Vṛtra’s Cosmic Threat, Viṣṇu’s Upāya, and the Conditional Vulnerability
Udyoga-parva 10
भूमि: प्रध्वस्तसंकाशा निर्वुक्षा शुष्ककानना | विच्छिन्नस्रोतसो नद्य: सरांस्यनुदकानि च,वे जलमें विचरनेवाले सर्पकी भाँति पानीमें ही छिपकर रहने लगे। ब्रह्महत्याके भयसे पीड़ित होकर जब देवराज इन्द्र अदृश्य हो गये, तब यह पृथ्वी नष्ट-सी हो गयी। यहाँके वृक्ष उजड़ गये, जंगल सूख गये, नदियोंका स्रोत छिन्न-भिन्न हो गया और सरोवरोंका जल सूख गया
bhūmiḥ pradhvastasaṅkāśā nirvṛkṣā śuṣkakānanā | vicchinnasrotaso nadyaḥ sarāṃsy anudakāni ca ||
沙利耶说道:当因惧怕「梵杀罪」(brahmahatyā)而备受煎熬的因陀罗隐没不见时,大地仿佛也随之败坏。树木被剥落殆尽,森林枯槁,江河的水势断裂散乱,湖泊亦成无水之地。
शल्य उवाच