Arjuna’s Himalayan Departure and the Commencement of Severe Tapas
Janamejaya’s Inquiry; Sages Approach Śiva
परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रीतात्मा भगवान् हर: । पुन: पार्थ सान्त्वपूर्वमुवाच वृषभध्वज:,फिर उन्हें दोनों भुजाओंसे खींचकर हृदयसे लगाया और प्रसन्नचित्त हो वृषके चिह्नसे अंकितध्वजा धारण करनेवाले भगवान् रुद्रने पुनः कुन्तीकुमारको सान्त्वना देते हुए कहा
随后,心怀欢喜的圣者哈罗(鲁陀罗)以双臂拥抱阿周那,将他紧紧揽入胸前。那位以公牛为旗记的主宰又以安慰之辞,对昆蒂之子再次开口。
वैशम्पायन उवाच