
Brahmopadeśa: Ahiṃsā, Jñāna, and the Kṣetrajña–Sattva Analysis (Chapter 49)
Upa-parva: Anugītā Upākhyāna (Didactic Discourse Following the War)
Brahmā responds to a learned query, first establishing ahiṃsā as a foremost dharma-indicator and framing purified knowledge (śuddha-jñāna) as liberative from moral demerit. The discourse then contrasts harmful, delusion-driven dispositions with disciplined action performed either with desire for outcomes (āśīḥ) or with non-appropriative yoga (anāśīḥ-yoga). A technical exposition follows on the relation of subject and object: the enduring knower (kṣetrajña/puruṣa) versus the guṇa-constituted, changeful field (sattva). Multiple analogies (mosquito-udumbara, lamp in darkness, chariot path, boat crossing, lotus-leaf water) operationalize non-attachment: one may engage qualities without being ‘smeared’ by them. The chapter proceeds into a Sāṃkhya-style cosmogonic ladder—pradhāna, mahat, ahaṃkāra, the five mahābhūtas—and enumerates each element’s characteristic sense-qualities (sound, touch, form, taste, smell) with expanded taxonomies for smell, taste, form, touch, and sound. It closes by ranking principles toward the ‘parama-avyakta’ and puruṣa, presented as the attainment of non-finitude (ānantya).
Chapter Arc: ऋषि ब्रह्माजी से धर्म-निर्णय जानने हेतु प्रश्न करते हैं—कौन-सा मत ‘अनुच्छेयतम’ (सबसे ग्राह्य) है, जब धर्म के विषय में परस्पर-विरोधी वचनों की भरमार दिखती है। → ऋषि अनेक मतों की सूची रखते हैं: देह के बाद फल है/नहीं; धर्म नित्य है/अनित्य; अस्ति/नास्ति; एकरूप/द्विरूप/व्यामिश्र; देश-काल की सत्ता है/नहीं; जटाधारी-चर्मधारी, मुण्डित-असंवृत जैसे विविध आचार; ज्ञान=संन्यास बनाम स्वभाव-प्रधान भौतिक दृष्टि; ‘सब कुछ’ प्रशंसनीय बनाम ‘सब कुछ’ नहीं—इस बहुलता से निर्णय असंभव-सा प्रतीत होता है। → ऋषि ‘परम गुह्य’ तत्त्व पूछते हैं—सत्त्व और क्षेत्रज्ञ (प्रकृति-पुरुष/देह-चेतना) का सम्बन्ध किस हेतु से है; यही प्रश्न मतभेदों के मूल पर चोट करता है। → ब्रह्माजी—लोकभावन, धर्मात्मा, बुद्धिमान—ऋषियों के प्रश्न का ‘याथातथ्य’ (यथार्थ) रूप से निरूपण आरम्भ करते हैं, संकेत देते हैं कि समाधान बाह्य-विवादों से ऊपर, तत्त्व-ज्ञान के स्तर पर है। → ब्रह्माजी का प्रतिपादन आरम्भ तो होता है, पर ‘परम गुह्य’ सम्बन्ध का पूर्ण निष्कर्ष अगले प्रवाह में खुलने हेतु शेष रहता है।
Verse 1
अत--#क+ एकोनपज्चाशत्तमो<ड्ध्याय: धर्मका निर्णय जाननेके लिये ऋषियोंका प्रश्न ऋषय ऊचु: को वा स्विदिह धर्माणामनुछेयतमो मतः । व्याहतामिव पश्यामो धर्मस्य विविधां गतिम्,ऋषियोंने पूछा--ब्रह्मन्! इस जगत्में समस्त धर्मोमें कौन-सा धर्म अनुष्ठान करनेके लिये सर्वोत्तम माना गया है, यह कहिये; क्योंकि हमें धर्मके विभिन्न मार्ग एक-दूसरेसे आहत हुए-से प्रतीत होते हैं
诸圣仙问道:“婆罗门啊,在此世间,诸般法(dharma)之中,哪一种被认为最值得奉行?因为我们仿佛看见法的多种途径彼此冲突、互相阻碍。”
Verse 2
ऊर्ध्व देहाद् वदन्त्येके नैतदस्तीति चापरे । केचित् संशयितं सर्व नि:संशयमथापरे,कोई तो कहते हैं कि देहका नाश होनेके बाद धर्मका फल मिलेगा। दूसरे कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है। कितने ही लोग सब धर्मोको संशययुक्त बताते हैं और दूसरे संशयरहित कहते हैं
风神(Vāyu)说道:“有人宣称,身坏之后,便在更高的境界获得法的果报;也有人坚持说并无此事。有人认为一切法教皆不确定,而另一些人则断言其无可置疑。”
Verse 3
अनित्यं नित्यमित्येके नास्त्यस्तीत्यपि चापरे | एकरूपं द्विधेत्येके व्यामिश्रमिति चापरे,कोई कहते हैं कि धर्म अनित्य है और कोई उसे नित्य कहते हैं। दूसरे कहते हैं कि धर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। कोई कहते हैं कि अवश्य है। कोई कहते हैं कि एक ही धर्म दो प्रकारका है तथा कुछ लोग कहते हैं कि धर्म मिश्रित है
风神(Vāyu)说道:“有人说法无常,有人却坚持法常住。有人否认世间有‘法’这一事物,有人则肯定其存在。有人说法体本一而现二相;也有人认为法乃杂糅合成之实在。”
Verse 4
मन्यन्ते ब्राह्मणा एव ब्रद्वाज्ञास्तत्त्वदर्शिन: । एकमेके पृथक् चान्ये बहुत्वमिति चापरे,वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता तत्त्वदर्शी ब्राह्मण लोग यह मानते हैं कि एक ब्रह्म ही है। अन्य कितने ही कहते हैं कि जीव और ईश्वर अलग-अलग हैं और दूसरे लोग सबकी सत्ता भिन्न और बहुत प्रकारसे मानते हैं
风神(Vāyu)说道:“通晓吠陀与论典、洞见真谛的婆罗门们,也各持异见:有人断言真实唯是一体——唯有梵(Brahman)。有人主张差别,说个我(jīva)与主宰(Īśvara)各自分离。还有人主张多元,认为众生与诸原理繁多而彼此有别。”
Verse 5
देशकालावुभौ केचिन्नैतदस्तीति चापरे । जटाजिनधराश्रान्ये मुण्डा: केचिदसंवृता:,कितने ही लोग देश और कालकी सत्ता मानते हैं। दूसरे लोग कहते हैं कि इनकी सत्ता नहीं है। कोई जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले हैं, कोई सिर मुडाते हैं और कोई दिगम्बर रहते हैं
风神(Vāyu)说道:“有人承认处所与时间皆为真实的支配因素;也有人宣称它们并无真实存在。有人以苦行为生,结发披鹿皮;有人剃去头发;也有人裸形而居。”
Verse 6
अस्नानं केचिदिच्छन्ति स्नानमप्यपरे जना: | मन्यन्ते ब्राह्मणा देवा ब्रद्वाज्ञास्तत्त्वदर्शिन:,कितने ही मनुष्य स्नान नहीं करना चाहते और दूसरे लोग जो शास्त्रज्ञ तत्त्वदर्शी ब्राह्मणदेवता हैं, वे स्नानको ही श्रेष्ठ मानते हैं
有人全然不愿沐浴,有人却执意要沐浴。那些婆罗门——被敬若神明,通晓婆罗堕阇(Bhāradvāja)一系之学,且为洞见真实的见道者——认为沐浴乃更为上善之途。
Verse 7
आहारं केचिदिच्छन्ति केचिच्चानशने रता: । कर्म केचित् प्रशंसन्ति प्रशान्तिं चापरे जना:,कई लोग भोजन करना अच्छा मानते हैं और कई भोजन न करनेमें अभिरत रहते हैं। कई कर्म करनेकी प्रशंसा करते हैं और दूसरे लोग परम शान्तिकी प्रशंसा करते हैं
风神伐由(Vāyu)说道:“有人求取滋养,赞成进食;有人却乐于斋戒。有人称颂行动与祭仪之勤修;另一些人则称颂内心寂然的至上安宁。”
Verse 8
केचिन्मोक्ष॑ प्रशंसन्ति केचिद् भोगान् पृथग्विधान् | धनानि केचिदिच्छन्ति निर्धनत्वमथापरे । उपास्यसाधन त्वेके नैतदस्तीति चापरे,कितने ही मोक्षकी प्रशंसा करते हैं और कितने ही नाना प्रकारके भोगोंकी प्रशंसा करते हैं। कुछ लोग बहुत-सा धन चाहते हैं और दूसरे निर्धनताको पसंद करते हैं। कितने ही मनुष्य अपने उपास्य इष्टदेवकी प्राप्तिकी साधना करते हैं और दूसरे कितने ही ऐसा कहते हैं कि 'यह नहीं है”
风神伐由说道:“有人称颂解脱(mokṣa),有人却赞美种种享乐。有人渴求巨富,有人反而喜爱贫乏。有人修持种种法门以求得所奉之本尊;也有人断言:‘此事并不存在。’”
Verse 9
अहिंसानिरताश्षान्ये केचिद् हिंसापरायणा: । पुण्येन यशसा चान्ये नैतदस्तीति चापरे,अन्य कई लोग अहिंसा-धर्मका पालन करनेमें रुचि रखते हैं और कई लोग हिंसाके परायण हैं। दूसरे कई पुण्य और यशसे सम्पन्न हैं। इनसे भिन्न दूसरे कहते हैं कि 'यह सब कुछ नहीं है”
风神伐由天说道:“有人专志于不害(ahimsa),有人却一心趋向暴力。有人以功德与美名而显著;然而另一些人迥然不同,宣称:‘这一切都并非真实存在。’”
Verse 10
सद्धावनिरताश्चान्ये केचित् संशयिते स्थिता: । दुःखादन्ये सुखादन्ये ध्यानमित्यपरे जना:,अन्य कितने ही सद्धावमें रुचि रखते हैं। कितने ही लोग संशयमें पड़े रहते हैं। कितने ही साधक कष्ट सहन करते हुए ध्यान करते हैं और दूसरे कई सुखपूर्वक ध्यान करते हैं
风神伐由说道:“有人笃信而精勤,有人却困于疑惑。有人在艰苦中修习禅定,有人在安逸中修习禅定——众生便以种种方式趋向观照。”
Verse 11
यज्ञमित्यपरे विप्रा: प्रदानमिति चापरे । तपस्त्वन्ये प्रशंसन्ति स्वाध्यायमपरे जना:,अन्य ब्राह्मण यज्ञको श्रेष्ठ बताते हैं और दूसरे दानकी प्रशंसा करते हैं। अन्य कई तपकी प्रशंसा करते हैं तथा दूसरे स्वाध्यायकी प्रशंसा करते हैं
风神伐由说道:“有些博学的婆罗门宣称,祭祀(yajña)乃至上之善;另一些则推崇布施(pradāna)。有人赞叹苦行(tapas),而另一些人则称颂自修与诵习圣典之学(svādhyāya)。”
Verse 12
ज्ञानं संन्यासमित्येके स्वभावं भूतचिन्तका: । सर्वमेके प्रशंसन्ति न सर्वमिति चापरे,कई लोग कहते हैं कि ज्ञान ही संन्यास है। भौतिक विचारवाले मनुष्य स्वभावकी प्रशंसा करते हैं। कितने ही सभीकी प्रशंसा करते हैं और दूसरे सबकी प्रशंसा नहीं करते
风神伐由说道:“有人宣称,真正的出离(saṃnyāsa)无非就是知识。那些只沉溺于思量物质诸元素的人,把‘自性/自然’(svabhāva)奉为终极因。有人不加分别地赞美一切道路,也有人坚持并非万事万法都值得称颂。”
Verse 13
एवं व्युत्थापिते धर्मे बहुधा विप्रबोधिते । निश्चयं नाधिगच्छाम: सम्मूढा: सुरसत्तम,सुरश्रेष्ठ ब्रह्म! इस प्रकार धर्मकी व्यवस्था अनेक ढंगसे परस्पर विरुद्ध बतलायी जानेके कारण हमलोग धर्मके विषयमें मोहित हो रहे हैं; अतः किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाते
当法(dharma)如此被提出,又被婆罗门以种种方式——甚至彼此矛盾地——阐释时,我们便对何为真正的法感到迷惘。因此,噢诸神之最胜者,噢至上神祇,噢梵(Brahman),我们无法得出任何坚定的结论。
Verse 14
इदं श्रेय इदं श्रेय इत्येवं व्युत्थितो जन: । यो हि यस्मिन् रतो धर्मे स तं पूजयते सदा,“यही कल्याण-मार्ग है, यही कल्याण-मार्ग है'--इस प्रकारकी बातें सुनकर मनुष्य- समुदाय विचलित हो गया है। जो जिस धर्ममें रत है, वह उसीका सदा आदर करता है
“此乃真正之善,此乃真正之善!”——听闻这般彼此争胜的宣称,人们便心神不定,被牵引向不同方向。因为一个人总是尊奉自己所倾心的那一种法;他执著于哪条道路,便不断礼敬哪条道路。
Verse 15
तेन नो&विह्िता प्रज्ञा मनश्न बहुलीकृतम् एतदाख्यातमिच्छाम: श्रेय: किमिति सत्तम,इस कारण हमलोगोंकी बुद्धि विचलित हो गयी है और मन भी बहुत-से संकल्प- विकल्पोंमें पड़कर चंचल हो गया है। श्रेष्ठ ब्रह्मन! हम यह जानना चाहते हैं कि वास्तविक कल्याणका मार्ग क्या है?
因此我们的智慧被扰乱,心意也在诸多疑虑与取舍之间纷乱不定。噢至上的梵(Brahman)啊,我们愿知:究竟何者才是真正的吉祥之道?
Verse 16
अतः: परं तु यद् गुहां तद् भवान् वक्तुमर्हति । सत्त्वक्षेत्रज्ञयो श्वापि सम्बन्ध: केन हेतुना,इसलिये जो परम गुह्य तत्त्व है, वह आपको हमें बतलाना चाहिये। साथ ही यह भी बतलाइये कि बुद्धि और क्षेत्रज्षका सम्बन्ध किस कारणसे हुआ है?
因此,你当为我们阐明那至高而最为隐秘的真理。并且也请告知:为何会生起萨埵(sattva,内在机能/心性倾向)与刹帝罗阇那(kṣetrajña,知田者,即自我)之间的联系?
Verse 17
एवमुक्त: स तैविंप्रैर्भगवॉललोकभावन: । तेभ्य: शशंस धर्मात्मा याथातथ्येन बुद्धिमान्,लोकोंकी सृष्टि करनेवाले धर्मात्मा बुद्धिमान भगवान् ब्रह्माजी उन ऋषियोंकी यह बात सुनकर उनसे उनके प्रश्नोंका यथार्थ रूपसे उत्तर देने लगे
诸仙如是发问,世间的护持者与起源者——吉祥的梵天(Brahmā)——听罢他们的话,那位正直而睿智者便开始为他们开示,依真实、如实地回答诸问。
Verse 48
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
至此,《圣摩诃婆罗多》阿湿婆梅陀迦篇之《阿努吉塔》部分中,师徒对话第四十八章告终。此结语(章末题记)标示一段教诲单元的圆满,将前文之论述框定为师者向弟子传授伦理与灵性教导的传承。
Verse 49
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकोनपज्चाशत्तमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपव॑के अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ
如是,在《圣摩诃婆罗多》阿湿婆梅陀迦篇之《阿努吉塔》部分中,师徒对话第四十九章告终。由此,阿湿婆梅陀迦篇《阿努吉塔》里以导师与弟子之谈论为主题的第四十九章圆满结束。
The dilemma is how to evaluate action ethically after recognizing harm as a central fault: the chapter prioritizes ahiṃsā while distinguishing outcome-seeking action from disciplined, non-appropriative practice that reduces entanglement.
Liberation-oriented clarity arises from discriminating the enduring knower (kṣetrajña/puruṣa) from the changing field of guṇas (sattva/prakṛti), enabling engagement without attachment—illustrated through analogies like water on a lotus leaf.
Yes. Through travel and vehicle analogies (walking vs chariot; swimming vs boat), it asserts that method (upāya) determines whether effort yields effective progress, and that wisdom lies in using appropriate means and relinquishing instruments once the goal is reached.