शृङ्गिशापः—तक्षककाश्यपसंवादः (Śṛṅgī’s Curse and the Takṣaka–Kāśyapa Dialogue)
निवेशायाखिलां भूमिं कन्याभैक्ष्यं चरामि भो: । दरिद्रो दःखशीलश्न पितृभि: संनियोजित:,“अतः विवाहके लिये मैं सारी पृथ्वीपर घूमकर कन्याकी भिक्षा चाहता हूँ। यद्यपि मैं दरिद्र हूँ और सुविधाओंके अभावमें दुःखी हूँ, तो भी पितरोंकी आज्ञासे विवाहके लिये उद्यत हूँ
塔克沙迦说道:“为求入居家之业,我遍行大地,若乞施般求一位少女为婚。纵我贫乏困顿、因缺乏而受苦,然奉祖先之命,我仍决意成婚。”
तक्षक उवाच