अगस्त्य-वातापि-उपाख्यानम्
Agastya and Vātāpi: Ilvala’s stratagem; Lopāmudrā’s emergence
दैतेयान् दानवांश्नैव कलिरप्याविशत् ततः । तानलक्ष्मीसमाविष्टान् दानवान् कलिना हतान्,इस प्रकार लज्जा, संकोच और सदाचारसे हीन एवं निष्फल व्रतका आचरण करनेवाले उन असुरोंको क्षमा, लक्ष्मी और स्वधर्मने शीघ्र त्याग दिया। राजन! लक्ष्मी देवताओंके पास चली गयी और अलक्ष्मी असुरोंके यहाँ। अलक्ष्मीके आवेशसे युक्त होनेपर उनका चित्त दर्प और अभिमानसे दूषित हो गया। उस दशामें उन दैत्यों और दानवोंमें कलिका भी प्रवेश हो गया। जब वे दानव अलक्ष्मीसे संयुक्त, कलिसे तिरस्कृत और अभिमानसे अभिभूत हो सत्कर्मोंसे शून्य, विवेकरहित और मानसे उन्मत्त हो गये, तब शीघ्र ही उनका विनाश हो गया
daiteyān dānavāṁś caiva kalir apy āviśat tataḥ | tān alakṣmī-samāviṣṭān dānavān kalinā hatān ||
随后,迦梨(Kali)也侵入了底提耶族(Daitya)与达那婆族(Dānava)。那些被阿拉克什弥(Alakṣmī,厄运)所压制的达那婆,遂为迦梨所击倒。此段揭示一条道德因果之链:一旦舍弃羞惭、克制与正行,福祉与达摩的护持便离去;厄运乘虚而入,傲慢与自负污染其心,而迦梨的毁灭之力遂得其门径——迅速导向覆亡。
लोगश उवाच