Adhyāya 284: Tapas as a Corrective to Household Attachment
Parāśara’s Instruction
दीर्घकालेन महता प्रयत्नेन सुसंचितम् । तन्न मिथ्या भवेन्मह्ूं वरमेतमहं वृणे,उस समय देवगुरु बृहस्पतिने महादेवजीको वेदका मखाध्याय पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात् प्रजापति दक्ष दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए हाथ जोड़कर भय और शंकासे सहमे हुए-से बोले--“भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, आपके अनुग्रहका पात्र हूँ अथवा यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकालसे महान् प्रयत्न करके जो ऐसा यज्ञ-सम्भार जुटा रखा था, उसमेंसे जो चला दिया गया, खा-पी लिया गया, नष्ट किया गया अथवा चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब मेरे लिये व्यर्थ न हो”
dīrghakālena mahatā prayatnena susaṃcitam | tan na mithyā bhaven mahyaṃ varam etam ahaṃ vṛṇe ||
“Trong thời gian dài, với nỗ lực lớn lao, ta đã cẩn trọng tích góp những chuẩn bị ấy. Xin đừng để chúng trở thành vô ích đối với ta. Đó là ân huệ ta xin chọn.”
वीरभद्र उवाच