सुषेणशीर्ष पतितं पृथिव्यां विलोक्य कर्णो5थ तदार्तरूप: | क्रोधाद्धयांस्तस्य रथं ध्वजं च बाणै: सुधारैर्निशितैरकृन्तत्,सुषेणके मस्तकको पृथ्वीपर पड़ा देख कर्ण शोकसे आतुर हो उठा। उसने कुपित हो उत्तम धारवाले पैने बाणोंसे उत्तमौजाके रथ, ध्वज और घोड़ोंको काट डाला
سُشین کا سر زمین پر گرا ہوا دیکھ کر کرن غم سے بے قرار ہو اٹھا۔ غصّے میں اس نے نہایت تیز، عمدہ دھار والے تیروں سے اُتّمَوجا کے گھوڑے، رتھ اور جھنڈا کاٹ ڈالے۔
संजय उवाच