Śalya–Yudhiṣṭhira Duel and the Discharge of the Śakti (शल्यवधप्रसङ्गः)
तब युधिष्ठिरने दूसरा धनुष लेकर शल्यको तीन सौ बाणोंसे घायल कर दिया और एक क्षुके द्वारा उनके धनुषके भी दो टुकड़े कर दिये। इसके बाद झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको मार डाला। फिर दो अत्यन्त तीखे बाणोंसे दोनों पार्श्वरक्षकोंको यमलोक भेज दिया। तदनन्तर एक चमकते हुए पानीदार पैने भल्लसे सामने खड़े हुए शल्यके ध्वजको भी काट गिराया। शत्रुदमन नरेश! फिर तो दुर्योधनकी वह सेना वहाँसे भाग खड़ी हुई ।। ततो मद्राधिपं द्रौणिरभ्यधावत् तथा कृतम् । आरोप्य चैनं स्वरथे त्वरमाण: प्रदुद्रुवे,उस समय मद्रराज शल्यकी ऐसी अवस्था हुई देख अश्वत्थामा दौड़ा और उन्हें अपने रथपर बिठाकर तुरंत वहाँ-से भाग गया
tato madrādhipaṃ drauṇir abhyadhāvat tathā kṛtam | āropya cainaṃ svarathe tvaramāṇaḥ pradudruve ||
سنجے نے کہا—مَدْر کے راجا شلیہ کو اس حال میں دیکھ کر درون کے بیٹے اشوتھاما لپکا۔ اسے اپنے رتھ پر چڑھا کر وہ عجلت میں فوراً وہاں سے نکل گیا۔
संजय उवाच