उद्योगपर्व — अध्याय २५: संजयदूतवाक्यम्
Sañjaya’s Envoy-Speech on Peace
सो>तं न पश्यामि परीक्षमाण: कथं स्वस्ति स्यात् कुरुसृंजयानाम् । आत्िश्वर्यो धृतराष्ट्र: परेभ्य: प्रत्राजिते विदुरे दीर्घदृष्टो,मैं बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई ऐसा उपाय नहीं देखता, जिससे कुरु तथा सूंजयवंश दोनोंका कल्याण हो। धृतराष्ट्र हम शत्रुओंसे ऐश्वर्य छीनकर दूरदर्शी विदुरको देशसे निर्वासित करके अपने पुत्रोंसहित भूमण्डलका निष्कण्टक साम्राज्य प्राप्त करनेकी आशा लगाये बैठे हैं। ऐसे लोभी नरेशके साथ केवल संधि ही बनी रहेगी, (युद्ध आदिका अवसर नहीं आयेगा) यह सम्भव नहीं जान पड़ता; क्योंकि हमलोगोंके वन चले जानेपर वे हमारे सारे धनको अपना ही मानने लगे हैं
sa taṁ na paśyāmi parīkṣamāṇaḥ kathaṁ svasti syāt kurusṛñjayānām | atiśvaryo dhṛtarāṣṭraḥ parebhyaḥ pratrājite vidure dīrghadṛṣṭaḥ ||
سنجے نے کہا—میں ہر پہلو سے پرکھ کر بھی نہیں دیکھ پاتا کہ کوروؤں اور سرنجیوں—دونوں کے لیے بھلائی کیسے پیدا ہو۔ دھرتراشٹر اقتدار کے نشے میں چور ہو کر دوراندیش ودُر کو جلا وطن کر چکا ہے اور حریفوں سے سلطنت چھین کر اپنے بیٹوں سمیت بےخار و خس ساری زمین پر بےمزاحم سلطنت کی امید باندھے بیٹھا ہے۔ ایسے لالچی بادشاہ کے ساتھ محض صلح کا قائم رہ جانا مجھے ممکن نہیں لگتا؛ کیونکہ جب پانڈو جنگل کو گئے تو کوروؤں نے ہماری ساری دولت کو اپنا ہی سمجھنا شروع کر دیا۔
संजय उवाच