ब्राह्मणानुयात्रा—शौनकोपदेशः
Brāhmaṇas Follow into Exile and Śaunaka’s Instruction
अर्थ एव हि केषांचिदनर्थ भजते नृणाम् | अर्थश्रेयसि चासक्तो न श्रेयो विन्दते नर:,“कितने ही मनुष्योंके लिये अर्थ ही अनर्थका कारण बन जाता है; क्योंकि अर्थद्वारा सिद्ध होनेवाले श्रेय (सांसारिक भोग)-में आसक्त मनुष्य वास्तविक कल्याणको नहीं प्राप्त होता
对有些人而言,财富本身反而成了祸患之因。因为沉溺于由财富所成就的所谓“善利(śreyas)”——世间享乐——的人,终究得不到真正的福祉。
वैशम्पायन उवाच