Dhaumya’s Enumeration of Eastern Tīrthas
Prācī-diś Tīrtha-kathana
सम्पूर्ण तीर्थोंके दर्शनकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मनुष्य जहाँ जाना सम्भव न हो उन अगम्य तीर्थोमें मनसे यात्रा करे, अर्थात् मनसे उन तीर्थोंका चिन्तन करे। वसुगण, साध्यगण, आदित्यगण, मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमार तथा देवोपम महर्षियोंने भी पुण्य लाभकी इच्छासे उन तीर्थोमें स्नान किया है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुनन्दन! इसी प्रकार तुम भी विधिपूर्वक शौच-संतोषादि नियमोंका पालन करते और पुण्यसे पुण्यको बढ़ाते हुए उन तीर्थोंकी यात्रा करो। आस्तिकता और वेदोंके अनुशीलनसे पहले अपने इन्द्रियोंको पवित्र करके शास्त्रज्ञ साधु पुरुष ही उन तीर्थोंको प्राप्त करते हैं। कुरुनन्दन! जो ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन नहीं करता, जिसने अपने चित्तको वशमें नहीं किया, जो अपवित्र आचार-विचारवाला और चोर है, जिसकी बुद्धि वक्र है, ऐसा मनुष्य श्रद्धा न होनेके कारण तीर्थोर्में स्नान नहीं करता। तुम धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा नित्य सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हो। धर्मज्ञ! तुमने पिता-पितामह-प्रपितामह, ब्रह्मा आदि देवता तथा महर्षिगण इन सबको सदा स्वधर्मपालनसे संतुष्ट किया है, अतः इन्द्रके समान तेजस्वी नरेश! तुम वसुओंके लोकमें जाओगे। भीष्म! तुम्हें इस पृथ्वीपर विशाल एवं अक्षय कीर्ति प्राप्त होगी || १०५-- १११ || नारद उवाच एवमुकक््त्वाभ्यनुज्ञाय पुलस्त्यो भगवानृषि: । प्रीत: प्रीतेन मनसा तत्रैवान्तरधीयत,नारदजी कहते हैं--युधिष्ठि!र![ ऐसा कहकर भीष्मजीकी अनुमति ले संतुष्ट हुए भगवान् पुलस्त्य मुनि प्रसन्नमनसे वहीं अन्तर्धान हो गये
nārada uvāca | evam uktvābhyanujñāya pulastyo bhagavān ṛṣiḥ | prītaḥ prītena manasā tatraivāntaradhīyata ||
那罗陀说道:“说罢此言,得毗湿摩允诺而告辞后,具福德的圣仙普拉斯提亚——心怀欢喜而澄然——就在那处当即隐没不见。”
नारद उवाच
Spiritual instruction is framed by humility and proper conduct: one should seek and grant leave respectfully (abhyanujñāya), and the fruit of dharmic counsel is inner contentment (prītaḥ) rather than outward spectacle.
After delivering his guidance, the sage Pulastya formally takes Bhishma’s permission to depart and then disappears on the spot, while Narada narrates this conclusion of the encounter.