Jaratkāru-nirukti and Parīkṣit’s forest encounter (जরত्कारुनिरुक्तिः—परिक्षिद्वनप्रसङ्गः)
दास्यामि हि वर तेड्द्य प्रीतिर्मे परमा त्वयि । दिष्ट्या बुद्धिश्न ते धर्मे निविष्टा पन्नगोत्तम । भूयो भूयश्ष ते बुद्धिर्धर्मे भवतु सुस्थिरा,“तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा प्रेम है; अतः आज मैं तुम्हें अवश्य वर दूँगा। पन्नगोत्तम! यह सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारी बुद्धि धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगी हुई है। मैं भी आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारी बुद्धि उत्तरोत्तर धर्ममें स्थिर रहे”
śeṣa uvāca | dāsyāmi hi vara te 'dya prītir me paramā tvayi | diṣṭyā buddhiś ca te dharme niviṣṭā pannagottama | bhūyo bhūyaś ca te buddhir dharme bhavatu susthirā ||
“今日我必赐你一恩,因为我对你的慈爱至深。吉哉,蛇族之最!你的慧识牢牢安住于达摩之中。我更赐你祝福:愿你的明辨在正法里愈加坚固、愈加稳住。”
शेष उवाच