Adhyaya 9
Shalya ParvaAdhyaya 947 Versesपाण्डवों के पक्ष में तीव्र झुकाव; कौरव-चमू भग्न होकर पलायन करती है।

Adhyaya 9

Nakula’s Engagement with Citra-sena and Karṇa’s Sons; Śalya Re-stabilizes the Kaurava Host

Upa-parva: Śalya-senāpatya and the Nakula–Citra-sena Engagement (Context Unit)

Saṃjaya reports a tactical moment where the Madra king Śalya, observing disrupted forces, orders his charioteer to drive rapidly toward Yudhiṣṭhira, asserting that the Pāṇḍavas cannot hold before him. Śalya checks the Pāṇḍava surge “like a shoreline holding the sea,” prompting Kaurava elements to re-form. Within this broader stabilization, Nakula confronts Citra-sena in a sustained exchange of arrows and chariot-skill. Citra-sena severs Nakula’s bow and strikes him; Nakula dismounts, advances with sword and shield, then mounts the enemy chariot and decisively kills Citra-sena, eliciting battlefield acclaim. Karṇa’s sons, Satyasena and Suṣeṇa, respond with coordinated assault; Nakula withstands volleys, changes weapons and platform (aided by Sutasoma’s chariot), and escalates with high-lethality strikes: Satyasena is killed by a ratha-śakti to the heart, and Suṣeṇa is beheaded by an ardha-candra arrow. The Kaurava host briefly panics, but Śalya, as senāpati, reorders the vāhinī, issues a lion-roar and bow-sound display, and the armies re-engage in a renewed, large-scale, mutually destructive battle marked by confusion of directions and formations.

Chapter Arc: शल्यपर्व के इस नवम अध्याय में चारों अंगों वाली सेनाएँ—पैदल, रथ, गज और अश्व—एक-दूसरे पर टूट पड़ती हैं; पराक्रम का गर्जन ऐसा कि धरती और आकाश दोनों काँप उठें। → हाथियों की भीमकाय चाल से उठता नि:स्वन मेघ-गर्जना-सा फैलता है; रथों की टक्कर, घोड़ों की दौड़ और पैदल दलों की चीख-पुकार मिलकर युद्ध को देवासुर-संग्राम की छाया दे देती है। रणभूमि में कटे धड़ (कबन्ध), छत्र-चँवर और अस्त्र-शस्त्र ऐसे बिखरते हैं मानो पुष्पों से भरा कोई वन उलटकर रक्त में डूब गया हो। → पाण्डवों के बाण-वर्ष से कौरव-चमू बारंबार घायल होकर टूटती है; रक्त की ‘नदी’ बह निकलती है—भुजाएँ चक्र, धनुष धारा, हाथी शैल, घोड़े कंकड़—और वह नदी मानो परलोक की ओर बहती हुई समरभूमि को श्मशान-तीर्थ बना देती है। → घायल और भग्न कौरव-सैनिक विजय की आकांक्षा छोड़ आत्म-रक्षा के लिए भागते हैं; वे युद्ध में प्रिय पुत्रों, भ्राताओं, पितामहों, मातुलों और भागिनेयों को छोड़कर इधर-उधर पलायन करते हैं, और पाण्डव-विजय का घोष रणक्षेत्र पर छा जाता है। → कौरव-सेना के इस पलायन के बाद अगला प्रश्न तीखा हो उठता है—कौन उन्हें रोकेगा, कौन पुनः मोर्चा बाँधेगा, और यह भग्न धारा किस नए संहार की ओर मुड़ेगी?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल ४५३६ “लोक हैं।) &- “&<-- ध्य £#:.१#>् नवमो<्ध्याय: उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध और कौरव- सेनाका पलायन संजय उवाच ततः: प्रववृते युद्ध कुरूणां भयवर्धनम्‌ । सृञ्जयै: सह राजेन्द्र घोरं देवासुरोपमम्‌,संजय कहते हैं--राजेन्द्र! तदनन्तर कौरवोंका सूंजयोंके साथ घोर युद्ध आरम्भ हो गया, जो देवासुर-संग्रामके समान भय बढ़ानेवाला था

三阇耶说道:“大王啊,此后俱卢与斯林阇耶之间爆发了一场可怖的大战——它使恐惧倍增,宛如天神与阿修罗之间那般骇人的战争。”

Verse 2

नरा रथा गजौघाश्न सादिनश्ष सहस्रश: । वाजिनश्न पराक्रान्ता: समाजग्मु: परस्परम्‌,पैदल, रथी, हाथीसवार तथा सहमसौ्रों घुड़सवार पराक्रम दिखाते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये

三阇耶说道:步兵、战车武士、成群的战象,以及数千骑兵——各显勇武——彼此逼近,随即猛烈相撞,厮杀成团。

Verse 3

गजानां भीमरूपाणां द्रवतां नि:ःस्वनो महान्‌ | अश्रूयत यथा काले जलदानां नभस्तले

三阇耶说道:“战象冲锋之时,响起一阵巨大而骇人的咆哮——如同雨季里云雷在长空轰鸣。”

Verse 4

जैसे वर्षाकालके आकाशमें मेघोंकी गम्भीर गर्जना होती रहती है, उसी प्रकार रणभूमिमें दौड़ लगाते हुए भीमकाय गजराजोंका महान्‌ कोलाहल सुनायी देने लगा ।। नागैरभ्याहता: केचित्‌ सरथा रथिनो5पतन्‌ । व्यद्रवन्त रणे वीरा द्राव्यमाणा मदोत्कटै:,मदोन्मत्त हाथियोंके आघातसे कितने ही रथी रथसहित धरतीपर लोट गये। बहुत-से वीर उनसे खदेड़े जाकर इधर-उधर भागने लगे

三阇耶说道:“正如雨季之时,苍穹不断回荡着云层深沉的轰鸣;战场之上亦然,巨大的战象王奔突冲撞,激起滔天喧嚣。被那些战象击中,有些战车武士连同战车一并翻落尘土;又有许多勇士,被发情而狂暴的战象逼退,遂在厮杀中四散奔逃。”

Verse 5

हयौघान्‌ पादरक्षांश्न रथिनस्तत्र शिक्षिता: । शरै: सम्प्रेषयामासु: परलोकाय भारत,भारत! उस युद्धस्थलमें शिक्षाप्राप्त रथियोंने घुड़सवारों तथा पादरक्षकोंको अपने बाणोंसे मारकर यमलोक भेज दिया

三阇耶说道:“婆罗多啊,就在那战场上,训练精熟的战车武士以箭矢射杀成群的骑兵与步卒护卫,将他们送往来世。”

Verse 6

सादिन: शिक्षिता राजन्‌ परिवार्य महारथान्‌ | विचरन्तो रणे<भ्यघ्नन्‌ प्रासशक्त्यृष्टिभिस्तथा,राजन! रणभूमिमें विचरते हुए बहुत-से सुशिक्षित घुड़सवार बड़े-बड़े रथोंको घेरकर उनपर प्रास, शक्ति तथा ऋष्टियोंका प्रहार करने लगे

三阇耶说道:“大王啊,那些训练精良的骑兵在战场上往来驰骋,合围诸位大车战士,以长矛、投枪与长枪反复刺击。”

Verse 7

धन्विन: पुरुषा: केचित्‌ परिवार्य महारथान्‌ । एकं बहव आसाद्य प्रययुर्यमसादनम्‌,कितने ही धनुर्धर पुरुष महारथियोंको घेर लेते और एक-एकपर बहुत-से योद्धा आक्रमण करके उसे यमलोक पहुँचा देते थे

三阇耶说道:“有些弓手合围大车战士,众人齐攻一人;以群起之势将其送上通往阎摩之境的道路。”

Verse 8

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वमें व्यू-निर्माणविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ,नागान्‌ रथवरांश्चवान्ये परिवार्य महारथा: । सान्तरायोधिन जष्नुर्द्रवमाणं महारथम्‌ अन्य महारथी कितने ही हाथियों और श्रेष्ठ रथियोंको घेर लेते और किसीकी ओठमें युद्ध करनेवाले भागते हुए महारथीको मार डालते थे

三阇耶说道:“随后,其他大勇士合围战象与最精锐的车战者;他们冲破夹杂其间的交战者,击杀了一名正在逃遁的摩诃车战士。”

Verse 9

तथा च रथिन क्रुद्धं विकिरन्तं शरान्‌ बहून्‌ । नागा जघ्नुर्महाराज परिवार्य समन्ततः,महाराज! कई हाथियोंने क्रोधपूर्वक बहुत-से बाणोंकी वर्षा करनेवाले किसी रथीको सब ओरसे घेरकर मार डाला इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे नवमोडध्याय:

三阇耶说道:“大王啊,随后数头暴怒的战象从四面合围一名车战士——他正狂怒地散射无数箭矢——并将其杀死。”

Verse 10

नागो नागमभिद्रुत्य रथी च रथिनं रणे । शक्तितोमरनाराचैरनिजपघ्ने तत्र भारत,भारत! वहाँ रणभूमिमें एक हाथीसवार दूसरे हाथीसवारपर और एक रथी दूसरे रथीपर आक्रमण करके शक्ति, तोमर और नाराचोंकी मारसे उसे यमलोक पहुँचा देता था

三阇耶说道:“婆罗多啊,在那战场上,象战士冲向象战士,车战士扑向车战士;他们以长矛、投枪与铁箭击倒敌手,将其送往阎摩之界。”

Verse 11

पादातानवमृद्नन्तो रथवारणवाजिन: । रणमध्ये व्यदृश्यन्त कुर्वन्तोी महदाकुलम्‌,समरांगणके बीच बहुत-से रथ, हाथी और घोड़े पैदल योद्धाओंको कुचलते तथा सबको अत्यन्त व्याकुल करते हुए दृष्टिगोचर होते थे

三阇耶说道:就在战阵中央,战车、战象与战马被看见践踏步兵,使战场陷入巨大的混乱——这正是战争碾压般的势头:强者的战斗机器压倒脆弱者,紊乱在军列间蔓延开来。

Verse 12

हयाशक्ष्‌ पर्यधावन्त चामरैरुपशोभिता: । हंसा हिमवत: प्रस्थे पिबन्त इव मेदिनीम्‌,जैसे हिमालयके शिखरकी चौरस भूमिपर रहनेवाले हंस नीचे पृथ्वीपर जल पीनेके लिये तीव्र गतिसे उड़ते हुए जाते हैं, उसी प्रकार चामरशोभित अश्व वहाँ सब ओर बड़े वेगसे दौड़ लगा रहे थे

三阇耶说道:那些以牦牛尾拂(旃摩罗)装饰的战马,向四方疾驰奔突——如同栖居在喜马拉雅广阔高原的天鹅,俯冲而下,仿佛要从大地饮水。此喻更添战场的华丽与急迫,显出武备的炫耀与迅疾的奔走,竟能遮蔽眼前杀伐所负的沉重伦理之重。

Verse 13

तेषां तु वाजिनां भूमि: खुरैश्षित्रा विशाम्पते । अशोभत यथा नारी करजै: क्षतविक्षता,प्रजानाथ! उन घोड़ोंकी टापोंसे खुदी हुई भूमि प्रियतमके नखोंसे क्षत-विक्षत हुई नारीके समान विचित्र शोभा धारण करती थी

三阇耶说道:噫,民之主啊!那大地被群马铁蹄刻出斑驳纹路、撕裂翻卷,竟显出一种诡异的美——如同女子之身被所爱之人的指甲抓挠,青紫交错。此喻更添诗中的道德张力:纵在战争暴烈之中,感官亦会误认“美”,提醒听者冲突如何扭曲寻常关于优雅与端正的尺度。

Verse 14

वाजिनां खुरशब्देन रथनेमिस्वनेन च । पत्तीनां चापि शब्देन नागानां बूृंहितेन च,भारत! घोड़ोंकी टापोंके शब्द, रथके पहियोंकी घर्घराहट, पैदल योद्धाओंके कोलाहल, हाथियोंकी गर्जना तथा वाद्योंके गम्भीर घोष और शंखोंकी ध्वनिसे प्रतिध्वनित हुई यह पृथ्वी वज्रपातकी आवाजसे गूँजती हुई-सी प्रतीत होती थी

三阇耶说道:“噫,婆罗多啊,大地仿佛被霹雳击中而轰然回响——马蹄的铿锵、战车轮的隆隆、步卒的喧哗,以及战象的长鸣咆哮,交相震荡。”

Verse 15

वादित्राणां च घोषेण शड्खानां निनदेन च | अभवन्नादिता भूमिर्निर्धातैिरिव भारत,भारत! घोड़ोंकी टापोंके शब्द, रथके पहियोंकी घर्घराहट, पैदल योद्धाओंके कोलाहल, हाथियोंकी गर्जना तथा वाद्योंके गम्भीर घोष और शंखोंकी ध्वनिसे प्रतिध्वनित हुई यह पृथ्वी वज्रपातकी आवाजसे गूँजती हुई-सी प्रतीत होती थी

三阇耶说道:婆罗多啊,战鼓与诸乐器发出深沉的轰鸣,海螺号角回声激荡,大地仿佛雷霆滚滚——震颤回响,恰似连番霹雳击落。此景写出战争机器以声势与蛮力压覆世界,也预示当军阵奔涌入战时,随之而来的道德重负与毁灭。

Verse 16

धनुषां कूजमानानां शस्त्रौघानां च दीप्यताम्‌ । कवचानां प्रभाभिक्षु न प्राज्ञायत किउचन,टंकारते हुए धनुष, दमकते हुए अस्त्र-शस्त्रोंके समुदाय तथा कवचोंकी प्रभासे चकाचौंधके कारण कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था

三阇耶说道:“弓弦铮鸣,兵刃成群炽然闪耀,甲胄的光辉刺目夺神,以致目不能辨,竟无一物可看得分明。”

Verse 17

बहवो बाहवश्कछिन्ना नागराजकरोपमा: । उद्वेष्टन्ते विचेष्टन्ते वेगं कुर्वन्ति दारुणम्‌

三阇耶说道:许多被斩断的臂膀——宛如蛇王那雄伟的躯干——仍在扭动抽搐,余势骇人,仿佛还带着可怖的冲力。

Verse 18

हाथीकी सूँड़के समान बहुत-सी भुजाएँ कटकर धरती-पर उछलती, लोटती और भयंकर वेग प्रकट करती थीं ।। शिरसां च महाराज पततां धरणीतले । च्युतानामिव तालेभ्यस्तालानां श्रूयते स्वन:,महाराज! पृथ्वीपर गिरते हुए मस्तकोंका शब्द, ताड़के वृक्षोंसे चूकर गिरे हुए फलोंके धमाकेकी आवाजके समान सुनायी देता था

三阇耶说道:许多臂膀如象鼻般被斩落,在地上弹跳翻滚,仍显出可怖的猛势。大王啊,当无数头颅坠落尘土,其声如棕榈树上果实坠地的沉重闷响。

Verse 19

शिरोभि: पतितैर्भाति रुधिराद्रैर्वसुन्धरा । तपनीयनिभै: काले नलिनैरिव भारत,भारत! गिरे हुए रक्तरंजित मस्तकोंसे इस पृथ्वीकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो वहाँ सुवर्णमय कमल बिछाये गये हों

三阇耶说道:婆罗多啊,大地因血浸的断首而闪耀;在那幽暗时刻,竟仿佛金色莲华散落遍地。

Verse 20

उद्वृत्तनयनैस्तैस्तु गतसच्त्वै: सुविक्षतै: । व्यभ्राजत मही राजन्‌ पुण्डरीकैरिवावृता

三阇耶说道:大王啊,大地熠熠生辉,仿佛铺满白莲——那是因那些双目上翻、气息已绝、重创倒卧之人而然。

Verse 21

राजन! खुले नेत्रोंवाले प्राणशून्य घायल मस्तकोंसे ढकी हुई पृथ्वी लाल कमलोंसे आच्छादित हुई-सी शोभा पाती थी ।। बाहुभि श्वन्दनादिग्धै: सकेयूरैर्महा धनैः । पतितैर्भाति राजेन्द्र महाशक्रध्वजैरिव,राजेन्द्र! बाजूबंद तथा दूसरे बहुमूल्य आभूषणोंसे विभूषित, चन्दनचर्चित भुजाएँ कटकर पृथ्वीपर गिरी थीं, जो महान्‌ इन्द्रध्वजके समान जान पड़ती थीं। उनके द्वारा रणभूमिकी अपूर्व शोभा हो रही थी

三阇耶说道:大王啊,战场上光影森然,遍地皆是被斩落的臂膀——涂着檀香膏,仍佩臂钏与珍贵饰物——倒伏尘土之上,宛如因陀罗高耸的旗杆。于这惨烈景象中,财富与雅致的标记反成毁灭的徽记,显出战争如何颠覆世间荣华,将骄矜化作无生命的陈列。

Verse 22

ऊरुभिश्न नरेन्द्राणां विनिकृत्तैर्महाहवे । हस्तिहस्तोपमैरन्यै: संवृतं तद्‌ रणाड्रणम्‌,उस महासमरमें कटी हुई नरेशोंकी जाँघें हाथीकी सूँड़ोंके समान प्रतीत होती थीं। उनके द्वारा वह सारा समरांगण पट गया था

三阇耶说道:在那场大决战中,战场被诸王被斩断的腿股所覆盖——有的宛如象鼻——以致整个战阵之地仿佛被堵塞、被那可怖残骸所充斥。此描写凸显刹帝利争斗的惨重代价,以及失控暴力之后阴冷而去人性的余波。

Verse 23

कबन्धशतसंकीर्ण छत्रचामरसंकुलम्‌ । सेनावनं तच्छुशुभे वन॑ पुष्पाचितं यथा

三阇耶说道:那“军阵之林”挤满了成百无首之躯,又遍布华盖与牦牛尾拂尘,竟显出一种诡异的华美——仿佛林间撒满繁花。此偈凸显战争的冷酷反讽:纵在屠戮之中,王者的仪仗与炫示也能使战场看似美丽,从而遮蔽其下的伦理恐怖。

Verse 24

वहाँ सैकड़ों कबन्ध सब ओर बिखरे पड़े थे। छत्र और चँवर भरे हुए थे। उन सबसे वह सेनारूपी वन फूलोंसे व्याप्त हुए विशाल विपिनके समान सुशोभित होता था ।। तत्र योधा महाराज विचरन्तो हाभीतवत्‌ । दृश्यन्ते रुधिराक्ताज़: पुष्पिता इव किंशुका:,महाराज! वहाँ खूनसे लथपथ शरीर लेकर निर्भय-से विचरनेवाले योद्धा फूले हुए पलाशवृक्षोंके समान दिखायी देते थे

三阇耶说道:“大王啊,在那里,武士们往来行走,仿佛毫无惧色。他们的身躯血迹斑斑,宛如盛放的金舒迦树(kiṃśuka,亦名帕拉沙)。 ”此喻更添战场的伦理张力:远望似“美”的,实则是暴力可怖的开花——勇猛与麻木在苦难之中并存。

Verse 25

मातड्ढाश्चाप्यदृश्यन्त शरतोमरपीडिता: । पतन्तस्तत्र तत्रैव छिन्ना भ्रसदृशा रणे,रणभूमिमें बाणों और तोमरोंकी मारसे पीड़ित हो जहाँ-तहाँ गिरते हुए मतवाले हाथी भी कटे हुए बादलोंके समान दिखायी देते थे

三阇耶说道:就连狂怒的战象,受箭雨与投矛(tomara)所逼迫,也被看见在战场上此处彼处轰然倒下——支离破碎、散落四方,宛如被撕裂的云团。此景凸显战争残酷而不择对象的力量:纵是最强大的生灵,也在兵刃交击中化为废墟。

Verse 26

गजानीकं महाराज वध्यमानं महात्मभि: । व्यदीर्यत दिश: सर्वा वातनुन्ना घना इव,महाराज! वायुके वेगसे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समान महामनस्वी वीरोंके बाणोंसे घायल हुई गजसेना सम्पूर्ण दिशाओंमें विदीर्ण हो रही थी

三阇耶说道:大王啊,那象军被大心勇士所击杀,四方溃裂、分崩离散——犹如云团为狂风驱赶,以风势撕碎破散。

Verse 27

ते गजा घनसंकाशा: पेतुरुव्या समन्ततः । वज़नुन्ना इव बभु: पर्वता युगसंक्षये

三阇耶说道:那些大象黑沉雄伟,如暴云一般,四面八方倒毙于大地。仿佛被因陀罗的金刚杵击中,它们看起来如同劫末之时群山崩塌。

Verse 28

मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होनेवाले हाथी चारों ओरसे पृथ्वीपर पड़े थे, जो प्रलयकालमें वज्ञ़के आघातसे विदीर्ण होकर गिरे हुए पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ।। हयानां सादिदश्नि: सार्थ पतितानां महीतले । राशय: सम प्रदृश्यन्ते गिरिमात्रास्ततस्ततः,सवारोंसहित धरतीपर गिरे हुए घोड़ोंके पहाड़ों-जैसे ढेर यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होते थे

三阇耶说道:大象横陈四野,遍布大地,倒下的身躯宛如厚重云团——又如劫毁之时被金刚杵劈裂而坠落的群山。又见此处彼处,战马连同骑者一并倒毙,堆积如丘陵一般。

Verse 29

संजज्ञे रणभूमौ तु परलोकवहा नदी । शोणितोदा रथावर्ता ध्वजवृक्षास्थिशर्करा,उस समय रणभूमिमें एक रक्तकी नदी बह चली, जो परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली थी। रक्त ही उसका जल था, रथ भँवरके समान प्रतीत होते थे, ध्वज तटवर्ती वृक्षेके समान जान पड़ते थे, हड्डियाँ कंकड़-पत्थरोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं, कटी हुई भुजाएँ नाकोंके समान दिखायी देती थीं, धनुष उसके स्रोत थे, हाथी पार्श्ववर्ती पर्वत और घोड़े प्रस्तर-खण्डके तुल्य थे, मेदा और मज्जा ये ही उसके पंक थे, छत्र हंस थे, गदाएँ नौका जान पड़ती थीं, कवच और पगड़ी आदि वस्तुएँ सेवारके समान उस नदीके जलको आच्छादित किये हुए थीं, पताकाएँ सुन्दर वृक्ष-सी दिखायी देती थीं, चक्र (पहिये) चक्रवाकोंके समूहकी भाँति उस नदीका सेवन करते थे और त्रिवेणुरूपी सर्प उसमें भरे हुए थे

三阇耶说道:在那战场上,竟涌起一条河,载着众生奔向彼世。其水为血;战车成其漩涡;旌旗如岸边之树;白骨散落,似砂砾石块——这不祥的景象,将战争描绘成一股洪流,把倒下者卷向死亡与来世。

Verse 30

भुजनक्रा धनु:स्रोता हस्तिशैला हयोपला । मेदोमज्जाकर्दमिनी छत्रहंसा गदोडुपा,उस समय रणभूमिमें एक रक्तकी नदी बह चली, जो परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली थी। रक्त ही उसका जल था, रथ भँवरके समान प्रतीत होते थे, ध्वज तटवर्ती वृक्षेके समान जान पड़ते थे, हड्डियाँ कंकड़-पत्थरोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं, कटी हुई भुजाएँ नाकोंके समान दिखायी देती थीं, धनुष उसके स्रोत थे, हाथी पार्श्ववर्ती पर्वत और घोड़े प्रस्तर-खण्डके तुल्य थे, मेदा और मज्जा ये ही उसके पंक थे, छत्र हंस थे, गदाएँ नौका जान पड़ती थीं, कवच और पगड़ी आदि वस्तुएँ सेवारके समान उस नदीके जलको आच्छादित किये हुए थीं, पताकाएँ सुन्दर वृक्ष-सी दिखायी देती थीं, चक्र (पहिये) चक्रवाकोंके समूहकी भाँति उस नदीका सेवन करते थे और त्रिवेणुरूपी सर्प उसमें भरे हुए थे

三阇耶说道:那时,战场上涌出一条血河,仿佛奔流向彼世。血为其水;战车如漩涡;旌旗似岸树。白骨如卵石砂砾;断臂如芦苇。弓为支流;大象如两岸之山,战马如巨石。脂肪与骨髓成其淤泥;华盖如天鹅;铁锤(伽陀)如舟。屠戮遂被描作一场可怖的渡越。

Verse 31

कवचोष्णीषसंछज्ञा पताकारुचिरद्रुमा । चक्रचक्रावलीजुष्टा त्रिवेणूरगसंवृता,उस समय रणभूमिमें एक रक्तकी नदी बह चली, जो परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली थी। रक्त ही उसका जल था, रथ भँवरके समान प्रतीत होते थे, ध्वज तटवर्ती वृक्षेके समान जान पड़ते थे, हड्डियाँ कंकड़-पत्थरोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं, कटी हुई भुजाएँ नाकोंके समान दिखायी देती थीं, धनुष उसके स्रोत थे, हाथी पार्श्ववर्ती पर्वत और घोड़े प्रस्तर-खण्डके तुल्य थे, मेदा और मज्जा ये ही उसके पंक थे, छत्र हंस थे, गदाएँ नौका जान पड़ती थीं, कवच और पगड़ी आदि वस्तुएँ सेवारके समान उस नदीके जलको आच्छादित किये हुए थीं, पताकाएँ सुन्दर वृक्ष-सी दिखायी देती थीं, चक्र (पहिये) चक्रवाकोंके समूहकी भाँति उस नदीका सेवन करते थे और त्रिवेणुरूपी सर्प उसमें भरे हुए थे

三阇耶说道:“于是,在那战场之上,一条血河开始奔流——仿佛直趋彼岸之世。其水皆血;战车如旋涡翻卷;旌旗如岸边林木森立;白骨似卵石与碎岩;断臂如蛇蜿蜒;弓为其支流;象如两岸之山峙立,马如散落巨石。脂与髓成其淤泥;华盖如天鹅浮游其上;铁锤巨棒(伽陀)似舟楫。甲胄与头巾覆其水面如苔藓;小旗光耀如佳木;成群车轮饮其血流,如成群的查克拉瓦卡鸟(cakravāka);河中又充满名为‘特里韦努’的蛇。”

Verse 32

शूराणां हर्षजननी भीरूणां भयवर्धनी । प्रावर्तत नदी रौद्रा कुरुसूजजयसंकुला,वह भयंकर नदी शूरवीरोंके लिये हर्षजनक तथा कायरोंके लिये भय बढ़ानेवाली थी। कौरवों और सूंजयोंके समुदायसे वह व्याप्त हो रही थी

三阇耶说道:一条凶猛之河狂暴奔涌——使勇者欢悦,却令怯者恐惧倍增——其流中塞满了库鲁与苏尼迦耶诸军的尸阵与人潮。

Verse 33

तां नदीं परलोकाय वहन्तीमतिभैरवाम्‌ । तेरुर्वाहननौभिस्तै: शूरा: परिघबाहव:,परलोककी ओर ले जानेवाली उस अत्यन्त भयंकर नदीको परिघ-जैसी मोटी भुजाओंवाले शूरवीर योद्धा अपने-अपने वाहनरूपी नौकाओंद्वारा पार करते थे

三阇耶说道:那条极其可怖、载众生奔向彼岸之世的河,被英雄们跨越——他们臂力如巨棒——各自以自身的坐骑与车乘为舟,强行渡过。

Verse 34

वर्तमाने तदा युद्धे निर्मय्यादे विशाम्पते । चतुरड्डक्षये घोरे पूर्वदेवासुरोपमे,प्रजानाथ! परंतप! प्राचीन देवासुर-संग्रामके समान चतुरंगिणी सेनाका विनाश करनेवाला वह मर्यादाशून्य घोर युद्ध जब चलने लगा; तब भयसे पीड़ित हुए कितने ही सैनिक अपने बन्धु-बान्धवोंको पुकारने लगे और बहुत-से योद्धा प्रियजनोंके पुकारनेपर भी पीछे नहीं लौटते थे

三阇耶说道:“噢,民之主!当那场战斗展开之时——凶烈无度——摧毁四部军(步、马、车、象),宛如古昔天神与阿修罗之战;许多战士为恐惧所逼,呼唤亲族与同伴;然而也有许多斗士,即便听见至亲挚爱呼唤,亦不肯回身退却。”

Verse 35

व्याक्रोशन्‌ बान्धवानन्ये तत्र तत्र परंतप । कोशद्िर्दयितैरन्ये भयाता न निवर्तिरे,प्रजानाथ! परंतप! प्राचीन देवासुर-संग्रामके समान चतुरंगिणी सेनाका विनाश करनेवाला वह मर्यादाशून्य घोर युद्ध जब चलने लगा; तब भयसे पीड़ित हुए कितने ही सैनिक अपने बन्धु-बान्धवोंको पुकारने लगे और बहुत-से योद्धा प्रियजनोंके पुकारनेपर भी पीछे नहीं लौटते थे

三阇耶说道:“焚敌者啊,在那可怖的混乱之中,有人此处彼处呼号亲族;也有人虽被挚爱呼唤回身,却仍不回头——为恐惧所吞没。人之主啊,焚敌者啊!”

Verse 36

निर्मयदि तथा युद्धे वर्तमाने भयानके । अर्जुनो भीमसेनश्व मोहयांचक्रतु: परान्‌,इस प्रकार वह भयानक युद्ध सारी मर्यादाको तोड़कर चल रहा था। उस समय अर्जुन और भीमसेनने शत्रुओंको मूर्च्छित कर दिया था

三阇耶说道:当那可怖的战斗愈发激烈,仿佛抛却了一切克制与既定的战场规范之时,阿周那与毗摩塞那以无比的力量与技艺猛击敌军,使对方战士尽皆震骇昏眩,神志几乎尽失。

Verse 37

सा वध्यमाना महती सेना तव नराधिप । अमुह्दत्‌ तत्र तत्रैव योषिन्मदवशादिव

三阇耶说道:大王啊,当你的大军被不断斩杀之时,竟在战场上一次又一次陷入迷乱——如同被女色之醉所制的人一般,在屠戮之中失却镇定与清明的判断。

Verse 38

नरेश्वर! उनकी मार पड़नेसे आपकी विशाल सेना मदमत्त युवतीकी भाँति जहाँ-की- तहाँ बेहोश हो गयी ।। मोहयित्वा च तां सेनां भीमसेनधनंजयौ । दभ्मतुर्वारिजौ तत्र सिंहनादांश्व चक्रतु:,उस कौरव-सेनाको मूर्च्छिंत करके भीमसेन और अर्जुन शंख बजाने तथा सिंहनाद करने लगे

三阇耶说道:人中王啊,在他们的打击之下,你那浩大的军队如醉态的少女一般,处处昏倒。待毗摩塞那与檀那阇耶(阿周那)使那俱卢军陷入迷乱崩溃之后,便在彼处吹响海螺,发出狮子般的长啸。

Verse 39

श्रुत्वैव तु महाशब्दं धृष्टद्युम्न शिखण्डिनौ । धर्मराजं पुरस्कृत्य मद्रराजमभिद्रुती,उस महान्‌ शब्दको सुनते ही धृष्टद्युम्म और शिखण्डीने धर्मराज युधिष्ठिरको आगे करके मद्रराज शल्यपर धावा कर दिया

三阇耶说道:一听那震天巨响,德里什塔丢摩那与尸佉ṇḍin便以法王由提施提罗为前导,径直冲向摩陀罗之王——沙利耶。

Verse 40

तत्राक्षर्यमपश्याम घोररूप॑ विशाम्पते । शल्येन सड़ता: शूरा यदयुध्यन्त भागश:,प्रजानाथ! वहाँ हमने यह भयंकर आश्वर्यकी बात देखी कि पृथक्‌ू-पृथक्‌ दल बनाकर आये हुए सभी शूरवीर अकेले शल्यके साथ ही जूझते रहे

三阇耶说道:人民之主啊,在那里我们目睹了一桩可怖的奇事:诸位英雄虽分队而来,却轮番交战——每一位都独自与沙利耶对阵。

Verse 41

माद्रीपुत्रौ तु रभसौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ । अभ्ययातां त्वरायुक्तौ जिगीषन्तौ परंतप,शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! अस्त्रोंके ज्ञाता, रणदुर्मदर और वेगशाली वीर माद्रीकुमार नकुल-सहदेव विजयकी अभिलाषा लेकर बड़ी उतावलीके साथ राजा शल्यपर चढ़ आये

三阇耶说道:摩德丽的两位儿子——性情迅猛,武艺尽习,且为战阵之热所激而如醉——怀着求胜之心疾驰向前;噬敌如火的王啊,他们直冲而上,向沙利耶王发起冲击。

Verse 42

ततो न्यवर्तत बल॑ तावकं भरतर्षभ । शरै: प्रणुन्नं बहुधा पाण्डवैर्जितकाशिभि:

于是,婆罗多族中的雄牛啊,你方俱卢大军转而后退,被般度五子——以征服迦尸而著称的战士——的箭雨屡屡逼退、阻遏。

Verse 43

भरतश्रेष्ठी] विजयसे उललसित होनेवाले पाण्डवोंने अपने बाणोंकी मारसे आपकी सेनाको बारंबार घायल किया ।। वध्यमाना चमू: सा तु पुत्राणां प्रेक्षतां तव । भेजे दिशो महाराज प्रणुन्ना शरवृष्टिभि:,महाराज! इस प्रकार चोट सहती हुई वह सेना बाणोंकी वर्षसे क्षत-विक्षत हो आपके पुत्रोंके देखते-देखते सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चली

三阇耶说道:大王啊,在你诸子眼前,那支军队正被屠戮;在箭雨的逼迫下,伤痕累累、支离破碎,阵列崩散,向四面八方溃逃而去。

Verse 44

हाहाकारो महाउ्जज्ञे योधानां तव भारत । तिष्ठ तिछेति चाप्यासीद्‌ द्रावितानां महात्मनाम्‌,भरतनन्दन! वहाँ आपके योद्धाओंमें महान्‌ हाहाकार मच गया। भागे हुए योद्धाओंके पीछे महामनस्वी पाण्डव वीरोंकी “ठहरो, ठहरो' की आवाज सुनायी देने लगी

三阇耶说道:“婆罗多啊,你方战士中爆发出巨大的惊惶呼号。那些被驱逐而逃的人身后,又听见高魂的般度勇士呼喊:‘站住!站住!’”

Verse 45

क्षत्रियाणां तदान्योन्यं संयुगे जयमिच्छताम्‌ । प्राद्रवन्नेव सम्भग्ना: पाण्डवैस्तव सैनिका:,भारत! युद्धमें परस्पर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले क्षत्रियोंमेंसे पाण्डवोंद्वारा पराजित होकर आपके सैनिक युद्धमें अपने प्यारे पुत्रों, भाइयों, पितामहों, मामाओं, भानजों और मित्रोंको भी छोड़कर भाग गये

三阇耶说道:“于是,婆罗多啊,尽管战场上的刹帝利彼此都渴求胜利,你方士卒却被般度五子击溃、驱散,奔逃离开战场。”

Verse 46

त्यक्त्वा युद्धे प्रियान्‌ पुत्रान्‌ भ्रातनथ पितामहान्‌ । मातुलान्‌ भागिनेयांश्व वयस्थानपि भारत,भारत! युद्धमें परस्पर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले क्षत्रियोंमेंसे पाण्डवोंद्वारा पराजित होकर आपके सैनिक युद्धमें अपने प्यारे पुत्रों, भाइयों, पितामहों, मामाओं, भानजों और मित्रोंको भी छोड़कर भाग गये

三阇耶说道:在战场上,你的将士们——虽彼此争胜、渴望凯旋,却被般度之子们击溃——竟连心爱的儿子、兄弟、祖父、舅父、外甥与同伴也都抛下,仓皇奔逃。

Verse 47

हयान्‌ डद्विपांस्त्वरयन्तो योधा जग्मु: समन्ततः । आत्मत्राणकृतोत्साहास्तावका भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! अपनी रक्षामात्रके लिये उत्साह रखनेवाले आपके सैनिक घोड़ों और हाथियोंको तीव्र गतिसे हाँकते हुए सब ओर भाग चले

三阇耶说道:婆罗多族之雄啊,你的将士们只为自保而鼓起残余的勇气,急驱战马与战象,向四面八方溃逃而去。

Frequently Asked Questions

The tension lies between personal valor and collective responsibility: individual feats (duels, lethal counters) generate morale effects that can either stabilize or destabilize entire formations, making warrior duty inseparable from consequences for the wider host.

Agency is operational and immediate: disciplined adaptation—changing weapons, platforms, and tactics under pressure—can reverse disadvantage, while leadership presence can convert panic into renewed order.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the chapter’s significance is contextual, reinforcing late-war themes of morale, command, and the rapid karmic closure of actions within the battlefield frame.