Adhyāya 92: Irāvanta-śoka, punaḥ-pravṛttiḥ saṅgrāmasya
Arjuna’s grief and the battle’s renewed intensity
निवारय सुतान् द्यूतात् पाण्डवान् मा द्रुहेति च । सुहृदां हितकामानां ब्रुवतां तत् तदेव च,उन्होंने कहा था कि “आप अपने पुत्रोंको जूआ खेलनेसे रोकिये। पाण्डवोंसे द्रोह न कीजिये।” आपका हित चाहनेवाले अन्यान्य सुहृदोंने भी आपसे वे ही बातें कही थीं; परंतु जैसे मरणासन्न पुरुषको हितकारक ओषधि अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार आप उन हितकर वचनोंको सुनना भी नहीं चाहते थे। अतः श्रेष्ठ विदुरने जैसा बताया था, वैसा ही परिणाम आपके सामने आया है
nivāraya sutān dyūtāt pāṇḍavān mā druheti ca | suhṛdāṃ hitakāmānāṃ bruvatāṃ tat tadeva ca ||
三阇耶说道:“当约束你的儿子们远离赌戏;切莫对般度五子(Pāṇḍava)怀怨结仇。”那些真心为你谋福的亲友,也一再以同样的话劝谏你。可你不肯领受这等良言,正如将死之人厌弃救命的良药一般。因此,结局已如高贵的毗度罗(Vidura)所预言的那样,呈现在你面前。
संजय उवाच