अदारा-नीति
Crisis Composure) and ‘Jaya’ Śravaṇa (Morale-Instruction
प्रियके अभावमें मनुष्यकी शोभा नहीं होती है। जैसे गंगा समुद्रमें जाकर विलुप्त हो जाती है, उसी प्रकार वह अभावग्रस्त पुरुष भी निश्चय ही लुप्त हो जाता है ।। पुत्र बवाच नेयं मतिस्त्वया वाच्या मात: पुत्रे विशेषतः । कारुण्यमेवात्र पश्य भूत्वेह जडमूकवत्,पुत्रने कहा--माँ! तुझे अपने मुखसे ऐसा विचार नहीं व्यक्त करना चाहिये, अतः तुम जड और मूककी भाँति होकर मुझ अपने पुत्रको विशेषरूपसे करुणापूर्ण दृष्टिसे ही देखो
putra uvāca—neyaṃ matis tvayā vācyā mātaḥ putre viśeṣataḥ | kāruṇyam evātra paśya bhūtvaiha jaḍamūkavat ||
بیٹے نے کہا: “ماں! خاص طور پر اپنے بیٹے کے بارے میں ایسی بات زبان پر نہ لاؤ۔ یہاں مجھے صرف رحم کی نگاہ سے دیکھو؛ گویا جمود و خاموشی اختیار کر لو، اور ایسے الفاظ نہ کہو جو عزم کو کمزور کریں۔”
पुत्र उवाच