Adhyāya 287 — Janaka’s Inquiry on Śreyas, Abhayadāna, and Asaṅga
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एवं प्रवर्तमानस्य वृत्तिं प्राणिहितात्मन: । तपसैवेह बहुल श्रेयो व्यक्त भविष्यति,जो इस प्रकारकी वृत्तिसे रहकर जीविका चलाता है और प्राणियोंके हितमें मन लगाये रहता है, उस पुरुषको स्वधर्मरूप तपके अनुष्ठानसे इस लोकमें ही परम कल्याणकी प्रत्यक्ष उपलब्धि हो जायगी
جو اس طرح کی روش پر روزی چلاتا ہے اور مخلوقات کے فائدے میں دل لگائے رکھتا ہے، وہ اپنے سْوَدھرم کے روپ میں تپسیا کے انुष्ठان سے اسی دنیا میں اعلیٰ ترین بھلائی کو عیاں طور پر پا لیتا ہے۔
नारद उवाच