अम्बा–राम–भीष्म संवादः
Amba–Rama–Bhishma Dialogue on Vow and Refuge
ततः कृतस्वस्त्ययनो मात्रा च प्रतिनन्दित: । द्विजातीन् वाच्य पुण्याहं स्वस्ति चैव महाद्युते,यत्तुं सूतेन शिष्टेन बहुशो दृष्टकर्मणा । महातेजस्वी नरेश! उस समय स्वस्तिवाचन कराकर माता सत्यवतीने मेरा अभिनन्दन किया और मैं ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन करा उनसे कल्याणकारी आशीर्वाद ले सुन्दर रजतमय रथपर आरूढ़ हुआ। उस रथमें श्वेत रंगके घोड़े जुते हुए थे। उसमें सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री सुन्दर ढंगसे रखी गयी थी। उसकी बैठक बहुत सुन्दर थी। रथके ऊपर व्याप्रचर्मका आवरण लगाया गया था। वह रथ बड़े-बड़े शस्त्रों तथा समस्त उपकरणोंसे सम्पन्न था। युद्धमें जिसका कार्य अनेक बार देख लिया गया था, ऐसे सुशिक्षित, कुलीन, वीर तथा अभश्वशास्त्रके पण्डित सारथिद्वारा उस रथका संचालन और नियन्त्रण होता था
tataḥ kṛtasvastyayano mātrā ca pratinanditaḥ | dvijātīn vācya puṇyāhaṃ svasti caiva mahādyute, yattuṃ sūtena śiṣṭena bahuśo dṛṣṭakarmaṇā |
پھر جب سَوَستی خوانی وغیرہ کے مبارک اعمال ادا ہو چکے تو ماں نے مجھے دعا دے کر سراہا۔ اس کے بعد میں نے برہمنوں سے ‘پُنْیَاہ’ اور ‘سَوَستی’ کی برکت آمیز تلاوت کروا کر خیر و عافیت کی دعائیں لیں۔ اے صاحبِ فروغ! پھر میں ایک ایسے شائستہ و تربیت یافتہ سارتھی کے ساتھ روانہ ہوا جس کی مہارتِ عمل بارہا دیکھی جا چکی تھی۔
भीष्म उवाच