Aṣṭāvakra’s Visit to Kubera: Hospitality, Temptation, and the Ethics of Restraint (अष्टावक्र-वैश्रवणोपाख्यानम्)
सदृशो<5रण्यवासीनां मुनीनां भावितात्मनाम् | “जिनका अन्त:ःकरण पवित्र है, वे ही द्विज महादेवजीकी शरण लेते हैं। जो परमेश्वर शिवका भका है, वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी पवित्र अन्तःकरणवाले वनवासी मुनियोंके समान है || ६३ $ ।।
وہ پاک باطن جنگل نشین منیوں کے مانند ہے۔ اسے برہمتو ملے، کیشوَتو ملے، یا دیوتاؤں سمیت شکرَتو—
वायुदेव उवाच