Nṛga-upākhyāna: Brāhmaṇa-sva and the Consequence of Misappropriated Gift-Cattle (कृकलास-रूपे नृगोपाख्यानम्)
अर्चयित्वा यथान्यायं देवेभ्यो5न्न॑ निवेदयेत् यदन्ना हि नरा राजंस्तदन्नास्तस्य देवता:,राजन! मनुष्यको प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिसे देवताओंकी पूजा करके उन्हें अन्न निवेदन करना चाहिये। जो पुरुष जिस अन्नका भोजन करता है, उसके देवता भी वही अन्न ग्रहण करते हैं
اے راجن! انسان کو چاہیے کہ روزانہ شاستروں کے بتائے ہوئے طریقے سے دیوتاؤں کی پوجا کرکے انہیں اَنّ نذر کرے۔ اے راجن، انسان جس اَنّ کو کھاتا ہے، اس کے دیوتا بھی وہی اَنّ قبول کرتے ہیں۔
भीष्म उवाच