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Shloka 20

यत्कृते5हमिदं प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे । हतपत्यो हतसुता हतबन्धुजनप्रिया:,“जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट-लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे-सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी”

“正因他们的不义,我才落到今日这般境地。到了这第十四年,他们的妇人也将因丈夫、儿子与亲族被杀而伏在尸旁翻滚哀号。她们将血与尘裹满全身,披散长发,向至亲行洒水献别之礼(tilāñjali)——并如我今日一般,走入象城(哈斯提那补罗)。”

विदुर उवाच