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Shloka 57

Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)

मत्यक्षसंश्रयाच्चायं शृणु यस्ते व्यतिक्रम: । आश्रयन्त्या: स्वभावेन मम पूर्वपरिग्रहम्‌,आपने स्वभावत: सोच-समझकर मेरे पूर्व-शरीरका आश्रय लेनेकी चेष्टा की है, अतः मेरे पक्षका आश्रय लेने--मेरे शरीरमें प्रवेश करनेके कारण आपसे जो व्यतिक्रम बन गया है, उसे बताता हूँ, सुनिये

مچھلی کے جسم کا سہارا لینے کے سبب تم سے جو تجاوز (بے قاعدگی) ہوا ہے، اسے سنو۔ اپنے فطری میلان سے تم نے میرے سابقہ پرِگ्रह (سابقہ بدن/سابقہ سہارا) کا آسرا لینے کی کوشش کی ہے۔

जनक उवाच