अक्षरब्रह्मयोग (Akṣara-Brahma-Yoga) — Knowledge of the Imperishable, Prakṛti, and Devotion
सम्बन्ध-- कर्मगोग और सांख्ययोग--दोनों याधनों-्वारा परमात्माकी प्राप्ति और परमात्माको प्राप्त महापुरुषोंके लक्षण कहे गये। उक्त दोनों ही प्रकारके साधकोंके लिये वैराग्यपूर्वक मन-इन्द्रियोॉंकोी वशर्में करके ध्यानयोगका साधन करना उपयोगी है; अतः अब संक्षेपें फलसहित ध्यानयोगका वर्णन करते हैं-- स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बहिंभ्षक्षुश्वैवान्तरे भ्रुवो: । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ,बाहरके विषयभोगोंको न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रोंकी दृष्टिको भूकुटीके बीचमें स्थित करके* तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपानवायुको सम करके,“ जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं---ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि इच्छा, भय और क्रोधसे रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही हैः
arjuna uvāca | sparśān kṛtvā bahir bāhyāṁś cakṣuś caivāntare bhruvoḥ | prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantara-cāriṇau ||
بیرونی حسی تماسوں کو باہر ہی رکھ کر، نگاہ کو بھنوؤں کے درمیان ثابت کر کے، اور نتھنوں کے اندر چلنے والی پران اور اپان کی سانسوں کو برابر کر کے—آدمی مراقبے کے لیے حواس اور من کو قابو میں لاتا ہے۔ جس نے اپنی اندریاں، من اور بدھی کو جیت لیا، جو موکش پرایَن مُنی خواہش، خوف اور غضب سے پاک ہو گیا—وہ حقیقتاً ہمیشہ آزاد ہے۔
अर्जुन उवाच