अदारा-नीति
Crisis Composure) and ‘Jaya’ Śravaṇa (Morale-Instruction
महावेग इवोद्धूतो मातरिश्वा बलाहकान् । तुझे यहाँ अभीष्ट पुरुषार्थ प्रकट करना चाहिये। जो लोग सिन्धुराजपर कुपित हों, जिनके मनमें धनका लोभ हो, जो सिन्धुनरेशके आक्रमणसे सर्वथा क्षीण हो गये हों, जिन्हें अपने बल और पौरुषपर गर्व हो तथा जो तेरे शत्रुओंद्वारा अपमानित हों उनसे बदला लेनेके लिये होड़ लगाये बैठे हों, उन सबको तू सावधान होकर दान-मानके द्वारा अपने पक्षमें कर ले। इस प्रकार तू बड़े-से-बड़े समुदायको फोड़ लेगा। ठीक उसी तरह, जैसे महान् वेगशाली वायु वेगपूर्वक उठकर बादलोंको छिलन्न-भिन्न कर देती है || ३३-३४ ह ।। तेषामग्रप्रदायी स्या: कल्योत्थायी प्रियंवद:
mahāvega ivoddhūto mātariśvā balāhakān | teṣām agrapradāyī syāḥ kalyotthāyī priyaṃvadaḥ ||
儿子说道:“正如大风被激起而疾驰,驱散并撕裂云团;你如今也当显现你所期望的有目的之奋发(purushārtha)。当以馈赠、礼遇与谨慎周全之关照,去收揽:那些对信度之王怀怒者,那些心为财利所牵者,那些因信度君主的侵袭而疲敝者,那些自矜其力与雄勇者,以及那些因你之仇敌所加侮辱而急欲复仇者。以此明智的施与,你将能分裂即便最庞大的同盟,犹如迅疾而强劲的风将云海击碎。”
पुत्र उवाच