अध्याय १९० — वामदेव-वाम्य-वृत्तान्तः
The Vāmadeva Horses Episode and the Ethics of Promise
शमन सर्वभूतानां सर्वलोककृतोद्यमम् | एवं प्रणिहित: सम्यड् ममात्मा मुनिसत्तम | सर्वभूतेषु विप्रेन्द्र न च मां वेत्ति कश्चन,मैं तीनों लोकोंमें व्याप्त, सम्पूर्ण विश्वका आत्मा, सब लोगोंको सुख पहुँचानेवाला, सबकी उत्पत्तिका कारण, सर्वव्यापी, अनन्त, इन्द्रियोंका नियन्ता और महान् विक्रमशाली हूँ। ब्रह्म! यह जो सम्पूर्ण भूतोंका संहार करनेवाला और सबको उद्योगशील बनानेवाला अव्यक्त कालचक्र है, इसका संचालन केवल मैं ही करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मेरा स्वरूपभूत आत्मा ही सर्वत्र सब प्राणियोंके भीतर भलीभाँति स्थित है। विप्रवर! इतनेपर भी मुझे कोई जानता नहीं है
śamanaḥ sarvabhūtānāṁ sarvalokakṛtodyamam | evaṁ praṇihitaḥ samyaṅ mama ātmā munisattama | sarvabhūteṣu viprendra na ca māṁ vetti kaścana ||
神祇说道:“我能安抚并制御一切众生,也使诸世界兴起作为。最胜牟尼啊,如是我之自我正当而坚固地安立于一切处。然则,最上婆罗门啊,纵我住于一切众生之内,仍无人真正识我。”
देव उवाच