Āṇīmāṇḍavya–Upākhyāna
The Account of Āṇīmāṇḍavya and the Birth of Vidura
भ्राजमानं यथादित्यमाययौ स्वपुरं प्रति । पौरवस्तु पुरी गत्वा पुरन्दरपुरोपमाम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं। गंगाजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर महाराज शान्तनु सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले अपने पुत्रको लेकर राजधानीमें आये। उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगगरी अमरावतीके समान सुन्दर था। पूरुवंशी राजा शान्तनु पुत्रसहित उसमें जाकर अपने-आपको सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न एवं सफलमनोरथ मानने लगे। तदनन्तर उन्होंने सबको अभय देनेवाले महात्मा एवं गुणवान् पुत्रको राजकाजमें सहयोग करनेके लिये समस्त पौरवोंके बीचमें युवराज-पदपर अभिषिक्त कर दिया। जनमेजय! शान्तनुके उस महायशस्वी पुत्रने अपने आचार-व्यवहारसे पिताको, पौरवसमाजको तथा समूचे राष्ट्रको प्रसन्न कर लिया। अमितपराक्रमी राजा शान्तनुने वैसे गुणवान् पुत्रके साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए चार वर्ष व्यतीत किये। एक दिन वे यमुना नदीके निकटवर्ती वनमें गये
bhrājamānaṃ yathādityam āyayau svapuraṃ prati | pauravas tu purīṃ gatvā purandarapuropamām ||
Vaiśaṃpāyana nói: “Rực rỡ như mặt trời, nhà vua lên đường về kinh đô của mình. Vị vua dòng Paurava, khi bước vào thành—tựa kinh đô của Purandara (Indra)—liền tự thấy mọi mưu cầu của mình đã được viên mãn.”
वैशम्पायन उवाच