Nārāyaṇasya Guhya-nāmāni Niruktāni (Etymologies of Nārāyaṇa’s Secret Epithets) / नारायणस्य गुह्यनामानि निरुक्तानि
क्षमारित्रां सत्यमयीं धर्मस्थैर्यवटारकाम् । त्यागवाताध्वगां शीघ्रां नौतार्या तां नदीं तरेत्,यह संसार एक नदीके समान है, जिसका उपादान या उदगम सत्य है, रूप इसका किनारा, मन स्रोत, स्पर्श द्वीप और रस ही प्रवाह है, गन्ध उस नदीकी कीचड़, शब्द जल और स्वर्गरूपी दुर्गम घाट है। शरीररूपी नौकाकी सहायतासे उसे पार किया जा सकता है। क्षमा इसको खेनेवाली लग्गी और धर्म इसको स्थिर करनेवाली रस्सी (लंगर) है। यदि त्यागरूपी अनुकूल पवनका सहारा मिले तो इस शीघ्रगामिनी नदीको पार किया जा सकता है। इसे पार करनेका अवश्य प्रयत्न करे
kṣamāritrāṃ satyamayīṃ dharmasthairyavaṭārakām | tyāgavātādhvagāṃ śīghrāṃ nautāryā tāṃ nadīṃ taret ||
نارد نے کہا—جس کی پتوار درگزر (کْشَما) ہے، جس کا جوہر سچ ہے، اور دھرم میں استقامت جس کی رسی/لنگر ہے—اس تیز رو سنسار-دریا کو کشتی کے سہارے پار کرنا چاہیے۔ اگر ترکِ دنیا (تیاگ) کی موافق ہوا مل جائے تو یہ اور بھی آسانی سے پار ہو جاتا ہے۔ اس لیے اسے پار کرنے کی کوشش ضرور کرنی چاہیے۔
नारद उवाच