उद्योगपर्व — अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर संवादः (विदुरनीतिः)
क्षुद्राक्षेगेव जालेन झषावपिहितावुरू । कामश्न राजन् क्रोधश्व तौ प्रज्ञानं विलुम्पत:,राजन! जिस प्रकार सूक्ष्म छेदवाले जालमें फँसी हुई दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ मिलकर जालको काट डालती हैं, उसी प्रकार ये काम और क्रोध--दोनों विवेकको लुप्त कर देते हैं
kṣudrākṣegeva jālena jhaṣāv apihitāv urū | kāmaś ca rājan krodhaś ca tau prajñānaṁ vilumpataḥ ||
اے راجن! جیسے باریک سوراخوں والے جال میں پھنسی دو بڑی مچھلیاں تڑپ کر جال پھاڑ ڈالتی ہیں، ویسے ہی کام اور کروध—یہ دونوں—انسان کی دانائی لوٹ لیتے ہیں۔
विदुर उवाच