Śarīrin, Buddhi, and the Limits of Sense-Perception (इन्द्रियबुद्धिशरीरिविचारः)
नावर्तन्ते पुनः पार्थ मुक्ता: संसारदोषत: । जन्मदोषपरिक्षीणा: स्वभावे पर्यवस्थिता:,कुन्तीनन्दन! वे संसारके काम, क्रोध आदि दोषोंसे मुक्त तथा जन्मसम्बन्धी दोषसे शून्य होकर परमात्माके स्वरूपमें स्थित हो जाते हैं, इसलिये पुनः इस संसारमें उन्हें नहीं लौटना पड़ता
毗湿摩说:“昆蒂之子啊,已得解脱者不再回转,因为他们已脱离轮回(saṃsāra)之过患。与生而俱来的诸缺失既已消尽,他们便安住于自性,住于至上我(Paramātman)的本体之中;因此不必再返此世。”
भीष्म उवाच