Bala KandaPrakarana 2520 Verses

Prakarana 25

This Sopāna is the awakening of bhakti through auspicious beginnings (mangal), right-seeing (darśana), and the first decisive recognition of Rāma’s divinity in human sweetness. In the Janaka-sabhā and Sītā-svayaṃvara atmosphere, the seeker’s mind learns to move from social spectacle (rāj-samāj, rāṅg-bhūmi) to inner adoration (anurāga), where each beholder sees the Lord according to their bhāvanā—thus training perception itself as a spiritual instrument.

在《बालकाण्ड》此段(多哈 240–249)中,图尔सी达斯调度“奇妙(adbhuta)”与“恋慕(śṛṅgāra)”之 रस,并立刻将其转化为“ भक्ति-rasa”。外在是王者盛观,内里却是“观想(bhāvanā)的实验场”;“जिन्ह कें रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी(各随其所怀之 भाव,所见主之形亦如其 भाव)”成为神学的枢纽。诸王见威胁或竞逐;瑜伽女见真如(tattva); भक्त 见所奉之本尊(iṣṭa-deva);妇女见无比之美;阇那迦见 धर्म 的圆满。这种多样并非相对主义,而是一种教化:众生各自通过净化知觉,从“由 गुण 触发的反应”升至“由 प्रेम 识认的觉悟”。无相—有相的融摄亦在其中:同一罗摩,对瑜伽者是“至上真理之体(परम तत्वमय)”,对市民则是“人间之冠(नरभूषन)”。偈体中 chaupai—doha 的脉动,将情感的波涌安定为观照,使此段既宜诵持又循序增上——真正完成从“见”到“归投”的阶梯行进。

Verses

Verse 501 (चौपाई)

सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।। लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई।। हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी।। पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला।। रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।। चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।। देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी।। तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू।।

Verse 502 (दोहा/सोरठा)

कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि। उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।।240।।

Verse 503 (चौपाई)

राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।। गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा।। राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।। जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।। देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।। डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।। रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।। पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई।।

Verse 504 (दोहा/सोरठा)

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप। जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।।

Verse 505 (चौपाई)

बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा।। जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें।। सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।। जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा।। हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता।। रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया।। उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।। एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ।।

Verse 506 (दोहा/सोरठा)

राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर। सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर।।242।।

Verse 507 (चौपाई)

सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।। सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के।। चितवत चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहीं बरनी।। कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला।। कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा।। भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं।। पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं।। रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ।।

Verse 508 (दोहा/सोरठा)

कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल। बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल।।243।।

Verse 509 (चौपाई)

कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे।। पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए।। देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे।। हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई।। करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई।। जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ।। निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा।। भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ।।

Verse 510 (दोहा/सोरठा)

सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल। मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल।।244।।

Verse 511 (चौपाई)

प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।। असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं।। बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।। अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई।। बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी।। तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा।। एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ।। यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील हरिभगत सयाने।।

Verse 512 (दोहा/सोरठा)

सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।। जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे।।245।।

Verse 513 (चौपाई)

ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।। सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता।। जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी।। सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी।। सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई।। करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।। अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।। देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना।।

Verse 514 (दोहा/सोरठा)

जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई। चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं।।246।।

Verse 515 (चौपाई)

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी।। उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं।। सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई।। जौ पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया।। गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी।। बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही।। जौ छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छप सोई।। सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू।।

Verse 516 (दोहा/सोरठा)

एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल। तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल।।247।।

Verse 517 (चौपाई)

चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।। सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी।। भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए।। रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।। हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई।। पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला।। सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा।। मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।।

Verse 518 (दोहा/सोरठा)

गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।। लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि।।248।।

Verse 519 (चौपाई)

राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।। सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं।। हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई।। बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू।। जग भल कहहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू।। एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू।। तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए।। कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।।

Verse 520 (दोहा/सोरठा)

बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल। पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल।।249।।

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