसा ही कुयोग आया है

إن هذه الطوالع تُولِّد اختلالًا رهيبًا وتُثير صراخًا عظيمًا. يا سيّدَ الناس، في الأقسام الثلاثة كلّها لما يُسمّى «مجاميع النكشترَات»، يهوي نسرٌ على الموضع الأرفع، فيبعث أشدَّ الفزع. وقد قام الآن اقترانٌ خبيثٌ كهذا—نذيرُ كارثةٍ ومذبحةٍ في الحرب، حين يُحجَب الدَّرما باضطرابٍ عنيف.

Verse 32

चतुर्दशी पञ्चदशीं भूतपूर्वां च षोडशीम्‌ । इमां तु नाभिजाने5हममावास्यां त्रयोदशीम्‌ । चन्द्रसूर्यावु भौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीम्‌,एक तिथिका क्षय होनेपर चौदहवें दिन, तिथिक्षय न होनेपर पंद्रहवें दिन और एक तिथिकी वृद्धि होनेपर सोलहवें दिन अमावास्याका होना तो पहले देखा गया है; परंतु इस पक्षमें जो तेरहवें दिन यह अमावास्या आ गयी है, ऐसा पहले भी कभी हुआ है, इसका स्मरण मुझे नहीं है। इस एक ही महीनेमें तेरह दिनोंके भीतर चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण दोनों लग गये

قال فياسا: «لقد رأيتُ في الأزمنة السالفة يومَ المحاق (amāvāsyā) يقع في اليوم القمري الرابع عشر، والخامس عشر، بل وحتى السادس عشر—إذا فُقِدَ تِثي (tithi) أو إذا امتدّ. أمّا أن يقع المحاق في اليوم الثالث عشر فلا أذكر أنّي شهدتُه قط. وفي هذا الشهر الواحد، خلال ثلاثة عشر يومًا، قد أُمسِكَ القمرُ والشمسُ معًا (خسوفٌ وكسوف).» وتُصوِّر هذه العبارة تلك الكسوفات والخسوفات بوصفها اضطراباتٍ مشؤومة في نظام الكون، تُنذر بالزلزال الأخلاقي والاجتماعي الذي ينتهي إلى الحرب.

Verse 33

अपर्वणि ग्रहेणैतौ प्रजा: संक्षपयिष्यत: । मांसवर्ष पुनस्तीव्रमासीत्‌ कृष्णचतुर्दशीम्‌ । शोणितैर्वक्त्रसम्पूर्णा अतृप्तास्तत्र राक्षसा:,इस प्रकार अप्रसिद्ध पर्वमें ग्रहण लगनेके कारण ये सूर्य और चन्द्रमा प्रजाका विनाश करनेवाले होंगे। कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको बड़े जोरसे मांसकी वर्षा हुई थी। उस समय राक्षसोंका मुँह रक्तसे भरा हुआ था। वे खून पीते अघाते नहीं थे

قال فياسا: «لأن الكسوف والخسوف يقعان في وقتٍ غير مألوفٍ ومشؤوم، فإن الشمس والقمر سيغدوان عاملين في هلاك الرعية. ثم إنّه في اليوم الرابع عشر من النصف المظلم من الشهر هطلت مطرٌ شديدٌ من اللحم. وكان الرّاكشاسا (rākṣasa) هناك أفواهُهم مملوءةً بالدم؛ يشربونه ولا يشبعون.»

Verse 34

प्रतिस्रोतो महानद्य: सरित: शोणितोदका: । फेनायमाना: कूपाश्च कूर्दन्ति वृषभा इव,बड़ी-बड़ी नदियोंके जल रक्तके समान लाल हो गये हैं और उनकी धारा उलटे स्रोतकी ओर बहने लगी है। कुँओंसे फेन ऊपरको उठ रहे हैं, मानो वृषभ उछल रहे हों

قال فياسا: إن الأنهار العظيمة والجداول تجري الآن عكس مجراها الطبيعي، وقد احمرّت مياهها كأنها دم. والآبار تفور زبدًا وتندفع إلى أعلى، كأن الثيران تقفز—طوالعُ شؤمٍ تدلّ على اضطراب النظام الأخلاقي، وأن الحرب المقبلة ستُغمر بالعنف.

Verse 35

पतन्त्युल्का सनिर्घाता: शक्राशनिसमप्रभा: । अद्य चैव निशां व्युष्टामनयं समवाप्स्यथ,बिजलीकी कड़कड़के साथ इन्द्रकी अशनिके समान प्रकाशित होनेवाली उल्काएँ गिर रही हैं। आजकी रात बीतनेपर सबेरेसे ही तुमलोगोंको अपने अन्यायका फल मिलने लगेगा

قال فياسا: «إن شُهُبًا ناريةً تهوي مع قصف الرعد، متلألئةً كصاعقة إندرا (Indra)، تتساقط. وحين تنقضي هذه الليلة نفسها ويطلع الفجر، ستبدؤون بتلقّي عاقبة ظلمكم.»

Verse 36

विनि:सृत्य महोल्काभिस्तिमिरं सर्वतोदिशम्‌ । अन्योन्यमुपतिष्ठद्धिस्तत्र चोक्त महर्षिभि:,सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार व्याप्त होनेके कारण बड़ी-बड़ी मशालें जलाकर घरसे निकले हुए महर्षियोंने एक-दूसरेके पास उपस्थित हो इन उत्पातोंके सम्बन्धमें अपना मत इस प्रकार प्रकट किया है

لما انتشر الظلام في كل الجهات، خرج الحكماء العظام من مساكنهم يحملون مشاعل متقدة. ثم تقاربوا واجتمعوا، وأبدوا رأيهم المتروّي في تلك الطوالع المشؤومة، قارئين فيها علاماتٍ على اضطراب نظام الدارما واقتراب عواقب جسيمة.

Verse 37

भूमिपालसहस्राणां भूमि: पास्यति शोणितम्‌ | कैलासमन्दराभ्यां तु तथा हिमवता विभो

قال فياسا: «ستشرب الأرض دماء آلاف الملوك. يا ذا البأس، وكذلك سيكون الأمر في كايلاسا وماندارا، وفي هيمَفَت أيضًا».

Verse 38

महाभूता भूमिकम्पे चत्वार: सागरा: पृथक्‌ । वेलामुद्वर्तयन्तीव क्षोभयन्तो वसुंधराम्‌,भूकम्प होनेके कारण पृथक्‌-पृथक्‌ चारों सतर वृद्धिको प्राप्त होकर वसुधामें क्षोभ उत्पन्न करते हुए अपनी सीमाको लाँघते हुए-से जान पड़ते हैं

يصف فياسا اضطرابًا مشؤومًا: حين ترتجّ الأرض، تبدو البحار الأربعة—كلٌّ في جهته—كأنها تهيج وتفيض متجاوزة شواطئها المقرّرة، فتقلب وجه المعمورة. إن هذه الصورة تشير إلى انهيار الحدود الطبيعية: اضطراب أخلاقيّ وكونيّ يعكس عنف الحرب الآتية.

Verse 39

वृक्षानुन्मथ्य वान्त्युग्रा वाता: शर्करकर्षिण: । आभग्ना: सुमहावातैरशनीभि: समाहता:

يصف فياسا نُذُرًا مشؤومة: رياحٌ عاتية تقتلع الأشجار وتجرّ الحصى والتراب الخشن. هبّاتٌ عظيمة تكسر الأشياء وتفتتها كأن صواعق أصابتها—علاماتٌ على عالمٍ مضطرب عشية الحرب واندفاع الأدهارما.

Verse 40

नीललोहितपीतश्च भवत्यग्निहुतो द्विजै:,ब्राह्मणलोगोंके आहुति देनेपर प्रज्वलित हुई अग्नि काले, लाल और पीले रंगकी दिखायी देती है। उसकी लपटें वामावर्त होकर उठ रही हैं। उससे दुर्गन्ध निकलती है और वह भयानक शब्द प्रकट करती रहती है। राजन! स्पर्श, गन्ध तथा रस--इन सबकी स्थिति विपरीत हो गयी है

قال فياسا: «حين يقدّم الدِّوِجَة (المولودون مرتين) القرابين، فإن نار القربان—وإن كانت موقدة—تبدو بألوانٍ مشؤومة: داكنة، وحمراء، وصفراء. وتعلو ألسنتها في دوّامةٍ إلى اليسار؛ وتنبعث منها رائحة كريهة، ولا تزال تُصدر أصواتًا مفزعة. يا أيها الملك، إن نظام الحواس نفسه—اللمس والشمّ والذوق—قد انقلب إلى ضدّه.»

Verse 41

वामार्चिर्दष्टगन्धश्न॒ मुज्चन्‌ वै दारुणं स्वनम्‌ । स्पर्शा गन्धा रसाश्चैव विपरीता महीपते,ब्राह्मणलोगोंके आहुति देनेपर प्रज्वलित हुई अग्नि काले, लाल और पीले रंगकी दिखायी देती है। उसकी लपटें वामावर्त होकर उठ रही हैं। उससे दुर्गन्ध निकलती है और वह भयानक शब्द प्रकट करती रहती है। राजन! स्पर्श, गन्ध तथा रस--इन सबकी स्थिति विपरीत हो गयी है

قال فياسا: «أيها الملك، إن نار القربان—وإن أُضرِمت بقرابين البراهمة—تُظهر أمارات شؤم: لهبها يلتف صاعدًا نحو اليسار، وتنفث نتنًا، وتُطلق صوتًا مروّعًا. بل إن اللمس والشمّ والذوق قد انقلبت أحوالها إلى خلاف المألوف. إن هذا الانقلاب في نظام الحواس يدلّ على اضطراب الدharma، وينذر بكارثة في الحرب المقبلة.»

Verse 42

धूमं ध्वजा: प्रमुडचन्ति कम्पमाना मुहुर्मुहु: । मुज्चन्त्यज्रारवर्ष च भेर्यश्व॒ पटहास्तथा,ध्वज बारंबार कम्पित होकर धूआँ छोड़ते हैं। ढोल, नगाड़े अंगारोंकी वर्षा करते हैं

يروي فياسا نُذُر ساحة القتال: فالرايات ترتجف مرارًا كأنها تنفث دخانًا، وطبول الحرب—من الكِتْل درَم وغيرها من آلات الإيقاع—تدوي كأنها تمطر شررًا. ويزيد هذا المشهد من ثقل المذبحة المقبلة أخلاقيًا، حتى ليبدو أن رموز الحرب الجامدة تشارك في الإنذار بدمار تقوده الأدهرما.

Verse 43

शिखराणां समृद्धानामुपरिष्टात्‌ समन्तत: । वायसाश्व रुवन्त्युग्रं वामं मण्डलमाश्रिता:,फल-फूलसे सम्पन्न वृक्षोंकी शिखाओंपर बायीं ओरसे घूम-घूमकर सब ओर कौए बैठते हैं और भयंकर काँव-काँवका कोलाहल करते हैं

قال فياسا: «على قمم الأشجار العالية المزدهرة، المفعمة بالثمر والزهور، من كل جانب، اجتمعت الغربان، وهي تدور في مسارٍ إلى اليسار، وتنعق نعيقًا خشنًا في جلبةٍ مروّعة.» وفي سياق الحرب يُعدّ ذلك نذير شؤم—كأن الطبيعة نفسها تُحذّر من دمارٍ وشيك ومن الثقل الأخلاقي لهذا الصراع.

Verse 44

पकक्‍्वापक्वेति सुभृशं वावाश्यन्ते वयांसि च । निलीयमन्ते ध्वजाग्रेषु क्षयाय पृथिवीक्षिताम्‌,बहुत-से पक्षी “पक्वा-पक्वा” इस शब्दका बारंबार जोर-जोरसे उच्चारण करते और ध्वजाओंके अग्रभागमें छिपते हैं। यह लक्षण राजाओंके विनाशका सूचक है

كانت الطيور تصرخ بصوت عالٍ مرارًا: «ناضج—غير ناضج»، ثم تختبئ عند رؤوس الرايات؛ وهو نذير شؤم يتنبأ بهلاك الملوك الذين يحكمون الأرض. وفي الإطار الأخلاقي للملحمة، تشير هذه العلامات إلى أن الصراع الذي تحرّكه الأدهرما قد «نضج» نحو خرابٍ لا مفرّ منه.

Verse 45

ध्यायन्त: प्रकिरन्तश्न व्याला वेपथुसंयुता: । दीनास्तुरड्रमा: सर्वे वारणा: सलिलाश्रया:,दुष्ट हाथी काँपते और चिन्ता करते हुए भयके मारे मल-मूत्र त्याग कर रहे हैं, घोड़े अत्यन्त दीन हो रहे हैं और सम्पूर्ण गजराज पसीने-पसीने हो रहे हैं

قال فياسا: «البهائم، وقد استولى عليها خوفٌ مرتجف، تقف واجمةً كأنها تُفكّر، ثم في الفزع تُفرغ أوساخها. والخيول قد غمرها الانكسار، أما الفيلة العظام—المتعلّقة بالماء طلبًا للراحة—فهي مبللة بالعرق.» إن المشهد يدل على جوٍّ أخلاقيٍ مشؤوم: حين تتجمع الأدهرما للحرب، تعكس الحيوانات نفسها الرهبة والاضطراب اللذين يسبقان الكارثة.

Verse 46

एतच्छुत्वा भवानत्र प्राप्तकालं व्यवस्यताम्‌ । यथा लोक: समुच्छेदं नायं गच्छेत भारत,भारत! यह सुनकर (और उसके परिणामपर विचार करके) तुम इस अवसरके अनुरूप ऐसा कोई उपाय करो, जिससे यह संसार विनाशसे बच जाय

فإذا سمعتَ هذا، فاعزمْ هنا والآن على ما يلائم هذه الشدّة الحاضرة من سبيل العمل، لكيلا يمضي هذا العالم—يا بهاراتا—إلى الهلاك التام.

Verse 47

वैशम्पायन उवाच पितुर्वचो निशम्यैतद्‌ धृतराष्ट्रोडब्रवीदिदम्‌ । दिष्टमेतत्‌ पुरा मन्ये भविष्यति नरक्षय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अपने पिता व्यासजीका यह वचन सुनकर धृतराष्ट्रने कहा--“भगवन्‌! मैं तो इसे पूर्वनिश्चित दैवका विधान मानता हूँ; अतः यह जनसंहार होगा ही

قال فَيْشَمْبايَنَة: يا جَنَمِيجَيَا! لما سمع دِهْرِتَرَاشْتْرَةُ هذا القول من أبيه ڤياسا قال: «يا مولاي الجليل! إني أراه قضاءً قد سُطِّر من قبل؛ فلذلك سيكون هلاكُ الرجال واقعًا لا محالة».

Verse 48

राजान: क्षत्रधर्मेण यदि वध्यन्ति संयुगे । वीरलोकं समासाद्य सुखं प्राप्स्पन्ति केवलम्‌,“यदि राजालोग क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्धमें मारे जायँगे तो वीरलोकको प्राप्त होकर केवल सुखके भागी होंगे

قال فَيْشَمْبايَنَة: «إذا قُتِلَ الملوكُ في المعركة ملتزمين بدَرْمَةِ الكْشَتْرِيَة، فإنهم إذا بلغوا عالمَ الأبطال نالوا السعادةَ الخالصة وحدها».

Verse 49

इह कीर्ति परे लोके दीर्घकालं महत्‌ सुखम्‌ । प्राप्स्यन्ति पुरुषव्याप्रा: प्राणांस्त्यकत्वा महाहवे,“वे पुरुषसिंह नरेश महायुद्धमें प्राणोंका परित्याग करके इहलोकमें कीर्ति तथा परलोकमें दीर्घकालतक महान्‌ सुख प्राप्त करेंगे!

قال فَيْشَمْبايَنَة: «في هذه الدنيا ينالون الذِّكرَ الحسن، وفي الدار الأخرى ينالون سعادةً عظيمةً مديدة—أولئك الرجالُ الأبطالُ أهلُ الفعل، الذين يتركون أرواحهم في المعركة الكبرى».

Verse 50

वैशम्पायन उवाच एवमुक्तो मुनिस्तत्त्वं कवीन्द्रो राजसत्तम । धृतराष्ट्रेण पुत्रेण ध्यानमन्वगमत्‌ परम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ अपने पुत्र धृतराष्ट्रके इस प्रकार यथार्थ बात कहनेपर ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महर्षि व्यास कुछ देरतक बड़े सोच-विचारमें पड़े रहे

قال فَيْشَمْبايَنَة: يا خيرَ الملوك! لما خوطِبَ على هذا النحو بكلامٍ صادق من ابنِ دِهْرِتَرَاشْتْرَة، دخلَ ڤياسا المَهارِشي—أعظمُ الحكماء وسيدُ الشعراء—في تأمّلٍ عميقٍ سامٍ.

Verse 51

स मुहूर्त तथा ध्यात्वा पुनरेवाब्रवीद्‌ वच: । असंशयं पार्थिवेन्द्र काल: संक्षिपते जगत्‌

وبعد أن تأمّل هنيهةً، عاد فقال: «يا سيّدَ الأرض، لا ريبَ—إنّ الزمانَ يَقبِضُ هذا العالمَ ويُسارعُ بكلّ شيءٍ إلى منتهاه».

Verse 52

सृजते च पुनर्लोकान्‌ नेह विद्यति शाश्वतम्‌ । दो घड़ीतक चिन्तन करनेके बाद वे पुन: इस प्रकार बोले--'राजेन्द्र! इसमें संशय नहीं है कि काल ही इस जगत्‌का संहार करता है और वही पुनः इन सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि करता है। यहाँ कोई वस्तु सदा रहनेवाली नहीं है ।। ५१ है ।। ज्ञातीनां वै कुरूणां च सम्बन्धिसुहृदां तथा,“राजन! तुम अपने जाति-भाई, कौरवों, सगे-सम्बन्धियों तथा हितैषी-सुहृदोंको धर्मानुकूल मार्गका उपदेश करो; क्योंकि तुम उन सबको रोकनेमें समर्थ हो। जाति-वधको अत्यन्त नीच कर्म बताया गया है। वह मुझे अत्यन्त अप्रिय है। तुम यह अप्रिय कार्य न करो

قال فايشَمبايانا: «والزمانُ (كالا) يُنشِئُ العوالمَ من جديد؛ وفي هذا العالم لا شيء خالد.» ثم بعد أن تأمّل هنيهةً تابع: «يا خيرَ الملوك، لا ريب—إنّ الزمانَ وحده يُهلكُ هذا الكون، وهو وحده يُعيدُ خلقَ هذه العوالم كلّها. فاعظْ ذوي قرباك—آلَ كورو—ومعهم الأقاربَ والمحبّين الناصحين، بسلوكِ طريقِ الدharma؛ فإنك قادرٌ على كفِّهم. إنّ قتلَ ذوي الرحم مُعلَنٌ أنه أَخسُّ الأفعال؛ وهو ممقوتٌ عندي أشدَّ المقت. فلا ترتكبْ هذا الفعلَ البغيض.»

Verse 53

धर्म्य देशय पन्थानं समर्थों ह्सि वारणे । क्षुद्रे जातिवरध॑ प्राहुर्मा कुरुष्व ममाप्रियम्‌,“राजन! तुम अपने जाति-भाई, कौरवों, सगे-सम्बन्धियों तथा हितैषी-सुहृदोंको धर्मानुकूल मार्गका उपदेश करो; क्योंकि तुम उन सबको रोकनेमें समर्थ हो। जाति-वधको अत्यन्त नीच कर्म बताया गया है। वह मुझे अत्यन्त अप्रिय है। तुम यह अप्रिय कार्य न करो

قال فايشَمبايانا: «علِّمْهم طريقَ البرّ (الدharma). إنك قادرٌ على كفِّهم. إنّ قتلَ ذوي القربى مُعلَنٌ أنه أَخسُّ الأفعال—وهو ممقوتٌ عندي أشدَّ المقت. فلا ترتكبْ هذا الفعلَ الجسيم.»

Verse 54

कालो<थयं पुत्ररूपेण तव जातो विशाम्पते । न वध: पूज्यते वेदे हितं॑ नैव कथंचन,“महाराज! यह काल तुम्हारे पुत्ररूपसे उत्पन्न हुआ है। वेदमें हिंसाकी प्रशंसा नहीं की गयी है। हिंसासे किसी प्रकार हित नहीं हो सकता

«يا سيّدَ الناس، إنّ هذا الزمانَ بعينه قد وُلِدَ لك في صورةِ ابن. والڤيدا لا تُثني على القتل؛ ومن العنف لا ينشأ خيرٌ حقيقيٌّ على أيّ وجه.»

Verse 55

हन्यात्‌ स एन॑ यो हन्यात्‌ कुलधर्म स्विकां तनुम्‌ | कालेनोत्पथगन्तासि शक्‍्ये सति यथा55पदि,कुलधर्म अपने शरीरके ही समान है। जो इस कुलधर्मका नाश करता है, उसे वह धर्म ही नष्ट कर देता है। जबतक धर्मका पालन सम्भव है (जबतक तुमपर कोई आपत्ति नहीं आयी है), तबतक तुम कालसे प्रेरित होकर ही धर्मकी अवहेलना करके कुमार्गपर चल रहे हो, जैसा कि बहुधा लोग किसी आपफत्तिमें पड़नेपर ही करते हैं

قال فايشَمبايانا: «مَن يُفسِدُ دharma العشيرة فكأنما يُهلكُ جسدَه نفسَه؛ وذلك الدharma بعينه يصرعه جزاءً. وما دام في وسعك أن تُقيمَ الاستقامة—قبل أن تُدركَك نازلةٌ لا مفرّ منها—فإنك، مدفوعًا بالزمان، تنحرف عن الدharma وتسلك الطريقَ المعوجّ، كما يفعل الناس غالبًا بعد أن يقعوا في الشدّة.»

Verse 56

कुलस्यास्य विनाशाय तथैव च महीक्षिताम्‌ | अनर्थों राज्यरूपेण तव जातो विशाम्पते,“राजन! तुम्हारे कुलका तथा अन्य बहुत-से राजाओंका विनाश करनेके लिये यह तुम्हारे राज्यके रूपमें अनर्थ ही प्राप्त हुआ है

قال فَيْشَمْبَايَنَة: «يا سيّدَ الناس، إنّ هذه السيادة قد أتتك نازلةً وكارثة—قُدِّر لها أن تُفضي إلى هلاك سلالتك أنت، وكذلك إلى هلاك ملوكٍ كثيرين. فالسلطان إذا أُخذ أو أُمسك بغير كفٍّ وضبطٍ انقلب أداةَ تدميرٍ للأسرة والمملكة معًا».

Verse 57

लुप्तधर्मा परेणासि धर्म दर्शय वै सुतान्‌ । कि ते राज्येन दुर्धर्ष येन प्राप्तोडसि किल्बिषम्‌,“तुम्हारा धर्म अत्यन्त लुप्त हो गया है। अपने पुत्रोंको धर्मका मार्ग दिखाओ। दुर्धर्ष वीर! तुम्हें राज्य लेकर क्या करना है, जिसके लिये अपने ऊपर पापका बोझ लाद रहे हो?

«لقد احتُجِبَتْ دَرْمَتُكَ بتأثيرِ غيرِك. فاهدِ أبناءَك إلى سبيلِ الاستقامة. يا من يعسرُ قهرُه، أيُّ نفعٍ في مُلكٍ تحملُ لأجله على نفسك وِزرَ الإثم؟»

Verse 58

यशो धर्म च कीर्ति च पालयन्‌ स्वर्गमाप्स्यसि । लभन्तां पाण्डवा राज्यं शमं गच्छन्तु कौरवा:,“तुम मेरी बात माननेपर यश, धर्म और कीर्तिका पालन करते हुए स्वर्ग प्राप्त कर लोगे। पाण्डवोंको उनके राज्य प्राप्त हों और समस्त कौरव आपसमें संधि करके शान्त हो जायूँ'

«إن أنت أصغيتَ إلى نصيحتي حفظتَ الشرفَ والدَّرْمَةَ والذكرَ الخالد—وبذلك تنالُ السماء. فليستعدِ الباندافا مُلكَهم الحقّ، ولْيُقبِلِ الكورو على المصالحة وليحلّ السلام.»

Verse 59

एवं ब्रुवति विप्रेन्द्रे धृतराष्ट्रीडम्बिकासुतः । आक्षिप्य वाक्यं॑ वाक्यज्ञो वाक्‍्यं चैवाब्रवीत्‌ पुन:,विप्रवर व्यासजी जब इस प्रकार उपदेश दे रहे थे, उसी समय बोलनेमें चतुर अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने बीचमें ही उनकी बात काटकर उनसे इस प्रकार कहा

وبينما كان ذلك البراهمن الجليل يتكلم على هذا النحو، قاطعه دْهْرِتَرَاشْتْرَةُ ابنُ أَمْبِكَة، وهو الحاذق بفنون القول، ثم عاد فقال على النحو الآتي.

Verse 60

धृतराष्ट उवाच यथा भवान्‌ वेत्ति तथैव वेत्ता भावाभावी विदितौ मे यथार्थो स्वार्थे हि सम्मुह्ाति तात लोको मां चापि लोकात्मकमेव विद्धि,धृतराष्ट्र बोले--तात! जैसा आप जानते हैं, उसी प्रकार मैं भी इन बातोंको समझता हूँ। भाव और अभावका यथार्थ स्वरूप मुझे भी ज्ञात है, तथापि यह संसार अपने स्वार्थके लिये मोहमें पड़ा रहता है। मुझे भी संसारसे अभिन्न ही समझें

قال دْهْرِتَرَاشْتْرَة: «يا بُنَيّ، كما تعلم أنت هذه الأمور أعلمها أنا كذلك. إنّ حقيقة الوجود والعدم معلومةٌ لديّ على وجهها الصحيح. غير أنّ العالم، مدفوعًا بالمصلحة الذاتية، يقع في الوهم. فاعلمْني أيضًا ممن طبيعته مشدودةٌ إلى العالم.»

Verse 61

प्रसादये त्वामतुलप्रभाव॑ं त्वं नो गतिर्दर्शयिता च धीर: । न चापि ते मद्वशगा महर्षे न चाधर्म कर्तुमर्हा हि मे मति:,आपका प्रभाव अनुपम है। आप हमारे आश्रय, मार्गदर्शक तथा धीर पुरुष हैं। मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। महर्षे! मेरी बुद्धि भी अधर्म करना नहीं चाहती; परंतु क्या करूँ? मेरे पुत्र मेरे वशमें नहीं हैं

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «ألتمس رضاك، يا ذا القدرة التي لا تُضاهى. أنت ملاذُنا وهادينا الذي يُري السبيل، وأنت الحكيم الثابت. غير أنّي، أيها الرِّشي العظيم، لا سلطان لي على أبنائي؛ وعقلي نفسه لا يرضى بارتكاب الظلم—فماذا عساي أن أفعل؟»

Verse 62

त्वं हि धर्मप्रवृत्तिश्न यश: कीर्तिश्व भारती । कुरूणां पाण्डवानां च मान्यश्वलापि पितामह:,आप ही हम भरतवंशियोंकी धर्मप्रवृत्ति, यश तथा कीर्तिके हेतु हैं। आप कौरवों और पाण्डवों--दोनोंके माननीय पितामह हैं

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «إنك حقًّا أصلُ السلوك على الدَّرْمَا وعمادُه، وأنت سببُ المجد والصيت لذرية بهاراتا. وأنت الجدُّ الموقَّر، المستحقُّ للتعظيم عند الكورو والباندافا على السواء.»

Verse 63

व्याय उवाच वैचित्रवीर्य नृपते यत्‌ ते मनसि वर्तते । अभिधत्स्व यथाकामं छेत्तास्मि तव संशयम्‌,व्यासजी बोले--विचित्रवीर्यकुमार! नरेश्वर! तुम्हारे मनमें जो संदेह है, उसे अपनी इच्छाके अनुसार प्रकट करो। मैं तुम्हारे संशयका निवारण करूँगा

قال فياسا: «يا ابنَ فيتشِترافِيرْيَا، أيها الملك—مهما يكن من شكٍّ أو خاطرٍ يتحرّك في قلبك، فابده كما تشاء. سأقطع تردّدك وأزيل شكّك.»

Verse 64

धृतराष्ट्र रवाच यानि लिड्डनि संग्रामे भवन्ति विजयिष्यताम्‌ | तानि सर्वाणि भगवज्छोतुमिच्छामि तत्त्वतः,धृतराष्ट्र बोले--भगवन्‌! युद्धमें निश्चितरूपसे विजय पानेवाले लोगोंको जो शुभ लक्षण दीख पड़ते हैं, उन सबको यथार्थरूपसे सुननेकी मेरी इच्छा है

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «أيها المبجَّل، أودّ أن أسمع على حقيقتها جميعَ العلامات المباركة التي تظهر في ساحة القتال لمن كُتِب لهم الظفر.»

Verse 65

व्यास उवाच प्रसन्नभा: पावक ऊर्ध्वरश्मि: प्रदक्षिणावर्त शिखो विधूम: । पुण्या गन्धाश्चाहुतीनां प्रवान्ति जयस्यैतद्‌ भाविनो रूपमाहु:,व्यासजीने कहा--अग्निकी प्रभा निर्मल हो, उसकी लपटें ऊपरकी ओर दक्षिणावर्त होकर उठें और धूआँ बिलकुल न रहे; साथ ही अग्निमें जो आहुतियाँ डाली जायूँ, उनकी पवित्र सुगन्ध वायुमें मिलकर सर्वत्र व्याप्त होती रहे--यह भावी विजयका स्वरूप (लक्षण) बताया गया है

قال فياسا: «إذا أشرقَت نارُ القربان بضياءٍ صافٍ هادئ؛ وإذا ارتفعت ألسنتُها إلى أعلى ملتفّةً إلى اليمين من غير دخانٍ البتّة؛ وإذا أطلقت القرابينُ المُلقاة فيها عِطرًا طاهرًا ينتشر مع الريح—فذلك ما يُعلَن أنه العلاماتُ المرئية لنصرٍ آتٍ قريبًا.»

Verse 66

गम्भीरघोषाश्न महास्वनाश्र शड्खा मृदड्भाश्न नदन्ति यत्र । विशुद्धरश्मिस्तपन: शशी च जयस्यैतद्‌ भाविनो रूपमाहु:,जिस पक्षमें शंखों और मृदंगोंकी गम्भीर आवाज बड़े जोर-जोरसे हो रही हो तथा जिन्हें सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें विशुद्ध प्रतीत होती हों, उनके लिये यह भावी विजयका शुभ लक्षण बताया है

قال فياسا: «إن الجانب الذي تُدوّي فيه أصداء الأصداف والطبول الحربية بدويٍّ عميقٍ جبار كالرعد، وتبدو فيه أشعة الشمس والقمر صافيةً طاهرة—فذلك ما يُعلَن علامةً مباركةً على نصرٍ آتٍ لا محالة».

Verse 67

इष्टा वाच: प्रसृता वायसानां सम्प्रस्थितानां च गमिष्यतां च । ये पृष्ठतस्ते त्वरयन्ति राजन्‌ ये चाग्रतस्ते प्रतिषेधयन्ति,जिनके प्रस्थित होनेपर अथवा प्रस्थानके लिये उद्यत होनेपर कौवोंकी मीठी आवाज फैलती है, उनकी विजय सूचित होती है। राजन्‌! जो कौवे पीछे बोलते हैं, वे मानो सिद्धिकी सूचना देते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़नेके लिये प्रेरित करते हैं और जो सामने बोलते हैं, वे मानो युद्धमें जानेसे रोकते हैं

قال فياسا: «إذا همّ المرء بالمسير، أو كان على وشك الرحيل، وانتشرت من حوله نداءات الغربان العذبة، عُدَّ ذلك علامةً على الظفر. أيها الملك، فالغراب الذي ينعق من الخلف كأنه يحثّ على الإسراع إلى الأمام، كمن يبشّر بالمنال؛ أما الذي ينعق من الأمام فكأنه يصدّ ويمنع، كمن يحذّر من دخول ساحة القتال.»

Verse 68

कल्याणवाच: शकुना राजहंसा: शुका: क्रौज्चा: शतपत्राश्न यत्र । प्रदक्षिणाश्रैव भवन्ति संख्ये ध्रुवं जयस्तत्र वदन्ति विप्रा:,जहाँ शुभ एवं कल्याणमयी बोली बोलनेवाले राजहंस, शुक, क्रौंच तथा शतपत्र (मोर) आदि पक्षी सैनिकोंकी प्रदक्षिणा करते हैं (दाहिने जाते हैं), उस पक्षकी युद्धमें निश्चितरूपसे विजय होती है, यह ब्राह्मणोंका कथन है

قال فياسا: «حيثما كانت الطيور ذات النداءات المباركة جالبةَ الخير—كالبجع الملوكي، والببغاوات، وطيور الكراونتش (الرافعات)، والطواويس—تطوف بالجيش في ساحة القتال طوافًا إلى اليمين، فإن البراهمة العلماء يقررون أن النصر لذلك الجانب ثابت لا ريب فيه.»

Verse 69

अलड्कारै: कवचै: केतुभिश्न सुखप्रणादैहेंषितैर्वा हयानाम्‌ । भ्राजिष्मती दुष्प्रतिवीक्षणीया येषां चमूस्ते विजयन्ति शत्रून्‌,अलंकार, कवच, ध्वजा-पताका, सुखपूर्वक किये जानेवाले सिंहनाद अथवा घोड़ोंके हिनहिनानेकी आवाजसे जिनकी सेना अत्यन्त शोभायमान होती है तथा शत्रुओंको जिनकी सेनाकी ओर देखना भी कठिन जान पड़ता है, वे अवश्य अपने विपक्षियोंपर विजय पाते हैं

قال فياسا: «أولئك الذين يلمع جيشهم بالزينة والدروع والرايات، وبالهتافات الحربية المباركة الواثقة وبصهيل الخيل—حتى يغدو بهاؤه عسيرًا على العدو أن يحدّق فيه—فإنهم لا محالة يقهرون خصومهم.»

Verse 70

हृष्टा वाचस्तथा सत्त्वं योधानां यत्र भारत । न म्लायन्ति स्रजश्नैव ते तरन्ति रणोदधिम्‌,भारत! जिस पक्षके योद्धाओंकी बातें हर्ष और उत्साहसे परिपूर्ण होती हैं, मन प्रसन्न रहता है तथा जिनके कण्ठमें पड़ी हुई पुष्पमालाएँ कुम्हलाती नहीं हैं, वे युद्धरूपी महासागरसे पार हो जाते हैं

قال فياسا: «يا بهاراتا، إن الجانب الذي يتكلم محاربوه بفرح وروحٍ واثقة، وتبقى عزيمتهم الباطنة مشرقة، ولا تذبل أكاليلهم على الأعناق—أولئك يعبرون محيط المعركة.»

Verse 71

इष्टा वाच: प्रविष्टस्य दक्षिणा: प्रविविक्षत: । पश्चात्‌ संधारयन्त्यर्थमग्रे च प्रतिषेधिका:,जिस पक्षके योद्धा शत्रुकी सेनामें प्रवेश करनेकी इच्छा करते समय अथवा उसमें प्रवेश कर लेनेपर अभीष्ट वचन (मैं तुझे अभी मार भगाता हूँ इत्यादि शौर्यसूचक बातें) बोलते हैं और अपने रणकौशलका परिचय देते हैं, वे पीछे प्राप्त होनेवाली अपनी विजयको पहलेसे ही निश्चित कर लेते हैं। इसके विपरीत जिन्हें शत्रुसेनामें प्रवेश करते समय सामनेसे निषेधसूचक वचन सुननेको मिलते हैं, उनकी पराजय होती है

قال فياسا: إذا همَّ المحاربون باقتحام صفوف جيش العدو—أو كانوا قد اقتحموها بالفعل—فإن نطقوا بكلماتٍ واثقةٍ محبَّبةٍ تدلّ على البأس، وأظهروا مهارتهم في القتال، فقد ثبّتوا سلفًا ما سيؤول إليه الأمر: النصر. أمّا إذا لاقَوا في مقدّمة الصفوف، وهم يحاولون الدخول إلى رُتَب العدو، كلماتٍ زاجرةً مُثبِّطة، فذلك علامةُ الهزيمة.

Verse 72

शब्दरूपरसस्पर्शगन्धाश्वाविकृता: शुभा: । सदा हर्षश्व योधानां जयतामिह लक्षणम्‌,जिनके शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श आदि निर्विकार एवं शुभ होते हैं तथा जिन योद्धाओंके हृदयमें सदा हर्ष और उत्साह बना रहता है, उनके विजयी होनेका यही शुभ लक्षण है

قال فياسا: «إذا بدا الصوتُ والصورةُ والطعمُ واللمسُ والرائحةُ غيرَ ملوَّثةٍ وميمونة، وإذا ثبت في قلوب المحاربين فرحٌ دائمٌ وهمّةٌ عالية، فذلك هو العلامة الحسنة هنا على أنهم موعودون بالنصر.»

Verse 73

अनुगा वायवो वान्ति तथाभ्राणि वयांसि च | अनुप्लवन्ति मेघाश्न तथैवेन्द्रधनूंषि च,राजन्‌! हवा जिनके अनुकूल बहती है, बादल और पक्षी भी जिनके अनुकूल होते हैं, मेघ जिनके पीछे-पीछे छत्रछाया किये चलते हैं तथा इन्द्रधनुष भी जिन्हें अनुकूल दिशामें ही दृष्टिगोचर होते हैं, उन विजयी वीरोंके लिये ये विजयके शुभ लक्षण हैं। जनेश्वर! मरणासन्न मनुष्योंको इसके विपरीत अशुभ लक्षण दिखायी देते हैं

قال فياسا: «أيها الملك، إذا هبّت الرياح في صالح المرء، وسارت السحب والطيور منسجمةً مع تلك الجهة؛ وإذا بدت السحب كأنها تتبعه كالمظلّة الوارفة؛ وإذا ظهرت قِسِيُّ قُزَحٍ في النواحي الميمونة—فهذه علاماتُ ظفرٍ مباركة للأبطال الموعودين بالغلبة. أمّا من دنا أجله، فإن الأضداد هي التي تتراءى له، فتغدو نُذُرًا مشؤومة.»

Verse 74

एतानि जयमानानां लक्षणानि विशाम्पते | भवन्ति विपरीतानि मुमूर्षणां जनाधिप,राजन्‌! हवा जिनके अनुकूल बहती है, बादल और पक्षी भी जिनके अनुकूल होते हैं, मेघ जिनके पीछे-पीछे छत्रछाया किये चलते हैं तथा इन्द्रधनुष भी जिन्हें अनुकूल दिशामें ही दृष्टिगोचर होते हैं, उन विजयी वीरोंके लिये ये विजयके शुभ लक्षण हैं। जनेश्वर! मरणासन्न मनुष्योंको इसके विपरीत अशुभ लक्षण दिखायी देते हैं

قال فياسا: «يا سيّدَ الناس، هذه هي العلاماتُ الميمونة التي تصحب من ينهضون إلى الظفر. ولكن، أيها الملك وحاكم البشر، فإن هذه العلامات نفسها تظهر لمن دنا موته على وجهٍ معكوس، فتغدو نُذُرًا مشؤومة.»

Verse 75

अल्पायां वा महत्यां वा सेनायामिति निश्चय: । हर्षो योधगणस्यैको जयलक्षणमुच्यते,सेना छोटी हो या बड़ी, उसमें सम्मिलित होनेवाले सैनिकोंका एकमात्र हर्ष ही निश्चितरूपसे विजयका लक्षण बताया जाता है

يُعلن فياسا خلاصةً قاطعة: سواء أكان الجيشُ قليلًا أم عظيمًا، فإن العلامةَ الوحيدةَ المتيقَّنة للنصر هي الابتهاجُ المشترك وروحُ الثقة التي تسري في قلوب المحاربين.

Verse 76

एको दीर्णो दारयति सेनां सुमहतीमपि । तां दीर्णामनुदीर्यन्ते योधा: शूरतरा अपि,यदि सेनाका एक सैनिक भी उत्साहहीन होकर पीछे हटे तो वह अपनी ही देखा-देखी अत्यन्त विशाल सेनाको भी भगा देता है (उसके भागनेमें कारण बन जाता है)। उस सेनाके पलायन करनेपर बड़े-बड़े शूरवीर सैनिक भी भागनेको विवश होते हैं

قال فياسا: إنّ جنديًّا واحدًا، إذا انكسرَتْ همّتُه وتراجع، قد يُلقي في الفوضى جيشًا عظيمًا جدًّا. فإذا تهاوى ذلك الجيش وتصدّع، انجرفَ حتى أشدّ المحاربين بأسًا في أثره واضطرّوا إلى الفرار.

Verse 77

दुर्निवर्त्या तदा चैव प्रभग्ना महती चमू: । अपामिव महावेगास्त्रस्ता मृगगणा इव,जब बड़ी भारी सेना भागने लगती है, तब डरकर भागे हुए मृगोंके झुंड तथा नीची भूमिकी ओर बहनेवाले जलके महान्‌ वेगकी भाँति उसे पीछे लौटाना बहुत कठिन है

قال فياسا: إذا انكسر جيش عظيم مرةً وشرع في الفرار، غدا ردُّه إلى الوراء بالغَ العسر—كمن يحاول كفَّ مياهٍ تندفع بقوةٍ عظيمة إلى أسفل، أو كمن يريد جمعَ قطيعِ ظباءٍ مذعورةٍ تفرّقت هلعًا.

Verse 78

नैव शक्‍्या समाधातुं संनिपाते महाचमू: । दीर्णामित्येव दीर्यन्ते सुविद्वांसोईपि भारत,भरतनन्दन! विशाल सेनामें जब भगदड़ मच जाती है, तब उसे समझा-बुझाकर रोकना कठिन हो जाता है। सेना भाग रही है, इतना सुनकर ही बड़े-बड़े युद्धविद्याके विद्वान्‌ भी भागने लगते हैं

قال فياسا: في زحمة الحشد العظيم حين تجتمع الجموع، لا يسهل إعادة الجيش الجبار إلى النظام. وما إن يُسمَع النداء: «قد انكسر!» حتى يبدأ حتى ذوو العلم الواسع والمهارة في فنون القتال بالتفرق والفرار، يا بهاراتا، يا بهجة آل بهاراتا.

Verse 79

भीतान्‌ भग्नांश्व सम्प्रेक्ष्य भयं भूयोडभिवर्धते । प्रभग्ना सहसा राजन्‌ दिशो विद्रवते चमू:,राजन! भयभीत होकर भागते हुए सैनिकोंको देखकर अन्य योद्धाओंका भय, बहुत अधिक बढ़ जाता है; फिर तो सहसा सारी सेना हतोत्साह होकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगती है

قال فياسا: إن رؤيةَ الجنود المذعورين المنهارين تزيد خوفَ الآخرين تضاعفًا. ثم، يا أيها الملك، تتبدّد الكتائب كلها فجأةً وقد خارت عزائمها، فتتفرق وتهرب إلى كل جهة.

Verse 80

नैव स्थापयितुं शक्‍्या शूरैरपि महाचमू: । सत्कृत्य महतीं सेनां चतुरड्रां महीपति: । उपायपूर्व मेधावी यतेत सततोत्थित:,उस समय बहुत-से शूरवीर भी उस विशाल वाहिनीको रोककर खड़ी नहीं रख सकते। इसलिये बुद्धिमान्‌ राजाको चाहिये कि वह सतत सावधान रहकर कोई-न-कोई उपाय करके अपनी विशाल चतुरंगिणी सेनाको विशेष सत्कारपूर्वक स्थिर रखनेका यत्न करे

قال فياسا: إن كثرةَ الأبطال لا تكفي وحدها لإيقاف جيشٍ عظيم وإبقائه ثابتًا. لذلك ينبغي للملك الحكيم أن يظل يقظًا على الدوام، سريعَ النهوض إلى الفعل، وأن يستعمل وسائلَ مدروسة، وأن يسعى—مع ما يليق من التكريم وحسن الرعاية—إلى تثبيت جيشه العظيم ذي الأقسام الأربعة وحفظ انضباطه.

Verse 81

उपायविजयं श्रेष्ठमाहुभेंदेन मध्यमम्‌ । जघन्य एष विजयो यो युद्धेन विशाम्पते,राजन! साम-दानरूप उपायसे जो विजय प्राप्त होती है, उसे श्रेष्ठ बताया गया है। भेदनीतिके द्वारा शत्रुसेनामें फ़ूट डालकर जो विजय प्राप्त की जाती है, वह मध्यम है तथा युद्धके द्वारा मार-काट मचाकर जो शत्रुको पराजित किया जाता है, वह सबसे निम्नश्रेणीकी विजय है

قال فياسا: «إن النصر الذي يُنال بالوسائل الرشيدة (السياسة والتدبير) يُعلَن أفضلَ الانتصارات. والنصر الذي يُحرَز بـ“بهيدا” — أي شقِّ صفِّ العدو بإثارة الشقاق — يُعَدُّ متوسطًا. أمّا النصر الذي يُنال بالحرب، بالسفك والخراب، يا سيدَ الناس، يا أيها الملك، فهو أدنى أنواع النصر».

Verse 82

महादोष: संनिपातस्तस्याद्य: क्षय उच्यते । परस्परज्ञा: संहृष्टा व्यवधूता: सुनिश्चिता:,युद्ध महान्‌ दोषका भण्डार है। उन दोषोंमें सबसे प्रधान है जनसंहार। यदि एक दूसरेको जाननेवाले, हर्ष और उत्साहमें भरे रहनेवाले, कहीं भी आसक्त न होकर विजय- प्राप्तिका दृढ़ निश्चय रखनेवाले तथा शौर्यसम्पन्न पचास सैनिक भी हों तो वे बड़ी भारी सेनाको धूलमें मिला देते हैं। यदि पीछे पैर न हटानेवाले पाँच, छ: और सात ही योद्धा हों तो वे भी निश्चितरूपसे विजयी होते हैं

قال فياسا: «في الحرب يصبح احتشادُ القوات عيبًا عظيمًا؛ وأولُ ما يترتب على ذلك العيب هو الهلاك—القتلُ على نطاق واسع. غير أنّه إذا اجتمعت عصبةٌ قليلة من المحاربين—يعرف بعضُهم بعضًا حقَّ المعرفة، ممتلئين فرحًا وحماسة، متحررين من التعلقات المُلهية، ثابتين على عزم النصر—فإنهم، إذا وقفوا معًا في البأس، استطاعوا أن يسحقوا جيشًا أكبر بكثير. بل إن خمسةً أو ستةً أو سبعةً من الأبطال الذين لا يولّون الأدبار يمكنهم، يقينًا، أن يغلبوا.»

Verse 83

पड्चाशदपि ये शूरा मृद्गन्ति महतीं चमूम्‌ । अपि वा पज्च षट्‌ सप्त विजयन्त्यनिवर्तिन:,युद्ध महान्‌ दोषका भण्डार है। उन दोषोंमें सबसे प्रधान है जनसंहार। यदि एक दूसरेको जाननेवाले, हर्ष और उत्साहमें भरे रहनेवाले, कहीं भी आसक्त न होकर विजय- प्राप्तिका दृढ़ निश्चय रखनेवाले तथा शौर्यसम्पन्न पचास सैनिक भी हों तो वे बड़ी भारी सेनाको धूलमें मिला देते हैं। यदि पीछे पैर न हटानेवाले पाँच, छ: और सात ही योद्धा हों तो वे भी निश्चितरूपसे विजयी होते हैं

قال فياسا: «حتى خمسون من الشجعان يستطيعون سحق جيشٍ عظيم. بل إن خمسةً أو ستةً أو سبعةً من المقاتلين—إذا لم يرتدّوا على أعقابهم—فإنهم يظفرون يقينًا».

Verse 84

न वैनतेयो गरुड: प्रशंसति महाजनम्‌ । दृष्टवा सुपर्णोडपचितिं महत्या अपि भारत,भारत! सुन्दर पंखोंवाले विनतानन्दन गरुड़ विशाल सेनाका भी विनाश होता देखकर अधिक जनसमूहकी प्रशंसा नहीं करते हैं

قال فياسا: «حتى فايناتِيا، غارودا—ذو الجناحين البهيّين، ابنُ فينَتا—لا يمدح كثرةَ الجمع. فـيا بهاراتا، حتى بعد مشاهدة الدمار الواسع لجيشٍ عظيم، لا يمجّد الحكماء مجردَ العدد؛ بل يقدّمون حسنَ التمييز والاستقامةَ في السلوك على الكثرة».

Verse 85

न बाहुल्‍येन सेनाया जयो भवति नित्यश: । अध्रुवो हि जयो नाम दैवं चात्र परायणम्‌ । जयवन्तो हि संग्रामे कृतकृत्या भवन्ति हि,सदा अधिक सेना होनेसे ही विजय नहीं होती है। युद्धमें जीत प्राय: अनिश्चित होती है। उसमें दैव ही सबसे बड़ा सहारा है। जो संग्राममें विजयी होते हैं, वे ही कृतकार्य होते हैं

قال فياسا: «ليس النصرُ ينشأ دائمًا من كثرةِ الجيش وحدها. ففي الحرب، ما يُسمّى “نصرًا” أمرٌ غيرُ ثابت؛ وهنا يكون القدرُ (التدبير الإلهي) أعلى ملجأ. إنما الذين يظفرون في المعركة وحدهم يُعَدّون قد أنجزوا غايتهم».

Verse 376

सहस्रशो महाशब्द: शिखराणि पतन्ति च । जान पड़ता है, यह भूमि सहस्रों भूमिपालोंका रक्तपान करेगी। प्रभो! कैलास, मन्दराचल तथा हिमालयसे सहसों प्रकारके अत्यन्त भयानक शब्द प्रकट होते हैं और उनके शिखर भी टूट-टूटकर गिर रहे हैं

قال فياسا: «من كل جانب ترتفع أصواتٌ مدوّيةٌ مرعبةٌ بالآلاف، وحتى قمم الجبال تتصدّع وتتساقط. إن هذه الطوالع توحي بأن الأرض على وشك أن تشرب دماء ملوكٍ لا يُحصَون—إنذارٌ مشؤوم بمذبحةٍ عظيمةٍ جائرةٍ تطلقها الحرب حين يُحجَب الدارما بطموحٍ أعمى».

Verse 396

वृक्षा: पतन्ति चैत्याश्व ग्रामेषु नगरेषु च । बालू और कंकड़ खींचकर बरसानेवाले भयानक बवंडर उठकर वृक्षोंको उखाड़ डालते हैं। गाँवों तथा नगरोंमें वृक्ष और चैत्यवृक्ष प्रचण्ड आँधियों तथा बिजलीके आघातोंसे टूटकर गिर रहे हैं

قال فياسا: «الأشجار تتساقط، في القرى وفي المدن. وحتى الأشجار المقدّسة عند المزارات تُقتلع، إذ تهبّ زوابع مرعبة تقذف الرمل والحصى والحجارة فتجتثّها من جذورها. هذه الرياح العاتية، مع ضربات البرق، تكسر الأشجار وتطرحها في كل مكان—وهو نذير شؤم بأن نظام الدارما يهتزّ مع اقتراب الحرب العظمى».

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether political leadership should continue on an escalatory path when multiple indicators suggest systemic instability; Vyāsa’s warning frames a choice between timely restraint/counsel and proceeding toward a foreseeable, large-scale societal depletion.

The chapter teaches that ethical governance requires interpretive vigilance: when signs of disorder appear across nature and society, leaders must reassess intentions and consequences, balancing fate-language with responsibility for decisions that affect collective welfare.

There is no formal phalaśruti formula; the meta-commentary functions through Vyāsa’s concluding injunction to act at the ‘right time’ to prevent social annihilation, and through Dhṛtarāṣṭra’s doctrinal framing that links duty-bound death with fame and a valorized posthumous outcome.