Nakula’s Counsel on Yajña, Dāna, and Tyāga (नकुलोपदेशः—यज्ञदानत्यागविचारः)
अपन काल छा | अपड--#क+ द्ादशोड् ध्याय: नकुलका गृहस्थ-धर्मकी प्रशंसा करते हुए राजा युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच अर्जुनस्य वच: श्रुत्वा नकुलो वाक्यमत्रवीत् | राजानमभिसप्प्रेक्ष्य सर्वधर्मभूतां वरम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! अर्जुनकी बात सुनकर नकुलने भी सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरकी ओर देखकर कुछ कहनेको उद्यत हुए। शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! महाबाहु नकुल बड़े बुद्धिमान् थे। उनकी छाती चौड़ी, मुख ताम्रवर्णका था। वे बड़े मितभाषी थे। उन्होंने भाईके चित्तका अनुसरण करते हुए कहा
Vaiśampāyana uvāca | Arjunasya vacaḥ śrutvā Nakulo vākyam abravīt | Rājānam abhisamprekṣya sarvadharmabhṛtāṃ varam |
Vaiśampāyana nói: Nghe lời Arjuna, Nakula liền cất tiếng. Chàng hướng mắt về vua Yudhiṣṭhira—bậc đứng đầu trong hàng những người gìn giữ dharma—và chuẩn bị thưa lời, khiến lời khuyên của mình hòa cùng ý hướng của người anh.
वैशम्पायन उवाच