Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
पृथक्त्वादाश्रमाणां च वर्णन्यत्वे तथैव च । परस्परपृथक्त्वाच्च कथं ते वर्णसंकर:,सारे आश्रम पृथक्-पृथक् हैं तथा चारों वर्ण भी भिन्न हैं। जब इनमें परस्पर पार्थक्य बना हुआ है, तब पृथक्त्वको जाननेवाले आपके वर्णका संकर कैसे हो सकता है?
pṛthaktvād āśramāṇāṁ ca varṇānyatve tathaiva ca | paraspara-pṛthaktvāc ca kathaṁ te varṇa-saṅkaraḥ ||
جب آشرم ایک دوسرے سے جدا ہیں اور اسی طرح چاروں ورن بھی الگ ہیں، اور ان کے درمیان باہمی حد بندی قائم ہے، تو جو اس امتیاز کو جانتا ہے اُس کے لیے ‘ورن سنکر’ کیسے پیدا ہو سکتا ہے؟ اگر حدود برقرار ہوں تو سماجی و اخلاقی نظم کے بگاڑ کا الزام کس بنیاد پر لگایا جائے؟
भीष्य उवाच