गान्धारी-प्रशमनम् — Pacification of Gāndhārī and Kṛṣṇa’s Counsel at Hāstinapura
रक्षितव्यो महाबाहो सर्वास्वापत्स्विति प्रभो । “भरतनन्दन! अब आगे समयानुसार जो कार्य प्राप्त हो उसे शीघ्र कर डालिये। पहले गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ जब मैं उपलव्य नगरमें आया था, उस समय मेरे लिये मधुपर्क अर्पित करके आपने मुझसे यह बात कही थी कि “श्रीकृष्ण! यह अर्जुन तुम्हारा भाई और सखा है। प्रभो! महाबाहो! तुम्हें इसकी सब आपत्तियोंसे रक्षा करनी चाहिये” || २३-२४ ३ || तव चैव ब्रुवाणस्य तथेत्येवाहमब्रुवम्,मुक्तो वीरक्षयादस्मात् संग्रामाललोमहर्षणात् । “आपने जब ऐसा कहा, तब मैंने “तथास्तु/ कहकर वह आज्ञा स्वीकार कर ली थी। जनेश्वर! राजेन्द्र! आपका वह शूरवीर, सत्यपराक्रमी भाई सव्यसाची अर्जुन मेरे द्वारा सुरक्षित रहकर विजयी हुआ है तथा वीरोंका विनाश करनेवाले इस रोमांचकारी संग्रामसे भाइयोंसहित जीवित बच गया है”
rakṣitavyo mahābāho sarvāsva-āpatsu iti prabho |
Vāyu nói: “Hỡi bậc chúa tể tay mạnh, ngài phải che chở người ấy trong mọi cơn nguy biến.”
वायुदेव उवाच