यह सोपान ‘राजधर्म बनाम प्रेमधर्म’ के द्वंद्व को साधना-पथ में रूपान्तरित करता है: बाह्य अभिषेक (सामाजिक-राजकीय प्रतिष्ठा) से भीतर के अभिषेक (त्याग, समत्व, आज्ञापालन) की ओर चढ़ाई। अयोध्या—‘अयोध्या’ (अ-युद्ध) प्रतीक है उस अंतःपुर की जहाँ इच्छा/लोभ के साथ युद्ध नहीं, बल्कि विवेक से शमन होता है। इस काण्ड में राम का युवराज-टीका प्रस्ताव भक्ति के लिए ‘मंगल’ है, पर वही मंगल आगे चलकर वैराग्य की कसौटी बनता है। अतः यह चरण साधक को सिखाता है कि ईश्वर-सान्निध्य का शिखर राजसुख नहीं, गुरु-वचन, पितृ-वचन और लोक-कल्याण के लिए स्वेच्छा से कष्ट स्वीकार करना है—यही मुक्ति की सीढ़ी का निर्णायक पायदान है।
《阿逾陀篇》的主味虽为悲悯,其源却不止于哀伤——而是“法之严”与“爱之柔”相摩而生的“法性悲悯”(dharma-karuṇā)。本段在吉祥赞颂(向商羯罗礼赞、罗伽难陀面容光辉、罗摩执弓之相)之后,铺陈城郭富丽与众生欢悦:“日日新吉祥”“善业之云”等譬喻,使阿逾陀成为福德充盈的心灵国土。旋即叙事轴心紧扣“立太子”之决:达沙罗陀自觉老境(白发)并得师命许可。此结构有意将“庆典”与“出离之种”并置:加冕准备越华盛,越加深后来舍弃的背景。图罗西在此把有相之戏(saguṇa-līlā,王位加冕)转向无相之真(nirguṇa-satya:无执、奉命、平等)——这正是本篇在法理上的安置之处。
Verse 1 (श्लोक)
यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्। सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्।।1।। प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः। मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा।।2।। नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्। पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्।।3।।
(内容已被过滤,未提供原文,故无法译出。愿圣名常护念,心归罗摩。)
Verse 2 (दोहा/सोरठा)
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।
Verse 3 (चौपाई)
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।। भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।। रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।। मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।। कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।। सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।। मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।। राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।
Verse 4 (दोहा/सोरठा)
सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु। आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1।।
Verse 5 (चौपाई)
एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।। सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।। नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।। तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।। मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।। रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।। श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।। नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।
Verse 6 (दोहा/सोरठा)
यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।
Verse 7 (चौपाई)
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।। सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।। सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।। बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।। जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।। मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।। अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।। मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।
Verse 8 (दोहा/सोरठा)
राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार। फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।3।।
Verse 9 (चौपाई)
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।। नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।। मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।। प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।। पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।। सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।। सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।। भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।
Verse 10 (दोहा/सोरठा)
बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु। सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।।
Verse 11 (चौपाई)
मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।। कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।। जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।। मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।। बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।। जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।। नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।।
Verse 12 (दोहा/सोरठा)
कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ। राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।।
Verse 13 (चौपाई)
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।। औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।। चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।। मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।। बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।। सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।। रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।। पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।
Verse 14 (दोहा/सोरठा)
ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग। सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।।
Verse 15 (चौपाई)
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।। बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।। सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।। राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।। पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।। भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।। भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।। रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।
Verse 16 (दोहा/सोरठा)
एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु। सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।।
Verse 17 (चौपाई)
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।। प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।। चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी।। आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।। पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।। जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।। गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।
Verse 18 (दोहा/सोरठा)
राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि। लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।।
Verse 19 (चौपाई)
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।। गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।। सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।। गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।। सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।। तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।। प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।। आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई।।
Verse 20 (दोहा/सोरठा)
सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस। राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।।
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