Adhyāya 222 — ब्रह्मस्थानप्राप्ति: मोक्षधर्मे समत्वव्रतम्
Attaining the Brahman-Station: The Vow of Equanimity in Mokṣadharma
अनिष्टस्थ हि निर्व॑त्तिरनिर्व त्ति: प्रियस्य च । लक्ष्यते यतमानानां पुरुषार्थस्तत: कुत:,परंतु देखा यह जाता है कि इष्टसिद्धिके लिये प्रयत्न करनेवालोंको अनिष्टकी भी प्राप्ति होती है और इष्टकी सिद्धिसे वे वंचित रह जाते हैं; अतः पुरुषार्थकी प्रधानता कहाँ रही?
لیکن دیکھا جاتا ہے کہ مطلوبہ کامیابی کے لیے کوشش کرنے والوں کو ناگوار بھی پہنچ جاتا ہے اور محبوب مقصد پورا نہیں ہوتا؛ پھر شخصی کوشش کی برتری کہاں رہی؟
प्रह्माद उवाच