Dharma-Pramāṇa-Vicāra: The Elusiveness of Dharma and the Limits of Rule-Lists
प्रतिरूप॑ यथैवाप्सु ताप: सूर्यस्य लक्ष्यते सत्त्ववत्सु तथा सत्त्वं प्रतिरूपं स पश्यति,जैसे विभिन्न जलाशयोंके जलमें सूर्यकी किरणोंका पृथक्-पृथक् दर्शन होता है, उसी प्रकार योगी पुरुष सभी सजीव शरीरोंके भीतर सूक्ष्मरूपसे स्थित पृथक्-पृथक् जीवोंको देखता है
جس طرح مختلف آبی ذخائر کے پانی میں سورج کا عکس الگ الگ دکھائی دیتا ہے، اسی طرح یوگی پُرش سَتْوَ والے جسموں میں قائم جیواتما کے پرتی روپ کو جدا جدا دیکھتا ہے۔
व्यास उवाच