धर्मस्य बहुद्वारत्वम् — Nārada’s Audience with Indra (Śānti-parva 340)
सत्त्वं रजस्तमश्वैव न गुणास्तं भजन्ति वै । यश्न सर्वगतः साक्षी लोकस्यात्मेति कथ्यते,'जो नेत्रोंसे देखा नहीं जाता, त्वचासे जिसका स्पर्श नहीं होता, गन्ध ग्रहण करनेवाली प्राणेन्द्रियसे जो सूँघनेमें नहीं आता, जो रसनेन्द्रियकी पहुँचसे परे है; सत्त्व, रज और तम नामक गुण जिसपर कोई प्रभाव नहीं डाल पाते, जो सर्वव्यापी, साक्षी और सम्पूर्ण जगत्का आत्मा कहलाता है, सम्पूर्ण प्राणियोंका नाश हो जानेपर भी जो स्वयं नष्ट नहीं होता है, जिसे अजन्मा, नित्य, सनातन, निर्गुण और निष्कल बताया गया है, जो चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवें तत्त्वके रूपमें विख्यात है, जिसे अन्तर्यामी पुरुष, निष्क्रिय तथा ज्ञानमय नेत्रोंसे ही देखने योग्य बताया जाता है, जिसमें प्रवेश करके श्रेष्ठ द्विज यहाँ मुक्त हो जाते हैं, वही सनातन परमात्मा है। उसीको वासुदेव नामसे जानना चाहिये
sattvaṁ rajas tamaś caiva na guṇās taṁ bhajanti vai | yaś ca sarvagataḥ sākṣī lokasyātmeti kathyate ||
بھیشم نے کہا—ستّو، رجس اور تمس—یہ گُن اس پرماتما کو نہیں چھوتے۔ وہ سراسر پھیلا ہوا، ساکشی اور جگت کا آتما کہلاتا ہے۔
भीष्म उवाच
The Supreme Self (Ātman/Brahman) is beyond prakṛti and its three guṇas. He is the all-pervading Witness and the Self of the world—unchanging, imperishable, and ultimately to be realized as Vāsudeva.
In Śānti Parva’s instruction on liberation and right understanding, Bhīṣma teaches Yudhiṣṭhira about the nature of the highest reality: not an object of the senses, not shaped by the guṇas, but the inner Witness that underlies the world.