ततोडब्रवीन्मद्रराजो महात्मा दृष्टवा कर्ण प्रहितेषुं तमुग्रम् । न कर्ण ग्रीवामिषुरेष लप्स्यते समीक्ष्य संधत्स्व शरं शिरोध्रम्,उस समय महामनस्वी मद्रराज शल्यने कर्णको उस भयंकर बाणका प्रहार करनेके लिये उद्यत देख उससे कहा--'कर्ण! तुम्हारा यह बाण शत्रुके कण्ठमें नहीं लगेगा; अतः सोच-विचारकर फिरसे बाणका संधान करो, जिससे वह मस्तक काट सके”
tato ’bravīn madrarājo mahātmā dṛṣṭvā karṇa prahiteṣuṁ tam ugraṁ | na karṇa grīvām iṣur eṣa lapsyate samīkṣya sandhatsva śaraṁ śirodhram ||
三阇耶说道:这时,摩陀罗王舍利耶,大心之人,见迦尔纳正欲放出那支凶猛之箭,便说道:“迦尔纳,你这支箭不会中敌人的颈项。故当细察再定,重新校准——使你的箭矢直取其首,斩落头颅。”
संजय उवाच