Bhāgīratha’s Tapas and the Petition to Gaṅgā (गङ्गावतरण-प्रसङ्गः)
रक्ष्यमाण: प्रयत्नेन तत्रैवान्तरधीयत । ततस्ते सागरास्तात हतं मत्वा हयोत्तमम्,(ससमुद्रवनद्वीपां विचरन्तो वसुन्धराम् ।) राजन्! उनका यज्ञिय अश्व उनके अत्यन्त उत्साही सभी पुत्रोंद्वारा सुरक्षित हो स्वच्छन्दगतिसे पृथ्वीपर विचरने लगा। जब वह अश्व भयंकर दिखायी देनेवाले जलशून्य समुद्रके तटपर आया, तब प्रयत्नपूर्वक रक्षित होनेपर भी वहाँ सहसा अदृश्य हो गया। तात! तब उस उत्तम अश्वको अपहृत जानकर सगरपुत्रोंने पिताके पास आकर कहा--/हमारे यज्ञिय अश्वको किसीने चुरा लिया, अब वह दिखायी नहीं देता।/ यह सुनकर राजा सगरने कहा--“तुम सब लोग समुद्र, वन और द्वीपोंसहित सारी पृथ्वीपर विचरते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें जाकर उस अश्वका पता लगाओ”
rakṣyamāṇaḥ prayatnena tatraivāntaradhīyata | tataste sāgarāstāte hataṃ matvā hayottamam || (sa-samudra-vanadvīpāṃ vicaranto vasundharām) ||
尽管竭尽全力守护,那匹祭祀之马仍在原地骤然隐没无踪。于是,亲爱的啊,娑伽罗之子们以为那上等骏马已被夺走,便出发遍行大地——连同海洋、森林与诸岛——向四方搜寻。此事彰显君王守护已受祝圣之仪轨完整无缺的责任,也彰显诸子在神圣托付似遭侵犯之时,须以勤勉奉行父命的义务。
लोगश उवाच