Kailāsa-darśana, Badarī-vāsa, and Sarasvatī–Dvaitavana Transition (कैलासदर्शन–बदरीवास–सरस्वतीद्वैतवनगमनम्)
लेलिहानैर्महानागै: कृतचीरममित्रहन् (भक्तानुकम्पिनं देवं नागयज्ञोपवीतिनम् ।) विभीस्ततस्तदस्त्र॑ तु घोरं रौद्रं सनातनम्,शत्रुदमन नरेश! लपलपाती जीभवाले बड़े-बड़े नाग उन दिव्य पुरुषके लिये चीर (वस्त्र) बने हुए थे। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले उन महादेवजीने सर्पोंका ही यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उनके दर्शनसे मेरा सारा भय जाता रहा। भरतश्रेष्ठ! फिर तो मैंने उस भयंकर एवं सनातन पाशुपतास्त्रको गाण्डीव धनुषपर संयोजित करके अमित तेजस्वी त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरको नमस्कार किया और उन दाननवेन्द्रोंके विनाशके लिये उनपर चला दिया। उस अस्त्रके छूटते ही उससे सहस्रों रूप प्रकट हो गये
lelihānaiḥ mahānāgaiḥ kṛtacīram amitrahan (bhaktānukampinaṃ devaṃ nāgayajñopavītinam) vibhīḥ tataḥ tad astraṃ tu ghoraṃ raudraṃ sanātanam, śatrudamana nareśa!
阿周那说:「噢,灭敌者!那位神圣的主以巨蛇为衣,蛇舌闪烁,宛如衣袍;又因怜悯信徒,神以蛇为圣线(yajñopavīta)佩于身。见其真容,我心中一切恐惧尽皆消散。于是,噢,制敌之王!我将那可怖而永恒、由鲁陀罗所生的帕舒帕塔(Pāśupata)神兵装上甘狄瓦(Gāṇḍīva)之弓,并向光辉无量、三目之主商羯罗(Śaṅkara)稽首,然后为毁灭那些达那婆(Dānava)诸酋而放射。武器一离弦,便化现千般形相。」
अजुन उवाच