Bhīṣma’s Śara-śayyā Stuti to Vāsudeva and Yogic Preparation for Dehotsarga
Body-Relinquishment
(वैद्युतो जाठरश्वैव पावक: शुचिरेव च । दहन: सर्वभक्षाणां तस्मै वल्लयात्मने नमः ||) जो मेघमें विद्युत् और उदरमें जठरानलके रूपमें स्थित हैं, जो सबको पवित्र करनेके कारण पावक तथा स्वरूपत: शुद्ध होनेसे 'शुचि” कहलाते हैं, समस्त भक्ष्य पदार्थोंको दग्ध करनेवाले वे अग्निदेव जिनके ही स्वरूप हैं, उन अग्निमय परमात्माको नमस्कार है ।। विषये वर्तमानानां यं॑ ते वैशेषिकैर्गुणै: । प्राहुर्विषयगोप्तारं तस्मै गोप्ञात्मने नम:,वैशेषिक दर्शनमें बताये हुए रूप, रस आदि गुणोंके द्वारा आकृष्ट हो जो लोग विषयोंके सेवनमें प्रवृत्त हो रहे हैं, उनकी उन विषयोंकी आसक्तिसे जो रक्षा करनेवाले हैं, उन रक्षकरूप परमात्माको प्रणाम है
vaidyuto jāṭharaś caiva pāvakaḥ śucir eva ca | dahanaḥ sarvabhakṣāṇāṃ tasmai vahnayātmane namaḥ || viṣaye vartamānānāṃ yaṃ te vaiśeṣikair guṇaiḥ | prāhur viṣayagoptāraṃ tasmai goptṛātmane namaḥ ||
毗湿摩曰:我礼敬那至上之我,其形即火——在云中为闪电,在腹中为消化之火;称为“净化者”(Pāvaka),以其能净化一切;称为“清净者”(Śuci),以其自性本净;为焚烧吞噬一切饮食与供献之烈焰。我又礼敬那至上之我,为诸境之护持者:当人们被胜论派所说的种种别相之德——色、味等——所牵引而趋向享受时,彼被宣说为守护者,能救人脱离对诸境的系缚。
भीष्म उवाच