Bhīṣma’s Śara-śayyā Stuti to Vāsudeva and Yogic Preparation for Dehotsarga
Body-Relinquishment
यमेकं बहुधा55त्मानं प्रादुर्भूतमधोक्षजम् । नान्यभक्ता: क्रियावन्तो यजन्ते सर्वकामदम्,जो एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं, जो इन्द्रियों और उनके विषयोंसे ऊपर उठे होनेके कारण “अधोक्षज” कहलाते हैं, उपासकोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, यज्ञादि कर्म और पूजनमें लगे हुए अनन्य भक्त जिनका यजन करते हैं, जिन्हें जगत्का कोषागार कहा जाता है, जिनमें सम्पूर्ण प्रजाएँ स्थित हैं, पानीके ऊपर तैरनेवाले जलपक्षियोंकी तरह जिनके ही ऊपर इस सम्पूर्ण जगतकी चेष्टाएँ हो रही हैं, जो परमार्थ सत्यस्वरूप और एकारक्षर ब्रह्म (प्रणव) हैं, सत् और असत्से विलक्षण हैं, जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जिन्हें न देवता ठीक-ठीक जानते हैं और न ऋषि, अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सम्पूर्ण देवता, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि, बड़े-बड़े नागगण जिनकी सदा पूजा किया करते हैं, जो दुःखरूपी रोगकी सबसे बड़ी ओषधि हैं, जन्म- मरणसे रहित, स्वयम्भू एवं सनातन देवता हैं, जिन्हें इन चर्म-चक्षुओंसे देखना और बुद्धिके द्वारा सम्पूर्णरूपसे जानना असम्भव है, उन भगवान् श्रीहरि नारायण देवकी मैं शरण लेता हूँ
yam ekaṁ bahudhā ātmānaṁ prādurbhūtam adhokṣajam | nānyabhaktāḥ kriyāvanto yajante sarvakāmadam ||
毗湿摩说道:“彼虽为一,却现多种形相——超越诸根境界、故名‘阿多克沙阇’(Adhokṣaja)之至上者。彼能圆满一切愿求;诸信徒以祭祀与奉爱之行,专一不二而敬拜于彼。”
भीष्म उवाच