Indrajit’s Binding, Restoration by Viśalyā, and Counsel Restraining Rāvaṇa (Āraṇyaka Parva 273)
वरं चास्मै ददौ देव: स जग्राह च तच्छूणु । समस्तान् सरथान् पज्च जयेयं युधि पाण्डवान्,जनमेजय! भगवानने उसे वर दिया और जयद्रथने उसको ग्रहण किया। वह वर क्या था? यह बताता हूँ, सुनो--“मैं रथसहित पाँचों पाण्डवोंको युद्धमें जीत लूँ”. यही वर सिन्धुराजने महादेवजीसे माँगा। परंतु महादेवजीने उससे कहा--'ऐसा नहीं हो सकता। पाण्डव अजेय और अवध्य हैं। तुम केवल एक दिन युद्धमें महाबाहु अर्जुनको छोड़कर अन्य चार पाण्डवोंको आगे बढ़नेसे रोक सकते हो। देवेश्वर नर, जो बदरिकाश्रममें भगवान् नारायणके साथ रहकर तपस्या करते हैं, वे ही अर्जुन हैं
varaṃ cāsmai dadau devaḥ sa jagrāha ca tac chṛṇu | samastān sarathān pañca jayeyam yudhi pāṇḍavān, janamejaya |
毗摩塞那说道:“神赐他一愿,他亦领受——且听我言,阇那弥阇耶:‘愿我在战场上连同战车一并击败五位般度子。’此乃信度之王向大天所求。然而大天宣示:此愿不可尽许,因为般度子不可战胜,亦不可被杀。至多仅一日,阇耶陀罗陀能阻遏除大臂阿周那之外的其余四位般度子的进军;而阿周那正是名为那罗的天界圣者,与那罗延同住于跋陀梨迦修院而修苦行者。”
भीमसेन उवाच