नारदेन दिव्यसभाः कथितुं प्रतिज्ञा
Nārada’s Prelude to Describing the Divine Assemblies
देवैः पितृगणै: साध्यैर्यज्वभिर्नियतात्मभि: । जुष्टां मुनिगणै: शान्तैर्वेदयज्ञै: सदक्षिणै: । यदि ते श्रवणे बुद्धिर्वर्तते भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है। वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है। वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है
devaiḥ pitṛgaṇaiḥ sādhyair yajvabhir niyatātmabhiḥ | juṣṭāṁ munigaṇaiḥ śāntair vedayajñaiḥ sadakṣiṇaiḥ | yadi te śravaṇe buddhir vartate bharatarṣabha |
那罗陀说道:“那神圣的 सभा(会殿)为诸天、祖灵众与萨陀耶众所常至;亦为制心有律的行祭者与安寂的牟尼群所亲近。彼处吠陀祭祀,具足相称的布施(达克希那),恒常举行。婆罗多族中的雄牛啊,若你愿意聆听,我便为你详述。”
नारद उवाच