Asita Devala Observes Jaigīṣavya’s Yogic Attainment and Chooses Mokṣa-dharma (देवल-जैगीषव्योपाख्यानम्)
अयजदू वाजपेयेन सो<श्वमेधशतेन च । प्रददौ दक्षिणां चैव पृथिवीं वै ससागराम्,जहाँ महातपस्वी भृगुवंशी महाभाग परशुरामजीने बारंबार क्षत्रियनरेशोंका संहार करके इस पृथ्वीको जीतनेके पश्चात् मुनिश्रेष्ठ कश्यपको आचार्यरूपसे आगे रखकर वाजपेय तथा एक सौ अभश्वमेध-यज्ञद्वारा भगवानका पूजन किया और दक्षिणारूपमें समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी दे दी
ayajad vājapeyena so 'śvamedha-śatena ca | pradadau dakṣiṇāṃ caiva pṛthivīṃ vai sa-sāgarām ||
毗舍波耶那说:他举行了婆阇佩耶祭,又行了一百次阿湿婆美陀大祭;并以达克希那(祭礼酬献)之名,赐与了被诸海环绕的整个大地。
वैशम्पायन उवाच